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मंगलवार, 25 सितंबर, 2007 को 16:01 GMT तक के समाचार
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बर्मा के ख़िलाफ़ प्रतिबंध और कड़े
जॉर्ज बुश
अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने बर्मा की सैनिक सरकार पर भय का शासन चलाने का आरोप लगाते हुए उसके ख़िलाफ़ आर्थिक प्रतिबंध और क़ड़े करने की घोषणा की है.

संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र को संबोधित करते हुए जॉर्ज बुश ने कहा कि बर्मा की सैनिक सरकार पिछले क़रीब 19 वर्ष से भय का शासन चला रही है जिसके दौरान लोगों को अभिव्यक्ति, एकत्र होने और पूजा-अर्चना की मूलभूत स्वतंत्रताएँ भी हासिल नहीं हैं.

जॉर्ज बुश ने कहा, "अमरीकी लोग बर्मा की स्थिति देखकर बहुत क्षुब्ध हैं." बुश का यह सख़्त बयान ऐसे समय में आया है जब बर्मा में बौद्ध भिक्षु सैन्य सरकार - जुंटा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.

बुश ने कहा कि अमरीका के नए आर्थिक प्रतिबंध ख़ासतौर से बर्मा की सैन्य सरकार के नेताओं और उन्हें वित्तीय मदद देने वालों को निशाना बनाएंगे. इसके अलावा ऐसे लोगों के अमरीका आने पर लगा प्रतिबंध और बढाया जाएगा.

हालाँकि बीबीसी संवाददाता का कहना है कि इन आर्थिक प्रतिबंधों का असर कितना होता, यह तो समय ही बताएगा.

बर्मा पर जिन देशों के ख़ासा असर देखा जाता है वे हैं चीन और भारत जिनके बर्मा के साथ अब भी मज़बूत संबंध हैं.

बुश ने अफ़ग़ानिस्तान, इराक़ और लेबनान में लोकतंत्र की बहाली के लिए हो रहे 'संघर्ष' में अन्य देशों से भी सहयोग करने का आहवान किया.

जॉर्ज बुश ने कहा, "लेबनान, अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ के लोगों ने मदद मांगी है और प्रत्येक सभ्य देश की यह ज़िम्मेदारी है कि वह उनकी मदद करे. हर सभ्य देश की यह भी ज़िम्मेदारी है कि वे उन लोगों की मदद करें जो तानाशाही के अधीन तकलीफ़ें उठा रहे हैं."

जॉर्ज बुश ने कहा, "बेलारूस, उत्तर कोरिया, सीरिया और ईरान में क्रूर सरकारों ने लोगों को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखा है, ये ऐसे अधिकार हैं जो संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणापत्र में वर्णित हैं."

बुश के भाषण का मुख्य बिंदु जाना - पहचाना था और वो था चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई. बुश ने लोकतंत्र की हिमायत करने वाले लेबनान, इराक़ और मुख्यधारा के फ़लस्तीनी नेताओं को उदारवादी बताया जबकि उत्तर कोरिया, सीरिया और ईरान के नेताओं को क्रूर क़रार दिया.

जॉर्ज बुश ने संयुक्त राष्ट्र की विवादास्पद मानवाधिकार परिषद की ज़ोरदार आलोचना करते हुए कहा कि वह बहुत से देशों में लोगों का दमन देखकर भी ख़ामोश रही है और उसने अपना निशाना सिर्फ़ इसराइल पर केंद्रित रखा.

बुश ने मानवाधिकार परिषद में व्यापक सुधार का आहवान करते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का भी दायरा बढ़ाया जाना चाहिए और जापान स्थायी सदस्यता के लिए बिल्कुल उपयुक्त देश है.

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