BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शनिवार, 26 मई, 2007 को 12:32 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मनमोहन सरकार के तीन साल

मनमोहन सिंह
विश्लेषकों का कहना है कि मनमोहन सरकार राजनैतिक मोर्चे पर विफल रही है
यूपीए सरकार के तीन साल पूरे होने पर भारत भर के मीडिया में सरकार के कामकाज पर काफ़ी चर्चा हुई.

कुछ ने तारीफ़ों के पुल बाँधे तो कुछ ने इसको नाकारा सरकार क़रार दिया.

सबसे कटु आलोचना भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने की. उन्होंने डॉक्टर मनमोहन सिंह को भारतीय इतिहास में अब तक का सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री माना.

क्या मनमोहन सिंह भारतीय इतिहास के अब तक के सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री हैं?

 पूरा देश इन्हें ईमानदार मानता है. अमरीका के साथ जो परमाणु संधि हुई उससे मनमोहन सिंह की बहादुरी का पता चलता है. पाकिस्तान के साथ कश्मीर पर आगे बढ़ी सकारात्मक बताचीत भी मनमोहन सिंह की वजह से ही संभव हो पाई
प्रेम शंकर झा, राजनीतिक विश्लेषक

इससे पहले लाल कृष्ण आडवाणी उनको 'नॉन प्राइम मिनिस्टर' कहकर खिल्ली उड़ा चुके हैं.

क्या हमेशा आसमानी रंग की पगड़ी पहनने वाले इस मृदु भाषी व्यक्ति का ये आकलन उचित है?

क्या ये वही मनमोहन सिंह नहीं हैं जिन्होंने 1990 के दशक में आर्थिक सुधारों की नींव रखी थी और पिछले तीन सालों में भी आठ-नौ फ़ीसदी की विकास दर देने में कामयाब रहे हैं?

मनमोहन सिंह की साख

सोनिया-मनमोहन
सरकार मनमोहन सिंह चला रहे हैं लेकिन यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गांधी हैं

इतना अच्छा प्रदर्शन होने बावज़ूद पूरे देश में मनमोहन सिंह की जो साख होनी चाहिए वो नदारद है.

मनमोहन सिंह के कामकाज और उनकी साख पर राजनीतिक विश्लेषक प्रेम शंकर झा कहते हैं,"पूरा देश इन्हें ईमानदार मानता है. अमरीका के साथ जो परमाणु संधि हुई उससे मनमोहन सिंह की बहादुरी का पता चलता है. पाकिस्तान के साथ कश्मीर पर आगे बढ़ी सकारात्मक बातचीत भी मनमोहन सिंह की वजह से ही संभव हो पाई."

दूसरी तरफ उनके आलोचक कहते हैं कि उन्होंने सहयोगी दलों को अपनी जागीर की तरह मंत्रालय चलाने और कैबिनेट मंत्रियों को अपनी अवहेलना करने की छूट देकर प्रधानमंत्री कार्यालय की गरिमा को गिराया है.

 पिछली चार बार से मनमोहन सिंह राज्यसभा से चुनकर आ रहे हैं. एक बार ही वो लोकसभा का चुनाव लड़े हैं और हार गए हैं. आम जनता ये मानती है कि मनमोहन का व्यक्तित्व राजनीतिक नहीं है
अरुण नेहरू, राजनीतिक विश्लेषक

पूर्व केंद्रीय मंत्री और राजनीतिक मामलों पर लिखने वाले अरुण नेहरू भी मनमोहन सिंह को बहुत ऊँचा रेट नहीं करते.

अरुण नेहरू कहते हैं,"पिछली चार बार से मनमोहन सिंह राज्यसभा से चुनकर आ रहे हैं. एक बार ही वो लोकसभा का चुनाव लड़े हैं और हार गए हैं. आम जनता ये मानती है कि मनमोहन का व्यक्तित्व राजनीतिक नहीं है."

अराजनीतिक छवि

विपक्ष ने मनमोहन सिंह को अब तक का सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री कहा है

हालांकि उनके विरोधी भी उन पर ये आरोप नहीं लगा सकते कि वो व्यक्तिगत रूप से ईमानदार नहीं हैं या उनकी निष्ठा में खोट है.

