भेदभाव के बीच सफल वकील अमरनाथ मोटूमल

    • Author, हफ़ीज़ चाचड़
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी संवाददाता, पाकिस्तान से

पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को हमेशा से ही समस्याओं का सामना रहा है और वह समस्याएँ कम नहीं हुई हैं. लेकिन कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने इन सब दिक्कतों के बावजूद समाज में अपना स्थान बनाए रखा है. उनके योगदान को पूरे देश में आदर की निगाह से देखा जाता है.

बीबीसी हिंदी ने कुछ ऐसे ही खास शख्सियतों से बातचीत की है. इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में कराची के वरिष्ठ वकील अमरनाथ मोटूमल से बातचीत.

अमरनाथ मोटूमल पेशे से वकील हैं और पाकिस्तान के सबसे पिछड़े हुए समुदाय का प्रतिनिधत्व करते हैं.

उन्होंने पढ़ाई तो अर्थशास्त्र की है लेकिन किस्मत ने उन्हें वकील बना दिया, जिस पर वे काफी ख़ुश है और कहते हैं कि ऊपर वाला उनसे अच्छा काम लेना चाहता है.

वकील बनने का शौक

सिंध के उतरी जिले लाड़कान में उन्होंने अपने पिता के दोस्त और जाने-माने वकील अब्दुल गफूर बुरगड़ी के पास वकालत शुरु कर दी और एक साल बाद 1970 में बहतर भविष्य के लिए कराची आ गए.

अमरनाथ कहते हैं कि जब वे काला कोट पहन कर अदालत में गए और आम लोगों का उनके प्रति रवैया देखा तो उन्होंने बतौर वकील काम करने फैसला लिया.

एक बार उनको जज बनने का अवसर भी मिला लेकिन उन्होंने बतौर वकील ही काम करना पसंद किया और उनके अब वकील के तौर पर काम करते हुए 40 साल से अधिक का समय बीत चुका है.

वे कहते हैं, “मुझे इस फील्ड में काम करने का सबसे बड़ा फायदा यह मिला कि बतौर वकील मैं बड़ी आसानी से सामाजिक काम करता हूँ और अपने समुदाय की मदद कर सकता हूँ.”

अमरनाथ आम तौर पर अदालतों में उन लोगों के वकील बनते हैं जो गरीब हैं और जिनके पास वकील करने के लिए पैसे नहीं है. वह मुफ्त में उनके वकील बनते हैं और उनकी मदद करते हैं.

उनके घर का खर्चा भी वकालत के जरिए चलता है. वे कहते हैं, “सच बात यह है कि हिंदू होने के नाते अक्सर लोग हम पर विश्वास करते हैं और किसी भी मुकदमे में हमें अपना वकील करते हैं क्योंकि हिंदू ईमानदारी से काम करते हैं.”

हिंदूओं में डर

साथ ही यह भी कहते हैं कि जब मामला न्यायपालिका तक पहुँचता है तो एक हिंदू वकील की हैसियत से उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है और धर्म आड़े आता है.

अमरनाथ मोटूमल काम के दौरान कई दिक्कतों का भी सामना करते हैं और कहते हैं कि हिंदू समुदाय को डराया गया है और उन्हें सही तौर पर काम करने नहीं दिया जाता है.

“विडंबना यह है कि दुश्मन का दूसरा नाम हिंदू रखा गया है और अब अगर राह चलते कोई मुझसे या कोई दूसरे हिंदू से पूछता है कि आप कौन हैं तो हम कहते हैं कि हम नॉन-मुस्लिम हैं, हम हिंदू नहीं कहते हैं.”

इन सब बातों के बावजूद भी उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और गरीब लोगों खास तौर पर अपने समुदाय के लिए काम करते रहे हैं.

वे कहते हैं कि उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए वर्ष 1986 में पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के सदस्य बने.

हिंदू परिवार

इमेज स्रोत, BBC World Service

इमेज कैप्शन, सिंध में इन दिनों हिंदू लड़कियों की जबरन शादी और अपहरण के मामले सामने आए हैं.

धर्म की शिकायत

अमरनाथ का मानना है कि हिंदू समुदाय पाकिस्तानी समाज का बहुत ज्यादा सहमा हुआ भाग है और कई दिक्कतों का सामना कर रहे हैं, इस लिए हिम्मत नहीं करता है.

वे कहते हैं, “यह हमारी जन्मभूमि है और इसने हमें पाला है. यह जमीन हमारी माँ की गोद है. हमें और कोई शिकायत नहीं है बल्कि केवल धर्म की शिकायत है और हिंदू होने के नाते हम से सौतेले भाई जैसा सुलूक किया जाता है.”

उन्होंने अपने समुदाय को काफी प्रेरणा दी है कि हिम्मत करें और सीना तान कर जीवन बिताएं लेकिन वह मानते हैं कि हिंदू इतना डरा हुआ है कि उनकी प्रेरणा भी काम नहीं कर पाई है.

“मौत भी सामने आती है तो भी हम आगे बढ़ते हैं. लेकिन हमें तकलीफ उस समय होती है जब हमारा अपना आदमी जिस के लिए हम कोशिश कर रहे होते हैं और उनके अधिकारों के लिए लड़ते हैं और वह हिम्मत नहीं करता है.”

वह मानते हैं कि कामयाब जीवन बिताने के लिए सबको दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए.