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वेटिकन सद्दाम की फाँसी के ख़िलाफ़ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वेटिकन ने इराक़ के पूर्व नेता सद्दाम हुसैन की फाँसी की सज़ा बरक़रार रखने के फ़ैसले की निंदा की है. इटली के समाचार पत्र रिपब्लिका को दिए एक साक्षात्कार में वेटिकन के न्याय विभाग के प्रमुख कार्डिनल रिनाटो मार्टिनो ने कहा कि जीवन को प्राकृतिक मौत के लिए बचाया जाना चाहिए और फाँसी प्राकृतिक मौत नहीं है. उन्होंने कहा, "इसमें कोई संदेह नहीं कि सद्दाम जनसंहार के दोषी हैं लेकिन यह ग़लत है कि एक अपराध का जवाब दूसरे अपराध से दिया जाए". उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि सद्दाम हुसैन को मौत की सज़ा नहीं दी जाएगी. पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को एक इराक़ी अदालत ने पाँच नवंबर को मौत की सज़ा सुनाई थी जिसके ख़िलाफ़ उनकी अपील ख़ारिज कर दी गई. इसके बाद इराक़ी क़ानून के तहत आगे अपील करने का प्रावधान नहीं है और तीस दिन के भीतर इस आदेश का पालन करना अनिवार्य है. विरोध सद्दाम हुसैन को मौत की सज़ा देने के फ़ैसले का विरोध बढ़ता जा रहा है. इटली के प्रधानमंत्री रोमानो प्रोदी ने भी इसकी निंदा की है. उन्होंने कहा कि उनका देश मौत की सज़ा न दिए जाने के पक्ष में है. भारत ने भी मौत की सज़ा बरकरार रखने के अपीलीय अदालत के फ़ैसले पर चिंता जताई है. विदेश विभाग ने मंगलवार को जारी व्यक्तव्य में कहा कि इस तरह की कोशिश होनी चाहिए की सद्दाम हुसैन को मौत की सज़ा न हो. सद्दाम हुसैन के दो सहयोगियों- बर्ज़ान अल-तिकरिती और अवाद अल-बांदार की अपील भी ख़ारिज कर दी गई है. इन तीनों को 1982 में दुजैल नरसंहार के मामले में फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी. उस नरसंहार में 148 शिया मारे गए थे. शियाओं को निशाना तब बनाया गया था जब सद्दाम हुसैन पर 1982 में जानलेवा हमले की कोशिश हुई थी. |
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