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'पैकेज ऊँट के मुँह में जीरा जैसा' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उम्मीद की जा रही थी कि जैसे ही अमरीकी राष्ट्रपति अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए पैकेज की घोषणा करेंगे तो इसका असर दिखना शुरु हो जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अमरीकी बाज़ार में गिरावट का दौर जारी रहा और जर्मनी, फ़्रांस के अलावा भारत में भी यह गिरावट देखी गई. इस पैकेज को लेकर दो सवाल थे. पहला तो यह कि क्या यह काफ़ी है और वक़्त पर है? और दूसरा यह कि क्या टैक्स में कटौती से ही यह मामला संभल सकता है? विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह के पैकेज की उम्मीद बाज़ार को थी, उसके हिसाब से यह काफ़ी नहीं था. कुछ लोगों का मानना है कि 14 हज़ार अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था में 145 अरब डॉलर डालकर उसे संभालने की कोशिश कर रहे हैं यह तो ऊँट के मुँह में जीरा डालने के बराबर है. बल्कि अब तो बाज़ार यह माँग कर रहा है कि इस महीने के अंत में ब्याज़ दरों में जो कटौती की बात हो रही है वह 0.25 प्रतिशत या 0.50 प्रतिशत न हो बल्कि पूरे एक प्रतिशत की कटौती इसमें की जाए. लेकिन कुछ विश्लेषक यह भी मानते हैं कि टैक्स में कटौती करके लोगों की जेब में पैसा डालना एक सही फ़ैसला है क्योंकि पैसा ऐसे वक़्त पर आएगा तभी खर्च किया जाएगा. लेकिन एक दूसरी राय यह भी है कि जब मंदी का दौर आता दिख रहा हो तो लोग पैसा बचाने में यक़ीन रखते हैं. लेकिन इस पैकेज का असली असर मंगलवार को दिखना शुरु होगा क्योंकि अब अगले तीन दिनों के लिए यहाँ बाज़ार बंद है. राजनीतिक सहमति अमरीका में यह राष्ट्रपति चुनाव का वर्ष है और राजनीतिक समीकरणों पर भी नज़रें लगी हुई हैं. जहाँ तक इस मामले में राजनीतिक सहमति की बात है तो डेमोक्रैट्स राष्ट्रपति बुश की इस पहल से तो सहमत हैं कि अर्थव्यवस्था को इस तरह की पहल की ज़रुरत है.
लेकिन कुछ डेमोक्रैट्स कह रहे हैं कि देश में जो निचले तबके के लोग हैं उन्हें टैक्स में रियायत देने की ज़रुरत है. ये लोग इनकम टैक्स नहीं देते बल्कि पे-रोल टैक्स देते हैं और अगर उन्हें रियायत दी जाएगी तो वह तुरंत जाकर बाज़ार में इस पैसे को खर्च करेगा. एक वर्ग ऐसा भी है जो चाहता है कि बुश प्रशासन ने वर्ष 2010 तक के लिए दो टैक्स में कटौती की थी उसे आगे भी जारी रखना चाहिए. राजनीतिक स्तर पर सहमति-असहमति के लिए जो बहस चल रही है उसमें एक आशंका यह भी जताई जा रही है कि ऐसा न हो कि इलाज ढूँढ़ने में इतना वक्त लग जाए कि बीमार दवा के इंतज़ार में दम ही तोड़ दे. भारत-चीन पर नज़र अमरीका में आर्थिक मंदी की आशंका से चिंतित तो ज़्यादातर लोग दिखते हैं लेकिन विश्लेषकों का एक तबका मानता है कि जब तक भारत और चीन की अर्थव्यवस्था ठीक चल रही है, चिंता की ज़रुरत नहीं है. वे मानते हैं कि यदि ऐसा हुआ तो यह अमरीका के लिए अच्छा होगा. उनका कहना है कि अमरीकी अर्थव्यवस्था के धीमे होने से भारत और चीन की अर्थव्यवस्था को आख़िरकार फ़ायदा ही हुआ है. अमरीका में मंदी के बाद यहाँ के निवेशक भारत और चीन में पैसा लगा रहे हैं. लेकिन अगर यह प्रवृत्ति देर तक बनी रही तो अमरीका के लिए मुश्किल हो सकती है. तब मन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर के ऑर्डर बंद होने लगेंगे और कॉल सेंटर इकॉनॉमी पर विपरीत असर पड़ने लगेगा. वैसे इसका थोड़ा असर भारतीय बाज़ार पर दिखने लगा है. | इससे जुड़ी ख़बरें अर्थव्यवस्था मज़बूत करने के लिए पैकेज की घोषणा18 जनवरी, 2008 | कारोबार अमरीकाः आर्थिक पैकेज पर सहमति18 जनवरी, 2008 | कारोबार 'अमरीकी अर्थव्यवस्था की स्थिति ख़राब'11 जनवरी, 2008 | कारोबार अमरीका में आर्थिक मंदी की आशंका04 जनवरी, 2008 | कारोबार इराक़ के अच्छे विकास की उम्मीद17 जनवरी, 2008 | पहला पन्ना 'अनुमान से छोटी आर्थिक ताक़त है चीन'18 दिसंबर, 2007 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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