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ईरान में पच्चीस हज़ार यहूदी रहते हैं | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ईरान और इसराइल हालाँकि कट्टर दुश्मन हैं लेकिन लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि ईरान में लगभग पच्चीस हज़ार यहूदी रहते हैं और यह इसराइल के बाद मध्य पूर्व के किसी देश में रहने वाले यहूदियों की सबसे बड़ी संख्या है. और इन पच्चीस हज़ार यहूदियों में से ज़्यादातर का रुख़ यही है कि दबाव जितने भी हों, लेकिन वे ईरान में ही रहना चाहते हैं. उन्हें अपनी यहूदी जड़ों के साथ-साथ अपनी ईरानी संस्कृति पर भी गर्व है. राजधानी तेहरान के यूसुफ़ाबाद इलाक़े में यहूदियों का प्रार्थना स्थल सिनेगॉग है. वहाँ ईरानी यहूदी पौ फटते ही इकट्ठा हो जाते हैं और अपनी पवित्र किताब तोरा का पाठ करते हैं. वे उसके बाद ही अपनी दिनचर्या शुरू करते हैं. ये एक ऐसा नज़ारा है जिसकी उम्मीद ईरान जैसे एक इस्लामी क्रांतिकारी देश में नहीं की जा सकती लेकिन ईरान में अनेक स्थानों पर बहुत से सिनेगॉग हैं जिनमें यहूदी अपनी धार्मिक परंपराओं का निर्वाह करते हैं. यहूदी प्रार्थनाओं का आयोजन करने वाले एक यहूदी नेता उनीस हम्मामी का कहना था, "हमारे लंबे इतिहास और जड़ों की बदौलत हमें यहाँ की व्यवस्था में स्थान हासिल है." उनीस हम्मामी बताते हैं कि ईरानी क्रांति के पितामह माने जाने वाले इमाम ख़मैनी ने यहूदियों को एक धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता दी थी और उसे संरक्षण मिलना चाहिए. उसी की बदौलत ईरान में एक यहूदी सांसद होता है. हम्मामी बताते हैं कि इमाम ख़ुमैनी ने यहूदियों और इसराइलवादियों के बीच फ़र्क़ किया था और हमें समर्थन दिया था. यहूदी धर्म के अलावा एक वाद ज़ायनिज़्म के रूप में भी प्रचलित है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह फ़लस्तीन में यहूदियों के लिए एक देश - इसराइल के गठन के लिए अस्तित्व में आया था इस तरह उसे यहूदीवाद के राजनीतिक रूप के तौर पर भी स्वीकार किया जाता है. यहूदी विरोधी भावनाएँ यूसुफ़ाबाद सिनेगॉग में बातचीत और उदघोषणाएँ फारसी में की जाती हैं क्योंकि ईरान में रहने वाले ज़्यादातर यहूदियों को हिब्रू भाषा ठीक तरह से नहीं आती है. ईरान में यहूदी पिछले लगभग तीन हज़ार साल से रहते आए हैं और उन्हें बेबीलोन के उन दासों का वंशज बताया जाता है जिन्हें साइरस महान ने बचाया था.
