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बुधवार, 09 अप्रैल, 2008 को 08:27 GMT तक के समाचार
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अफ़्रीकी देशों के साथ कई सहमतियाँ
भारत अफ्रीका सम्मेलन
भारत ने अफ्रीकी देशों के साथ संयुक्त रूप से एक दिल्ली घोषणापत्र जारी किया है
भारत और अफ़्रीकी देशों के संयुक्त सम्मेलन के समापन पर दोनों ओर से निवेश, कृषि और व्यापार के क्षेत्र में परस्पर सहयोग पर सहमति बनी है.

इस मौके पर भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि अफ्रीकी देशों के साथ कृषि और उत्पादन के क्षेत्र में भारत हरसंभव मदद करने के लिए तैयार है.

वहीं अफ्रीकी देशों ने कहा कि उन्हें व्यापार और निवेश के स्तर पर भारत से बड़े सहयोग की उम्मीद है.

सम्मेलन में मौजूद बीबीसी संवाददाता संजोय मजूमदार ने बताया कि अफ्रीकी देशों के कुछ प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कहा कि वे केवल वादा नहीं चाहते, बल्कि तेज़ी से इन सहमतियों पर काम हो, ऐसा चाहते हैं.

एक अफ्रीकी प्रतिनिधि ने यहाँ तक कहा कि उनके पास समय कम है और जो भी सहयोग करना है, उसपर तेज़ी से अमल किए जाने की ज़रूरत है.

सम्मेलन के समापन के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधियों और राष्ट्राध्यक्षों ने कहा कि उन्हें भारत से निवेशों और व्यापारिक सहयोग के अलावा तकनीक के स्तर पर भी मदद की उम्मीद है.

उन्होंने कहा कि भारत अपनी विशेषज्ञता और तकनीक के ज़रिए कई क्षेत्रों में अफ्रीकी देशों को मदद दे सकता है.

दोनों पक्षों ने विकसित देशों की ओर से ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित न करने की निंदा करते हुए जलवायु परिवर्तन पर गंभीरता से प्रयास करने की ज़रूरत जताई.

साथ ही दोनों पक्ष संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार के प्रति सहमत दिखे और दोनों पक्षों ने एक-दूसरे की सुरक्षा परिषद में दावेदारी की वकालत की.

भारत की पेशकश

इसपर भारत के प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत अफ्रीकी देशों के साथ पहले से भी बेहतर संबंधों को लेकर प्रयासरत है और इस दिशा में वो हरसंभव प्रयास किए जाएंगे जिससे एकसाथ काम करने को बढ़ावा मिल सके.

 हम अफ्रीका के साथ अपने संबंधों के मामले में चीन या पश्चिमी देशों के साथ किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा में नहीं हैं. भारत का अफ्रीकी देशों से संबंध कोई नई बात नहीं है. इसका एक लंबा इतिहास है हमारे साथ. अफ्रीका से हमारे द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंध बहुत पहले से रहे हैं
मनमोहन सिंह, प्रधानमंत्री-भारत सरकार

जब भारतीय प्रधानमंत्री से पूछा गया कि वो भारत से अफ्रीकी देशों के संबंधों को पश्चिमी देशों और चीन के मुक़ाबले कैसे बेहतर पा रहे हैं तो उन्होंने कहा, "हम अफ्रीका के साथ अपने संबंधों के मामले में चीन या पश्चिमी देशों के साथ किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा में नहीं हैं. भारत का अफ्रीकी देशों से संबंध कोई नई बात नहीं है. इसका एक लंबा इतिहास है हमारे साथ. अफ्रीका से हमारे द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संबंध बहुत पहले से रहे हैं."

यह पूछे जाने पर कि किस तरह से भारत अफ्रीकी देशों को लाभान्वित करने वाला है, उन्होंने कहा, "हमें नहीं मालूम कि इस सहयोग की पेशकश को कैसे लागू किया जाना है. अफ्रीकी देशों को अपनी ज़रूरतों और आवश्यकताओं के हिसाब से तय करना होगा कि वे क्या चाहते हैं. वो जैसा सहयोग चाहेंगे, हम उन्हें देने को तैयार हैं."

उन्होंने कहा कि दोनों की पक्ष खाद्य सुरक्षा, चरमपंथ, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे सवालों से जूझ रहे हैं और इसके लिए मिलकर काम करने की ज़रूरत है.

मनमोहन सिंह ने कहा कि आपात शुल्क में राहत से अफ्रीकी देशों को काफी लाभ मिलेगा. साथ ही उन्होंने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप जैसे मॉडल से विकास के आधारभूत ढांचे को मज़बूत करने पर भी ज़ोर दिया.

खाद्य सुरक्षा की चिंता

इस मौके पर बोलते हुए युगांडा के राष्ट्राध्यक्ष ने कहा कि आयात शुल्क में राहत और देशों से भी मिली है और इसका अफ्रीकी देशों को लाभ भी मिला है. युगांडा में ख़ासतौर पर मछली और फूलों के व्यापार को बल मिला है और दुनिया के कई हिस्सों में इनकी आपूर्ति हो पा रही है.

भारत अफ्रीका सम्मेलन
दोनों ओर से पहले से भी मज़बूत संबंधों को विकसित करने की बात कही गई है

तंज़ानिया की ओर से सम्मेलन के समापन पर खाद्य सुरक्षा पर फिर से चिंता व्यक्त की गई. तंज़ानिया के राष्ट्राध्यक्ष ने कहा कि खाद्य सुरक्षा पर संकट के दो बड़े कारण हैं, पहला खाद्यान्न की कमी और दूसरा खाद्यान्नों की बढ़ती क़ीमत.

उन्होंने कहा कि पारंपरिक तरीके से खेती पर आधारित अफ्रीका को भारत अपनी विशेषज्ञता और तकनीक, खेती के आधुनिकतम तरीकों से अवगत कराकर अफ्रीकी देशों का सहयोग कर सकता है.

भारत के प्रधानमंत्री ने भी इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा कि हाल के अनुभवों के आधार पर यह साबित हो गया है कि ऐसी नीतियों को बढ़ावा देने की ज़रूरत है जिससे घरेलू उत्पादन के ज़रिए ही खाद्यान्न की उपज बढ़े.

उन्होंने कहा कि इसके लिए तकनीक विकास और आधुनिकीकरण के साथ ही कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने की ज़रूरत है और इसपर ध्यान दिया जाना चाहिए.

यह पूछे जाने पर कि मौजूदा भारत सरकार को अफ्रीका के साथ संबंधों की इस नई घोषणा में इतना समय क्यों लग गया, मनमोहन सिंह ने कहा कि इस दिशा में सरकार के गठन के बाद से ही प्रयास शुरू हो गए थे. सभी पक्षों से बात करने और सहमति बनाने में क़रीब ढाई बरस का समय लग गया.

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