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दो परिवारों की रंजिश का मामला? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जिस घड़ी सद्दाम हुसैन अविश्वास भरी निगाहों से फांसी के उस फंदे को देख रहे थे जिसे नक़ाबपोश लोग उनकी गर्दन में डाल रहे थे उस घड़ी एक व्यक्ति अमरीका के टेक्सस स्थित आरामगाह में चैन की नींद सो रहा था. ये वो व्यक्ति था जिसने इराक़ पर हमले और सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाकर सद्दाम के गले में फांसी का फंदा डलवाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. उस समय क्रॉफ़र्ड, टेक्सस में बमुश्किल रात के नौ बजे थे मगर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश न केवल सोने चले गए थे बल्कि ये आदेश देकर गए थे कि सवेरा होने से पहले उनकी नींद ना तोड़ी जाए. बुश का इस क़दर सोने चला जाना, दरअसल मौत की नींद सो चुकी उस शख़्सियत के प्रति उनका अंतिम क्षोभ था जिसने एक समय ख़ुद को 'दूसरा सलाहदीन' और 'बग़दाद का शेर' घोषित किया था. कुछ लोग शायद ये सोच रहे हों कि इन दिनों राष्ट्रपति बुश की नींद उड़ी हुई होगी क्योंकि इराक़ नीति के कारण उनकी लोकप्रियता घटती जा रही है. मगर जिस समय सारी दुनिया में या तो सद्दाम हुसैन को फांसी देने की निंदा हो रही थी या सराहना, उस समय बुश सोए हुए थे. वे जागे चार बजकर चालीस मिनट पर. बताया गया कि यही उनके उठने का समय होता है. घंटे भर बाद उन्होंने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के साथ बग़दाद की स्थिति के बारे में 10 मिनट बात की. थोड़ी ही देर बाद उनके दफ़्तर व्हाइट हाउस की तरफ़ से एक बयान जारी कर दिया गया कि सद्दाम को उस न्यायपूर्ण कार्रवाई के बाद सज़ा दे दी गई जिस न्याय से उन्होंने अपने शासनकाल में अन्य लोगों को वंचित रखा. रिश्ते की शुरुआत दोस्ती से एक तरह से देखा जाए तो सद्दाम हुसैन का अंत बुश परिवार और हुसैन परिवार के बीच के एक नाटकीय प्रकरण का अंत है...जिसकी शुरूआत दोस्ती से हुई थी. तब जॉर्ज वॉकर बुश के पिता जॉर्ज हर्बर्ट वॉकर बुश अमरीका के उपराष्ट्रपति थे, ईरान अमरीका का दुश्मन था और इसलिए ईरान का दुश्मन इराक़ अमरीका को दोस्त जैसा लगा. 1983 में डोनाल्ड रम्सफ़ेल्ड राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन की सरकार के दूत की हैसियत से बग़दाद गए और सद्दाम हुसैन से हाथ मिलाया. लेकिन दोस्ती दुश्मनी में बदल गई जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर धावा बोल दिया. फिर दो साल बाद सद्दाम हुसैन ने राष्ट्रपति बुश की हत्या करवाने की कोशिश की..लेकिन व्हाइट हाउस ने हमेशा ये कहा कि आपसी रंज़िश का इराक़ पर हमले से कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन सितंबर 2002 में जब इराक़ पर हमले की तैयारी हो रही थी, तब जूनियर बुश ने एक सभा में कहा था- "सद्दाम आख़िर वह आदमी है जिसने मेरे पिता की जान लेने की कोशिश की." रंजिश ख़त्म पर हिंसा जारी अब दो परिवारों की इस रंजिश का एक अध्याय तो समाप्त हो गया है. लेकिन ऐसा लगता है कि अपनी कब्र से भी सद्दाम हुसैन बुश प्रशासन के सपनों में आते रहेंगे और अमरीका के 43वें राष्ट्रपति देश को क्या विरासत देकर जाते हैं, इसका फ़ैसला करते रहेंगे. सद्दाम ने चेतावनी दी थी कि इराक़ी अमरीकियों को हर शहर में हराएँगे. किसी ने नहीं सोचा था कि सद्दान हुसैन को सत्ता से हटाए जाने के बाद ऐसा समय आएगा. लेकिन ये आज के इराक़ में एक सच्चाई बनती जा रही है और विद्रोह और सांप्रदायिक हिंसा से इतनी अराजकता फैल रही है कि उसके सामने गृह युद्ध की परिस्थितियाँ व्यवस्थित सी लगती है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'फाँसी दी गई तब सो रहे थे बुश'30 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना सद्दाम की आख़िरी चिट्ठी30 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना 'सद्दाम हुसैन का सामान ले जाने को कहा गया'29 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना अदालत ने सद्दाम की मौत की सज़ा को बरकरार रखा26 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना 'सद्दाम समर्थक शांति प्रयासों में सहयोग दें'17 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना सद्दाम ने सज़ा के ख़िलाफ़ अपील की03 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना सद्दाम हुसैन: ज़िंदगी का सफ़र05 नवंबर, 2006 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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