सदियाँ बीतने के इस दौर में हिंसा भी हुई है और यहूदियों को इस्लाम क़बूल करने के लिए मजबूर करने के मामले भी सामने आए हैं लेकिन इन सबके बावजूद शांतिपूर्ण तरीके से साथ-साथ रहने की परंपरा भी विकसित हुई है. इन दिनों यहूदी विरोधी भावना को कभी-कभार मीडिया में उबाल मिल जाता है. हम्मामी कहते हैं कि सरकारी टेलीविज़न यहूदीवाद को ज़ायनवाद के साथ मिलाकर भ्रम की स्थिति पैदा करता है जिससे आम लोगों को संदेश जाता है कि इसराइल जो कुछ भी करता है उसे सभी यहूदियों का समर्थन मिलता है. लेबनान में इसराइल और हिज़्बुल्ला के बीच लड़ाई के दिनों में ईरान के एक कट्टरपंथी समझे जाने वाले साप्ताहिक अख़बार येलसरात ने अपने पहले पन्ने पर सिनेगॉग की दो तस्वीरें छापी थीं जिनमें इसराइल का झंडा लहराने वाले लोगों को को दिखाया गया था, वे दरअसल इसराइली स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर समारोह मना रहे थे. उस अख़बार ने झूठ लिखा था कि वे सिनेगॉग ईरान के हैं, एक को यूसुफ़ाबाद का सिनेगॉग बताया था और दूसरे सिनेगॉग को शीराज़ स्थिति बताया गया था. ईरान के यहूदी सांसद मौरिस मोहतमद बताते हैं, "ये तस्वीरें छपने से शीराज़ में कुछ मौक़ापरस्तों को मौक़ा मिल गया और दो सिनेगॉगों पर हमले किए गए." सांसद बताते हैं कि ईरानी सुरक्षा बलों ने स्थिति को क़ाबू में किया और उन्होंने लोगों को बताया कि अख़बार में छपी तस्वीरों के बारे में जानकारी सच नहीं थी. बयानबाज़ी कट्टर परंपरावादी माने जाने वाले महमूद अहमदीनेजाद के राष्ट्रपति बनने के बाद से ईरानी यहूदियों की सुरक्षा और भविष्य के बारे में अंतरराष्ट्रीय तौर पर कुछ ज़्यादा ही चिंताएँ सामने आई हैं. राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने जब-तब इसराइल विरोधी भड़काऊ बयान दिए हैं, मसलन, इसराइल को दुनिया के नक्शे से मिटा देना चाहिए, सबसे ज़्यादा विवादास्पद बयान दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मारे गए यहूदियों की संख्या के बारे में रहा है जिसमें अहमदीनेजाद ने संख्या के बारे में सवाल उठाए थे.
यहूदी सांसद मोहतमद राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के विचारों की निंदा करने में काफ़ी आगे रहे हैं और यह दिखाता है कि ईरान में यहूदियों को अपने विचार व्यक्त करने की कुछ आज़ादी तो है. यह भी सही है कि अहमदीनेजाद के बयानों से यहूदियों की भावनाएँ आहत हुई हैं, साथ ही यह भी हुआ है कि उनके दफ़्तर ने तेहरान में एक यहूदी अस्पताल को चंदा भी दिया है. तेहरान के यहूदी अस्पताल के यहूदी निदेशक सियामाक मुर्सतेग़ का कहना था, "यहूदी विरोधी धारणा पूर्वी परंपरा नहीं रही है, यह इस्लामी धारणा भी नहीं है और न ही यह ईरानी परंपरा रही है. यहूदीविरोधी धारणा एक यूरोपीय धारणा रही है." वह दलील देते हुए कहते हैं कि ईरान में यहूदियों ने सबसे ख़राब दिनों में भी उतनी तकलीफ़ नहीं उठाई है जितनी उन्हें यूरोप में उठानी पड़ी है. रिश्ते-नाते लेकिन ईरान में रहने वाले यहूदियों की कुछ क़ानूनी समस्याएँ भी हैं. किसी यहूदी परिवार का कोई एक सदस्य अगर इस्लाम क़बूल कर लेता है तो उस परिवार की सारी संपत्ति उसी एक व्यक्ति को मिल जाएगी. यहूदी सेना में भर्ती नहीं हो सकते और तेहरान में सभी यहूदी स्कूलों के हेड मास्टर मुस्लिम हैं, हालाँकि ऐसा कोई क़ानून नहीं कि ऐसा ही होना चाहिए. इन सबसे अलग सबसे ज़्यादा नाज़ुक मसला इसराइल में रहने वाले यहूदियों के साथ उनकी रिश्तेदारियाँ हैं. ईरान में रहने वाले बहुत से यहूदियों के इसराइल में रिश्तेदार हैं.
