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'यूएन की खाद्य संस्था फ़िजूल है' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सेनेगेल के राष्ट्रपति अबदुल्लाए वाडे ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र की खाद्य संस्था को समाप्त कर देना चाहिए और इसे जारी रखना 'पैसे की बर्बादी' है. सेनेगेल के राष्ट्रपति अबदुल्लाए वाडे का कहना है कि इस संस्था पर फ़िजूल पैसा बर्बाद किया जाता है. वाडे ने कहा है कि विश्व में खाद्य पदार्थों की बढ़ रही क़ीमतों के लिए संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवँ कृषि संस्था काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है. खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों को क़ाबू में लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की आपातकालीन योजना की घोषणा के कुछ दिनों के बाद ही अबदुल्लाए वादे का यह बयान आया है. उधर नाइजीरिया में चीनी और आटे की बढ़ती क़ीमतों के विरोध में वहाँ के बेकर राष्ट्रव्यापी हड़ताल कर रहे है. पिछले तीन वर्षों में दुनिया भर मे कुछ खाद्य पदार्थों की क़ीमत लगभग दुगुनी हो गई है. इसके विरोध में अफ़्रीका, एशिया और लैटिन अमरीका में कुछ जगहों पर प्रदर्शन भी हुए हैं. पिछले हफ़्ते संयुक्त राष्ट्र ने खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों से बेहद प्रभावित देशों के लिए दो सौ मिलीयन डॉलर यानी क़रीब आठ सौ करोड़ के एक पैकेज की घोषणा की थी. सेनेगल के राष्ट्रपति का कहना है कि वे अभियान चलाते रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र की खाद्य संस्था का मुख्यालय रोम की बजाय अफ़्रीका के किसी देश में होना चाहिए क्योंकि इसी महाद्वीप में खाद्य संकट सबसे ज़्यादा है. विश्व बैंक कह चुका है कि बढ़ती कीमतों के चलते विश्व में दो अरब लोग प्रभावित हैं और इस संकट के कारण 10 करोड़ लोग ग़रीबी की गर्त में जा सकते हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें बुश के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया03 मई, 2008 | भारत और पड़ोस दक्षिण एशिया में खाद्यान्न संकट09 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस भारत पर खाद्य संकट का ख़तरा?09 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस अफ़्रीकी देशों के साथ कई सहमतियाँ 09 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस अवैध प्रवासियों को शरण देने से इनकार06 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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