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फ्रांस में कौमार्य पर बहस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक फ़्रांसीसी अदालत ने उस आदेश को स्थगित कर दिया है जिसके तहत देश की एक ऐसी मुस्लिम महिला की शादी रद्द कर दी गई थी जिस पर यह आरोप था कि उसने अपने कौमार्य को लेकर अपने पति से झूठ बोला. इस नए फ़ैसले का अर्थ है कि यह शादी सितंबर में एक अपीलीय अदालत के निर्णय के आने तक वैध है. शादी को रद्द करने का मूल फ़ैसला पिछले महीने आया था जिसमें अदालत ने माना था कि महिला के पति को शादी में फँसाया गया है. शादी रद्द करने के अदालती फ़ैसले ने देश में एक बहस छेड़ दी थी. नारीवादियों का कहना था कि ये महिलाओं की स्वतंत्रता का उल्लंघन है. महिला ने शादी रद्द करने के फ़ैसले पर आपत्ति जताई थी और उसके वकील का कहना था कि महिला ख़ुद तलाक़ लेकर इस विवाद का अंत करना चाहती है. मामला अख़बारों में प्रकाशित समाचारों के अनुसार वर्ष 2006 में इस प्रशिक्षु नर्स महिला की शादी तीस साल के एक इंजीनियर से हुई थी. शादी के पहले महिला ने कथित रुप से यह भरोसा दिलाया था कि उसका पहले कोई पुरूष मित्र नहीं रहा है. फ्रांसीसी कानून के तहत ऐसी कोई भी शादी रद्द की जा सकती है जिसमें दोनों में से किसी भी पक्ष ने शादी के बारे में "ज़रूरी क़ाबिलियत" को लेकर झूठ बोला हो. इस मामले में कौमार्य को लेकर ऐसा था. शादी रद्द करने के इस फ़ैसले पर फ़्रांस सरकार ने अपने वकील से इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने को कहा था. सरकार को अंदेशा था कि कहीं लोग इस फ़ैसले को उदहारण बना कर कौमार्य को शादी की ज़रुरी शर्त ना बना दें. अगर सितंबर में अदालत शादी रद्द करने के फ़ैसले को ख़ारिज कर देती है तो महिला और उसके पति को अलग होने के लिए तलाक़ की अर्ज़ी देनी होगी. |
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