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सोमवार, 03 अप्रैल, 2006 को 23:44 GMT तक के समाचार
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पढ़ा लिखा कट्टरपंथी है मुसावी
मुसावी
मुसावी एक पढ़े लिखे व्यक्ति हैं और कई देशों में रह चुके हैं
मोरक्को में जन्मे और फ्रांस में बड़े हुए ज़करियास मुसावी 37 वर्ष के हैं लेकिन समझा जाता है कि उनके इस्लामी कट्टरपंथी बनने की शुरूआत ब्रिटेन में हुई.

उन्होंने लंदन में पढ़ाई की और लंदन के ही फिंसबरी पार्क मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाया करते थे, यह मस्जिद अपने कट्टरपंथी मौलवियों की वजह से काफ़ी चर्चा में रहा है.

मुसावी इस्लामी कट्टरपंथ की नई पीढ़ी के सही मायनों में प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं, वे पढ़े लिखे हैं, कई देशों की यात्रा कर चुके हैं और अफ़ग़ानिस्तान में अल क़ायदा के शिविर में ट्रेनिंग भी कर चुके हैं.

मुसावी अमरीका में फ्लाइंग स्कूल में विमान उड़ाने का प्रशिक्षण भी ले चुके हैं. मुसावी यह भी स्वीकार कर चुके हैं कि ग्यारह सितंबर के हमले के बारे में उन्हें पहले से पता था.

ग़ुस्सैल

अमरीका के ओकलाहोमा में मुसावी को प्रशिक्षण दे चुकीं ब्रेंडा कीन कहती हैं मुसावी बाक़ी लोगों के मुक़ाबले झगड़ालू और चिड़चिड़े स्वभाव के थे, वे अपनी बात को मनवाने के लिए काफ़ी ज़ोर डाला करते थे.

मुसावी के मामले की सुनवाई का एक दृश्य
मुसावी के चीख़ने चिल्लाने की वजह से कई बार अदालत के कामकाज में बाधा पड़ती थी

मुसावी ग़ुस्सैल स्वभाव के हैं इसकी झलक मुक़दमे की सुनवाई के दौरान कई बार मिली जब उनके चीख़ने-चिल्लाने की वजह से अदालत की कार्रवाई स्थगित करनी पड़ी.

दिलचस्प बात ये है कि मुसावी को ग्यारह सितंबर के हमले के पहले ही अमरीकी जाँच एजेंसी एफ़बीआई ने शक के आधार पर गिरफ़्तार कर लिया था, अगस्त महीने में ही यानी हमले से एक महीने पहले मुसावी अमरीकी जेल में पहुँच चुके थे.

मुसावी ने कहा कि जब उन्हें जेल में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ध्वस्त होने की खबर मिली तो वे बहुत ख़ुश हुए.

मुसावी का कहना रहा है कि वे अल क़ायदा के सदस्य तो थे लेकिन ग्यारह सितंबर के हमले की साज़िश में शामिल नहीं थे बल्कि एक अन्य हमले की योजना का हिस्सा थे.

उनका कहना था कि वे ओसामा बिन लादेन के निर्देश पर एक विमान को अमरीकी राष्ट्रपति भवन व्हाइट हाउस से टकरा देना चाहते थे.

पिछले वर्ष मुसावी ने स्वीकार कर लिया कि वे दोषी हैं लेकिन ग्यारह सितंबर के मामले में उनकी भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकी.

कुछ जानकारों का कहना है कि मुसावी दरअसल एक असफल आतंकवादी हैं, वे कभी भी हमला नहीं कर पाए और शायद कोई यह भी नहीं बता पाएगा कि वे अल क़ायदा के एक प्रमुख सदस्य थे या हाशिए पर पड़े कट्टरपंथी.

इतना ज़रूर है कि उन्हें इस मुक़दमे से एक प्रचार बहुत मिला और उसका उन्होंने फ़ायदा भी ख़ूब उठाया.

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