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बुधवार, 08 अगस्त, 2007 को 16:31 GMT तक के समाचार
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मुशर्रफ़ के बिना शुरू हुआ जिरगा
बैनर
सुरक्षाकर्मियों का कहना है कि जिरगा को देखते हुए कड़े सुरक्षा इंतज़ाम किए गए थे
काबुल में कबायली नेताओं का सम्मलेन यानी लोया जिरगा शुरू हो गया है जिसमें 'आतंकवाद' मुख्य मुद्दा है.

पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ इसमें हिस्सा नहीं ले रहे हैं.

जिरगा के दौरान ही जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की मुलाक़ात अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई से होनी थी.

चरमपंथी हिंसा से निपटने के उपाय तलाशने के लिए इस जिरगा का आयोजन किया गया है और इसमें अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की मुख्य भूमिका रही है.

बुश की मंशा पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को एक मंच पर लाना था ताकि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में जारी चरमपंथी हिंसा से निपटा जा सके.

अमरीका का कहना है कि जिरगा में भाग नहीं लेने के जनरल मुशर्रफ़ के फ़ैसले को वह समझ सकता है. अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने कहा कि ज़रूर कोई ऐसा कारण होगा जिसके चलते मुशर्रफ़ ने यह फ़ैसला किया है.

जिरगा में परवेज़ मुशर्रफ़ की जगह प्रधानमंत्री शौकत अज़ीज़ जाएँगे.

जिरगा

जिरगा अफ़ग़ानिस्तान की एक अनूठी संस्था है जिसमें सभी पख़्तून, ताजिक, हज़ारा और उज़्बेक कबायली नेता एक साथ बैठते हैं, इनमें शिया और सुन्नी दोनों शामिल होते हैं. यहाँ देश के मामलों पर विचार विमर्श कर फ़ैसले लिए जाते हैं.

पाकिस्तान में दक्षिणी और उत्तरी वज़ीरिस्तान के वरिष्ठ लोगों ने भी इसमें हिस्सा लेने से मना कर दिया है.

मुशर्रफ़ और करज़ई एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं

चरमपंथ के मुद्दे पर बात करने के लिए जिरगा में करीब 700 कबायली नेताओं, इस्लामिक मौलवियों और अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से नेताओं को आमंत्रित किया गया है.

तालेबान को इसमें शामिल नहीं किया गया है और वे इसके बहिष्कार की बात कर रहा है. तालेबान ने इसे ‘जॉर्ज बुश का अभियान’ करार दिया है.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि परवेज़ मुशर्रफ़ ने अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई को फ़ोन किया और कहा कि संयुक्त शांति जिरगा को सफल बनाने में वे पूरा समर्थन देंगे.

लेकिन परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा कि इस्लामाबाद में व्यस्तता के कारण वे गुरुवार को शुरु होने वाले जिरगा में हिस्सा नहीं ले पाएँगे.

विफल शांति जिरगा?

 ये सिर्फ़ दिखावा है, ये अफ़गान लोगों के असल विचार नहीं दर्शाता
अब्दुल गफ़ूर हैदरी

संवाददाताओं का कहना है कि परवेज़ मुशर्रफ़ का ये क़दम अमरीका के समर्थन से हो रहे शांति जिरगा की अहमियत कम करना हो सकता है.

अमरीका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवारों ने हाल में कई बयान दिए हैं जिसमें ‘आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग’ में पाकिस्तान की विफलता की बात की गई है.

संवाददाताओं का कहना है कि तालेबान की भागीदारी के बगैर पाकिस्तान प्रशासन जिरगा को ज़्यादा महत्व नहीं देता.

अफ़ग़ान राष्ट्रपति और शौकत अज़ीज़ शांति जिरगा का उदघाटन करेंगे.

अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान संयुक्त शांति जिरगा का विचार अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने अमरीकी राष्ट्रपति बुश के साथ मुलाकात में दिया था.

हामिद करज़ई का कहना था कि वे जिरगा को सीमा के दोनों ओर पश्तून समाज को दोबारा शुरु करने की कोशिश मानते हैं ताकि तालेबान के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके.

तालेबान को जिरगा में नहीं बुलाया गया है

तालेबान के समर्थकों का कहना है कि उनके बगैर की गई बातचीत का कोई फ़ायदा नहीं होगा.

पाकिस्तान की जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के महासचिव अब्दुल गफ़ूर हैदरी ने एपी को कहा, "ये सिर्फ़ दिखावा है, ये अफ़गान लोगों के असल विचार नहीं दर्शाता."

बीबीसी के बिलाल सरवरी का कहना है कि काबुल में जिरगा को लेकर लोगों को कुछ उम्मीदें हैं. उन्होंने बताया कि काबुल में पाकिस्तानी झंडों का दिखना असामान्य सी बात है क्योंकि दोनों देश के बीच संबंध अच्छे नहीं है.

काबुल से सांसद निमतउल्ला ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "पहले चरमपंथ सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान के लिए समस्या था अब पाकिस्तान पर भी असर पड़ रहा है."

जिरगा के लिए अफ़ग़ान प्रवक्ता आसिफ़ नंग ने कहा कि जिरगा इस बात पर विचार करेगा कि लोगों के मन में असुरक्षा का क्या कारण है, चरमपंथियों के ठिकाने कहाँ हैं, पैसे कहाँ से आते हैं और पूरी समस्या से निपटा कैसे जाए.

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