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मंगलवार, 25 जुलाई, 2006 को 03:55 GMT तक के समाचार
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'काश! हम कुछ कर सकते'

एजवेयर रोड, लंदन
लंदन में बसे लेबनान के लोगों में चिंता के अलावा एक बेबसी भी है
लंदन का एजवेयर रोड और उसके आसपास का इलाक़ा अरब समुदाय का गढ़ माना जाता है.

1975 से लेकर 1990 तक लेबनान गृह युद्ध की मार झेल रहा था जिसमें क़रीब एक लाख लोग मारे गए. उसी समय भारी संख्या में लोगों ने ब्रिटेन की ओर पलायन किया.

आजकल लंदन की एजवेयर रोड पर एक बार फिर 1982 में लेबनान पर हुए इसराइली हमले की यादें ताज़ा हो रही हैं.

यहाँ पर कई दुकानों पर अरबी भाषा के अख़बार बिकते हैं जिनके पहले पन्नों पर सिर्फ़ लेबनान की तबाही की तस्वीरें ही छाई हुई हैं.

इसराइल पर आरोप

पिछले पाँच वर्षों से लंदन में रह रहे लेबनानी मूल के हसन ने कहा कि लेबनान में जो हो रहा है वो इसराइल का आतंकवाद है.

 “काश मैं उनकी मदद कर सकती. लेकिन हम यहाँ है और कुछ नहीं कर सकते.
मार्ग्रेट बेर्री

लंदन में रहने वाले ज्यादातर लेबनान के लोगों का मानना है कि इसराइल की सैन्य कार्रवाई सिर्फ़ दो इसराइली सैनिकों की रिहाई के लिए नहीं शुरू की गई बल्कि इसराइल लंबे समय से इस कार्रवाई के बारे में सोच रहा था और यह एक सोची समझी रणनीति के तहत किया गया है.

लेबनान के एक रेस्त्रां में जब मैं कुछ लोगों से बात कर रही थी तो पास बैठे अब्दुल भावुक होकर बोले, “मेरा पूरा परिवार बेरुत में है. मैं हर रोज़ फ़ोन करने की कोशिश करता हूँ लेकिन आज मेरा संपर्क नहीं हो पाया क्योंकि इसराइल ने उसी इलाक़े में बमबारी की है जहाँ मेरा परिवार रहता है.”

लेबनान में फंसे रिश्तेदार

अरबी खाने की दुकान में काम करने वाले किफ़ा जोहर ने बताया कि किस तरह लेबनान में उनकी बहन फंसी हुई हैं.

एजवेयर रोड, लंदन
एजवेयर रोड के रेस्त्राओं में चर्चा का विषय लेबनान ही रह गया है

उन्होंने कहा “मेरी बहन चार दिन पहले तक वह दक्षिणी लेबनान में ही फंसी हुई थीं. मैं सिर्फ़ मोबाइल पर उनसे बात कर पाता हूँ लेकिन जब भी फ़ोन करता हूँ तो वह बहुत घबराई होतीं हैं और उनके आँसू नहीं थमते.”

किफ़ा ने बताया कि उनकी बहन के लिए बेरुत पहुँचना ख़तरे से ख़ाली नहीं था. उन्हें छोटे-छोटे गाँवों में रहना पड़ा था जो इसराइल के एक बम से ही पूरी तरह तबाह हो जाएँ.

लेबनान में क़रीब 41 प्रतिशत लोग इसाई समुदाय से हैं. लेकिन गृह युद्ध के दौरान वहाँ से भाग निकली मार्ग्रेट बेर्री को आज इस बात का बेहद दुख है कि वो ख़ुद लेबनान में नहीं हैं जहाँ उनका पूरा परिवार है.

वे कहतीं हैं, “काश मैं उनकी मदद कर सकती. लेकिन हम यहाँ है और कुछ नहीं कर सकते.”

लेबनान से दूर यहाँ लंदन में लोग काफ़ी हताश महसूस कर रहे हैं. वह कहते हैं कि लेबनान में अपने प्रियजनों को पैसे भेजना भी मुमकिन नहीं है क्योंकि वहाँ सब कुछ तहस-नहस हो गया है.

लेबनानी मूल के इन लोगों को अमरीका और ब्रिटेन जैसे शक्तिशाली पश्चिमी देशों की और से समय रहते कोई प्रभावशाली पहल न करने को लेकर नाराज़गी है.

बहरहाल, संघर्ष को रोकने के लिए हो रही कूटनीति और उसके प्रभावी होने तक मुश्किलों से घिरे अपने देश से दूर यहाँ लंदन में प्रार्थना के सिवा और वे कर ही क्या सकते हैं.

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