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रविवार, 15 मार्च, 2009 को 11:36 GMT तक के समाचार
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तेल की क़ीमतों पर ओपेक की चर्चा
तेल का कुंआ
पिछसे साल जुलाई में प्रति बैरल तेल की क़ीमत 147 डॉलर थी जो अब 45 डॉलर पर है
कच्चे तेल की क़ीमतों में ज़बर्दस्त गिरावट के मद्देनज़र तेल निर्यातक देशों के संगठन यानी 'ओपेक' की बैठक ऑस्ट्रिया की राजधानी वीयना में हो रही है जिसमें उत्पादन घटाने का फ़ैसला किया जा सकता है.

ग़ौरतलब है कि पिछले एक साल से कम की अवधि में तेल की क़ीमतों में बेतहाशा कमी दर्ज की गई है.

पिछले साल जुलाई में जहाँ प्रति बैरल तेल की क़ीमत 147 डॉलर के ऊपर चली गई थी वहीं आजकल तेल की क़ीमत लगभग 45 डॉलर के आसपास पहुँच गई है.

दरअसल वैश्विक अर्थव्यवस्था के मंदी की चपेट में आ जाने से ऐसा माना जा रहा है कि तेल की माँग में भारी कमी होगी, ऐसे में ओपेक के सामने रास्ते बहुत कम हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार ओपेक को या तो पिछले छह महीने में चौथी बार तेल के उत्पादन में कटौती करनी पड़ सकती है या फिर तेल की क़ीमतों में और गिरवाट से रूबरू होना पड़ेगा.

चेतावनी

जबकि विशेषज्ञ ये भी चेतावनी दे रहे हैं कि तेल उत्पादन में फिर से कटौती का उलटा असर भी हो सकता है, इससे ख़राब वैश्विक अर्थव्यवस्था और बिगड़ सकती है और तेल की क़ीमतों में और कमी आ सकती है.

हालांकि अल्जीरिया पहले ही ओपेक से अपने तेल उत्पादन में कमी की बात कह चुका है. लेकिन माना जा रहा है कि ओपेक के दूसरे सदस्य देश तेल उत्पादन में नई कटौती के बजाए पहले तय की गई कटौती के लागू करने पर ज़ोर दे सकते हैं.

ओपेक के आंकड़े के अनुसार पिछले साल सितंबर में 12 सदस्य देशों ने उत्पादन में जितनी कटौती पर सहमति जताई थी उसे केवल 80 प्रतिशत ही पूरा किया जा सका है.

लेकिन सदस्य देश पिछले साल सितंबर से अब तक अपने उत्पादन में तीन गुना कटौती कर चुका है.

इस बैठक में ग़ैर-ओपेक देश रूस के शामिल होने से किसी भी फ़ैसले पर उनका भी प्रभाव पड़ सकता है.

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