सात साल पहले शीराज़ में रहने वाले कुछ यहूदियों पर इसराइल के लिए जासूसी करने का इल्ज़ाम लगाया गया था, लेकिन उन्हें आख़िरकार निर्दोष बरी कर दिया गया था. आज के दौर में तो बहुत से ईरानी यहूदी इसराइल आते-जाते हैं और इसराइल को ईरान का दुश्मन देश माना जाता है. तेहरान में यहूदियों के लिए गोश्त की एक दुकान में काम करने वाले हर व्यक्ति की रिश्तेदारी इसराइल में है. जिस तरह से मुसलमान हलाल गोश्त खाते हैं उसी तरह से यहूदी कोशेर गोश्त खाते हैं. गोश्त की एक दुकान में काम करने वाले हर्सेल गैबरील कहते हैं कि जब वह इसराइल गए तो वापसी पर उन्हें बहुत सी समस्याओं का सामना करने की आशंका थी लेकिन आव्रजन अधिकारी ने दरअसल कुछ भी सवाल नहीं किए. गैबरील कहते हैं, "बाहर जो कुछ भी कहा जाता है, वो झूठ का पुलिंदा है, हम ईरान में अच्छी तरह से रह रहे हैं. अगर कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं हैं और उन्हें परेशान न किया जाए तो वो हमें परेशान नहीं करते." गैबरील की एक ग्राहक मझली उम्र की एक गृहणी गीति भी हैं. वह भी गैबरील की बात से सहमत नज़र आती हैं. वह बताती हैं कि वह तेलअवीव में अपने दो बेटों के साथ टेलीफ़ोन पर आसानी से बात कर सकती हैं और उनसे मिलने के लिए भी जा सकती हैं. वह बताती हैं, "इसराइल जाने और वहाँ से आने में कोई दिक्कत नहीं है. मैं तुर्की के रास्ते एक बार इसराइल जा चुकी हूँ और एक बार साइप्रस के रास्ते और मुझे तो कहीं कोई परेशानी नहीं हुई."
वो समय गुज़र चुका है जब ईरानी इस्लामी क्रांति के शुरूआती दौर में यहूदियों और कुछ मुसलमानों को भी विदेश यात्रा के लिए पासपोर्ट हासिल करने में दिक्कत होती थी. यहूदी सांसद मोहतमद कहते हैं, "पिछले पाँच साल के दौरान ईरान सरकार ने ईरानी यहूदियों को इसराइल जाने, वहाँ अपने परिजनों से मिलने की खुली छूट दी है और जब वे वापिस आते हैं तो उन्हें कोई समस्या नहीं होती." वह बताते हैं कि जो ईरानी यहूदी दशकों पहले इसराइल जाकर बस गए थे उन्हें भी अब ईरान में अपने परिजनों से मिलने की इजाज़त दी जाती है. ईरान से निकलकर कहीं और जाने वाले यहूदियों की संख्या में भी काफ़ी कमी आई है. पहली बार यह पलायन 1950 के दशक मं हुआ था और दूसरी बार 1979 में इस्लामी क्रांति के समय में. जिन यहूदियों ने ईरान में ही रहने का विकल्प चुना है वह शायद उनका काफ़ी सोचा-समझा फ़ैसला है. तेहरान में यहूदी अस्पताल के निदेशक सियामक मुरसतेग़ कहते हैं, "हम ईरानी हैं और हम ईरान में पिछले क़रीब तीन हज़ार साल से रह रहे हैं. मैं ईरान से बाहर नहीं जाउंगा, मैं किन्हीं भी हालात में ईरान में ही रहूँगा." | इससे जुड़ी ख़बरें अमरीका-ब्रिटेन पर ईरान का आरोप20 सितंबर, 2006 | पहला पन्ना ईरान पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ हैं शिराक18 सितंबर, 2006 | पहला पन्ना 'ईरान पर अमरीकी रिपोर्ट ग़लत'14 सितंबर, 2006 | पहला पन्ना ईरान ने इराक़ को 'मदद' की पेशकश की12 सितंबर, 2006 | पहला पन्ना 'ईरान परमाणु कार्यक्रम जारी रखेगा'06 अगस्त, 2006 | पहला पन्ना विवाद पर सकारात्मक बहस हो: ईरान12 जून, 2006 | पहला पन्ना इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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