लेकिन उन पर ये आरोप अक्सर लगते रहे हैं कि वो पैदायशी नेता नहीं हैं और किसी के नेतृत्व में वो बेहतर काम कर सकते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी तो यहाँ तक कहते हैं कि वो नाम मात्र के प्रधानमंत्री हैं.

प्रभाष जोशी कहते हैं,"मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री कहना सिर्फ़ खानापूरी करना है क्योंकि न वो तो ख़ुद प्रधानमंत्री होना चाहते थे और न उनका जीवन ऐसा है जिससे गुज़रकर आप प्रधानमंत्री हो सकते हैं."

वो आगे कहते हैं,"पिछले तीन साल से प्रधानमंत्री होते हुए भी उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे लगे वो भारत के प्रधानमंत्री हैं. इसलिए हम कह सकते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय के वो सबसे बड़े कर्मचारी हैं."

लेकिन क्या प्रधानमंत्री के लिए ज़रूरी है कि वो हर विषय पर बढ़ चढ़ कर बोलता नज़र आए. एक जन नेता हो, एक अच्छा वक्ता हो और ज़रूरत पड़ने पर अपने सहयोगियों की ग़लत बात को ग़लत कहे.

मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता मोहम्मद सलीम कहते हैं कि प्रधानमंत्री को कमज़ोर कहना उनका सही आकलन नहीं है.

मोहम्मद सलीम कहते हैं,"ये बात लालकृष्ण आडवाणी कह रहे हैं. दरअसल वो अपने को लौहपुरुष साबित करना चाहते हैं इसलिए बाकी सबको कमज़ोर कह रहे हैं. ये व्यक्तिगत लांछन का मामला नहीं
है. प्रधानमंत्री एक गठबंधन सरकार चला रहे हैं और वो बहुत सज्जन व्यक्ति हैं. इसलिए उनको कमज़ोर प्रधानमंत्री कहना सही नहीं है."

कुछ राजनीतिक विश्लेषक मनमोहन सिंह के कार्यकाल की तुलना इंदिरा गाँधी के शुरू के तीन सालों के कार्यकाल से करते हैं जब वो 'सिंडीकेट' के इतने अधिक प्रभाव में थीं कि लोग उन्हें 'गूंगी गुड़िया' कहते थे.

लेकिन प्रभाष जोशी इस बात को सही नहीं मानते और उनके अनुसार दोनों में कोई मेल नहीं है.

प्रभाष जोशी कहते हैं,"मैं महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी को इस सदी के भारत का सबसे बड़ा नेता मानता हूँ. इंदिरा का कटु आलोचक और विरोधी होने के बावज़ूद मैं मानता हूँ कि इंदिरा गांधी ने जिस तरह से बड़े और मज़बूत निर्णय लिए वैसे फ़ैसले जवाहर लाल नेहरू भी नहीं ले सके."

सोनिया बनाम मनमोहन

जब यूपीए सरकार बनी थी तो कहा गया था कि सोनिया गाँधी राजनैतिक मामले देखेंगी और मनमोहन सिंह सरकार चलाएंगे.

 मनमोहन सिंह की तारीफ़ में कहा जाना चाहिए कि वो चुपचाप अपना काम ईमानदारी से करते रहते हैं. वो असहमत होने का मौका नहीं देते. उनके लिए जो भूमिका गठबंधन सरकार की वजह से निर्धारित हुई है उसे वो ईमानदारी और क्षमता के साथ पूरा करते रहते हैं.
प्रभाष जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

जहाँ तक इन दोनों के संबंधों की बात है तो इस बात के कोई सबूत नहीं मिलते कि दोनों में कोई बड़ा वैचारिक मतभेद उभरा हो.

लेकिन क्या इतना ही काफ़ी हैं?

आप इसको क्या कहेंगे कि सरकार बहुत सोच-समझकर पेट्रोल के दाम बढ़ाने का फ़ैसला करती है और सोनिया गांधी के घर 10 जनपथ से लिखे दो पैराग्राफ़ के पत्र के बाद ये फ़ैसला बदल दिया जाता है.

