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हिंसा के कारण इराक़ में हज़ारों विस्थापित | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ में शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच हुई हिंसा की वजह से पिछले महीने 30 हज़ार से भी अधिक इराक़ी विस्थापित हुए हैं. संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अंतरराष्ट्रीय प्रवासी संगठन ने ये आँकड़े जारी किए हैं. फ़रवरी में समारा में शियाओं की एक प्रमुख मस्जिद पर हमले के बाद शिया और सुन्नी समुदाय के बीच काफ़ी तनाव बढ़ गया था. इस वजह से अपने ही देश में शरणार्थी बन गए ये लोग अब अस्थाई शिविरों में रह रहे हैं. लगभग पाँच सप्ताह पहले समारा में स्थित एक मस्जिद पर हुए हमले के बाद से ही इन दोनों समुदायों के बीच हिंसा भड़क उठी थी. हर दिन इस सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुए लोगों के शव शहर में यहाँ-वहाँ से बरामद हो रहे हैं. बग़दाद भी शिकार राजधानी बग़दाद के बारे में माना जाता रहा था कि वहाँ हर समुदाय के लोग रहते हैं और बीबीसी के मध्य पूर्व मामलों के विश्लेषक रॉजर हार्डी के अनुसार इसीलिए वहाँ से लोगों के जाने को गंभीरता से लिया जा रहा है.
सुन्नी परिवार उत्तर की ओर गए हैं, जिस क्षेत्र को 'सुन्नी ट्राएंगल' या सुन्नी बहुल क्षेत्र बताया जाता है. शिया दक्षिण की ओर नजफ़ जैसे शहरों की ओर चले गए हैं, मगर वहाँ भी स्थानीय परिवारों के लिए उनकी देखभाल करना मुश्किल ही साबित हो रहा है. इराक़ इससे पहले तक धर्मनिरपेक्ष कहा जाता रहा है जहाँ शिया और सुन्नी समुदायों के बीच शादी-ब्याह आम बात रही है. मगर बीबीसी के विश्लेषकों के अनुसार हिंसा और घृणा का ये दौर अब समाप्त कैसे होगा ये कहना मुश्किल हो गया है. 'ज़्यादा संख्या' इराक़ में विस्थापितों और प्रवासियों के मंत्रालय ने विस्थापितों का आँकड़ा लगभग 33 हज़ार दिया है जबकि संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अंतरराष्ट्रीय प्रवासी संगठन ने संख्या लगभग 30 हज़ार बताई है. वैसे प्रवासी संगठन का कहना है कि ये संख्या और भी बड़ी हो सकती है क्योंकि लोग अपने परिजनों या दोस्तों के साथ रहने भी चले गए हैं. इस बारे में संगठन की अम्मान में अधिकारी डाना ग्रैबर कहती हैं, "जब तक देश में सुरक्षा को लेकर स्थिर स्थिति नहीं बनती तब तक सांप्रदायिक हिंसा की वजह से लोगों का विस्थापन इसी तरह चलता रहेगा." |
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