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शुक्रवार, 17 नवंबर, 2006 को 13:20 GMT तक के समाचार
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समझौता और बुश प्रशासन का अंतर्द्वंद्व

जॉर्ज बुश
समझौते को लेकर बुश परमाणु अप्रसार की हिमायत करने वालों के निशाने पर हैं
भारत और अमरीका के बीच हुए परमाणु समझौते को अमरीकी सीनेट की हरी झंडी मिलने से बुश प्रशासन की विदेश नीति के अंतर्द्वंद्व सामने आ गए हैं.

सीनेट की मंजूरी भारत-अमरीका परमाणु समझौता पर अंतिम फ़ैसला नहीं है. अब दोनों सदनों में पारित विधेयकों को मिलाया जाएगा.

इसके बाद इसे अमरीकी कांग्रेस यानी दोनों सदनों वाली पूरी संसद में मतदान के लिए रखा जाएगा.

बहरहाल सीनेट में ज़बरदस्त बहुमत से परमाणु समझौते पर मुहर लगने से इतना तो स्पष्ट है कि सदन बुश प्रशासन के इस नज़रिए से सहमत है कि परमाणु अप्रसार के उद्देश्यों से ज़्यदा महत्वपूर्ण रणनीति साझेदार के रूप में भारत का साथ है.

साझेदारी को वरीयता

भारत के साथ यह समझौता कई नियमों को दरकिनार करके किया गया और इसके पक्ष में तर्क दिए गए कि इसका उपयोग गैर-सैनिक ज़रूरतों के लिए किया जाएगा.

भारत परमाणु हथियार विकसित करने के साथ ही परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर चुका है. इस लिहाज से अमरीका के वर्तमान नियमों के अनुसार भारत कोई भी परमाणु सहायता नहीं पा सकता.

इसलिए बुश प्रशासन अमरीका के परमाणु अप्रसार क़ानून में संशोधन करना चाहता है. अमरीकी कांग्रेस भी अब दोनों सदनों में इसे मंज़ूर करने के बाद इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है.

तर्क ये दिए जा रहे हैं कि भारत मित्र है, लोकतांत्रिक देश है और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वॉशिंगटन का मज़बूत साझेदार बनकर उभर रहा है.

इसके अलावा भारत की ऊर्जा ज़रूरतों से अमरीका के उद्योग को फ़ायदा होगा. लेकिन हथियारों पर अंकुश लगाने के हिमायती लोगों का नज़रिया कुछ और है.

उनका कहना है कि भारत इसका उपयोग अपने सैनिक कार्यक्रमों के लिए कर सकता है.

वे यह भी तर्क देते हैं कि ईरान और उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रमों को लेकर अमरीका दूसरे देशों पर कठोर क़दम उठाने का दबाव डाल रहा है.

लेकिन भारत के प्रति उसकी नरमी ऐसे महत्वपूर्ण समय में ग़लत संदेश दे सकती है.

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