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक प्रेम शंकर झा नहीं मानते कि सोनिया गांधी सरकार के काम में अनावश्यक हस्तक्षेप कर रही हैं. वो ये ज़रूर मानते हैं कि इस सरकार में नौकरशाहों की चाँदी हुई है.

वो कहते हैं,"कुछ हद तक ये सच है. लेकिन ये सच नहीं है कि सोनिया गांधी हर मामले में हस्तक्षेप कर रहीं हैं. विकास जैसे मुददों पर वो थोड़ा ध्यान देती हैं बाकी मुद्दों पर कहती हैं कि आप करते जाइए."

लेकिन वो आगे कहते हैं,"मनमोहन सिंह एक 'नेचुरल लीडर' नहीं हैं. आम आदमी को सरकार की तरफ से रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं है. ये सरकार पूरी तरह से लाल फ़ीताशाही की सरकार बनकर रह गई है."

वो कहते हैं,"मनमोहन सिंह के ख़िलाफ़ शिकायत है कि टेक्नोक्रेट प्रधानमंत्री राजनैतिक मामलों की तरफ ध्यान नहीं दे रहे."

चाहे आरक्षण का मामला हो या आम आदमी से जुड़ने की बात या किसी मंत्री को मंत्रिमंडल से निकाले जाने की बात-प्रधानमंत्री एक निश्चित फ़ैसला करते हुए नहीं दिखाई देते.

अरुण नेहरू कहते हैं,"प्रधानमंत्री कार्यालय के सम्मान में कमी हुई है. वो कमज़ोर हुआ दिखाई देता है. इसीलिए आप देखिए अगर कोई समस्या होती है तो उसे हल करने में बहुत समय लग रहा है. जिसकी वजह से व्यवस्था प्रभावित हो रही है."

वो आगे कहते हैं,"आप आर्थिक और राजनैतिक प्रदर्शन को देखिए तो आपको दोनों बड़े बेमेल लगेंगे. आर्थिक क्षेत्र में बेहतरीन परिणाम देखने को मिले हैं लेकिन राजनैतिक स्तर पर ऐसा नहीं है."

लेकिन ये भी ध्यान देने योग्य है कि यूपीए सरकार के तीन साल के प्रदर्शन से लोग भले ही खुश न हों लेकिन मनमोहन सिंह की अपनी व्यक्तिगत छवि नकारात्मक नहीं है.

प्रभाष जोशी के अनुसार मनमोहन सिंह ऐसे बहुत कम काम करते हैं जो लोगों को उनके ख़िलाफ़ होने के लिए मज़बूर करे.

वो कहते हैं,"मनमोहन सिंह की तारीफ़ में कहा जाना चाहिए कि वो चुपचाप अपना काम ईमानदारी से करते रहते हैं. वो असहमत होने का मौका नहीं देते. उनके लिए जो भूमिका गठबंधन सरकार की वजह से निर्धारित हुई है उसे वो ईमानदारी और क्षमता के साथ पूरा करते रहते हैं."

अच्छी मंशा होने बावज़ूद संदेश ये गया है कि मनमोहन सिंह एक छद्म प्रधानमंत्री हैं जिसका रिमोट कंट्रोल दूसरे लोगों के हाथ में है या दूसरे शब्दों में कहा जाए कि वो निर्णय नहीं लेते और दूसरों की तरफ से लिए गए फ़ैसलों का पालन करते हैं.

अगर उन्हें भारत के बेहतरीन प्रधानमंत्रियों की कतार में शामिल होना है तो उन्हें ये दिखाना होगा कि महत्वपूर्ण निर्णय लेने के मामले में वो किसी के मोहताज नहीं हैं.

इससे जुड़ी ख़बरें
यूपीए और वामदलों के बीच अहम चर्चा
13 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस
राहुल गांधी भविष्य हैं: मनमोहन सिंह
16 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस
'धर्म के आधार पर भड़काना धोखा है'
21 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>