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लाखों को इंतज़ार अमरीकी ग्रीन कार्ड का | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पंकज कक्कड़ ने जब अमरीकी संसद कैपिटल हिल के हरे भरे लॉन पर अमरीका का राष्ट्रगीत गाया तो वहां खड़े अमरीकी सांसद जिम मैकडॉरमट ने कहा, "आप ये राष्ट्रगीत मुझ से भी अच्छा गाते हैं." लेकिन अफ़सोस ये कि उनकी ये तारीफ़ पंकज को अमरीकी ग्रीन कार्ड नहीं दिलवा सकती. सियाटल में गूगल कंपनी के लिए काम कर रहे पंकज पिछले 11 साल से अमरीका में हैं और उन्हें अभी भी इंतज़ार है उस कागज़ का जो उन्हें आज़ादी देगा कि वो जहां चाहें काम कर सकें और जबतक उनके पास नौकरी है अमरीका में रह सकें. और वो अकेले नहीं हैं. इस समय भारत, चीन, पाकिस्तान और कई अन्य देशों के दस लाख से भी ज़्यादा, क़ानूनी रूप से वैध और बड़ी बड़ी कंपनियों में काम कर रहे आप्रवासी, ग्रीन कार्ड की कतार में लगे हुए हैं और ये इंतज़ार मानो ख़त्म होने को ही नहीं आ रहा. इंतज़ार अमरीकी सांसदों का ध्यान इस ओर खींचने के लिए इसी हफ़्ते देश के अलग अलग कोनों से राजधानी वाशिंगटन में जुटे सैंकड़ों ऐसे आप्रवासियों ने, जिनमें ज़्यादातर भारतीय थे, अमरीकी झंडा लहराते हुए अमरीकी संसद के बाहर एक रैली निकाली. लगभग दो महीने पहले इन लोगों ने एक अमरीकी अधिकारी के घर सफेद फूलों का ढेर लगाकर मुन्नाभाई की गांधीगिरी का तरीका अपनाया था अपनी मुश्किलों की ओर उनका ध्यान खिंचने के लिए. लेकिन फ़िलहाल कुछ बदल नहीं पाया है. मीनल सिन्हा एक कंप्यूटर प्रोफ़शनल हैं और पिछले दस सालों से अमरीका में रह रही हैं. मीनल कहती हैं, "ग्रीन कार्ड के इंतज़ार में मानो ज़िदगी ठहर सी गई है. आप नौकरियाँ नहीं बदल सकते, प्रमोशन नहीं मिलता, घर नहीं खरीद सकते क्योंकि हमेशा ये डर बना रहता है कि कब लौटना पड़े." सुखचैन सिंह एक आर्किटेक्ट हैं और उनकी कहानी भी कुछ ऐसी ही है. उनका कहना है, "मेरे बच्चे यहां पैदा हुए हैं और वो अमरीकी नागरिक हैं. मेरी पत्नी एमबीए हैं लेकिन सात साल से घर में बैठी हैं क्योंकि बिना ग्रीन कार्ड के वो काम नहीं कर सकतीं.’’
वहीं फ़ोंग तांग चीन के रहने वाले हैं और ग्रीन कार्ड के इंतज़ार में पिछले नौ साल से अपने माता पिता से नहीं मिल पाए हैं. वे कहते हैं, "मां बाप को अमरीका आने का वीज़ा नहीं मिलता क्योंकि मैं इकलौता लड़का हूं और अधिकारियों को डर है कि वो यहाँ आ गए तो फिर नहीं लौटेंगे, और मैं नहीं जा पाता हूं क्योंकि वहाँ ऐसी नौकरी मिलेगी इसकी उम्मीद कम ही है.’’ वापसी का सवाल इस तरह के काबिल उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की समस्याओं सामने रखने के लिए काम कर रही एक संस्था इमिग्रेशन वॉइस का कहना है कि अमरीका हर साल लगभग दस लाख ग्रीन कार्ड जारी करता है जिसमें से केवल एक लाख चालीस हज़ार ऐसे लोगों के लिए है. ये संख्या 1990 से नहीं बढ़ाई गई है और इमिग्रेशन व्हाइस जैसी संस्थाएं इसके लिए आवाज़ उठा रही हैं.
डेमोक्रैट सांसद जिम मैकडॉरमट संसद के नीचले सदन में इंडिया कॉकस के चेयरमैन हैं और इस मांग के हक़ में हैं. उनका कहना है, "अमरीका की अर्थव्यवस्था दुनिया भर से बटोरे गए तेज़ दिमाग वाले लोगों की बदौलत चल रही है. अगर हमने जल्द ही कदम नहीं उठाया तो हम बहुत जल्दी नीचे गिरेंगे.’’ इस तरह के डॉक्टर इंजीनियर और उंचे ओहदों पर काम करनेवाले लोग ज़्यादातर भारत या चीन से हैं. दोनों ही देशों की अर्थव्यवस्थाएँ तेज़ी पर हैं. तो ये काबिल लोग अपने देश वापस लौटने की क्यों नहीं सोचते. मीनल सिन्हा कहती हैं बार-बार उखड़ना आसान नहीं होता. उनका कहना है, "रहते रहते थोड़ा लगाव सा भी हो गया है इस देश से. एक बार मैने अपने माँ बाप को छोड़ा, अब कल अगर मेरे बच्चे इस देश में ही रहना चाहें तो क्या फिर मुझे उन्हें छोड़ना होगा.’’ लेकिन दिल से हटकर दिमाग की बात करें तो ग्रीन कार्ड की इस समस्या ने एक नया ट्रेंड शुरू कर दिया है. नाम है 'रिवर्स ब्रेन ड्रेन'. हारवर्ड विश्वविद्यालय की एक स्टडी का कहना है कि ऊंचे पदों पर काम कर रहे इन लोगों में निराशा बढ़ रही है और इनमें भारतीयों की संख्या तीस प्रतिशत है. और भारतीय अर्थव्यवस्था की उठान अब इनमें से बहुतों को वापस अपनी ओर खींच रही है. और इस चलन ने यदि जोर पकड़ लिया, तो अमरीकी अर्थव्यवस्था के लिए ये एक बुरी ख़बर होगी. |
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