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शनिवार, 31 दिसंबर, 2005 को 00:55 GMT तक के समाचार
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फ़्रांसीसी जहाज़ भारत में ही तोड़ा जाएगा
फ़्रांसीसी जहाज़ क्लेमांशू
फ़्रांसीसी जहाज़ क्लेमांशू को जोड़ने के लिए भारत भेजा जा रहा है
फ़्रांस की अदालत ने सेवा से हटा लिए गए एक फ़्रांसीसी युद्धक जहाज़ को तोड़ने के लिए भारत भेजने के ख़िलाफ़ दायर याचिका ख़ारिज कर दी है.

ये याचिका ग्रीनपीस सहित चार पर्यावरणवादी समूहों ने दायर की थी. पर्यावरणवादियों का आरोप है कि विमानवाहक इस युद्धक बेड़े क्लेमांशू में कम से कम 100 टन एसबेस्टस भरा हुआ है.

इन समूहों का कहना है कि एसबेस्टस ऐसा पदार्थ है जिसके कारण फेफड़े का कैंसर हो सकता है. इन पर्यावरणवादियों का आरोप है कि यह जहाज़ गुजरात के अलंग यार्ड के कर्मचारियों के स्वास्थ्य के लिए ख़तरा पैदा कर सकता है.

गुजरात का अलंग यार्ड दुनिया का सबसे बड़ा शिपयार्ड है जहाँ जहाज़ों को तोड़ने का काम होता है.

उनका कहना है कि अलंग यार्ड में काम करने वाले लोगों को एसबेस्टस के साथ काम करने के ख़तरों के प्रति कोई पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गई है.

तर्क

लेकिन फ़्रांसीसी अदालत ने उनके तर्क को ठुकरा दिया. फ़्रांसीसी अधिकारियों का कहना है कि अब यह जहाज़ भारत के लिए रवाना हो सकता है. इस समय यह जहाज़ फ़्रांस के टूलों नौसैनिक अड्डे पर खड़ा है.

लेकिन पर्यावरणवादी समूहों ने हार नहीं मानी है. उनका कहना है कि वे इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करेंगे. ग्रीनपीस और अन्य दो पर्यावरणवादी समूह पिछले कई महीनों ये कोशिश कर रहे थे कि यह फ़्रांसीसी जहाज़ भारत न जा पाए.

अभी भी इन समूहों के वकील का कहना है कि मामला अभी ख़त्म नहीं हुआ है और वे इसे लेकर फ़्रांस के सर्वोच्च अदालत में जाएँगे. लेकिन अपील से इस जहाज़ की रवानगी पर असर नहीं पड़ेगा.

इस पूरे मामले पर सरकारी वकील का कहना है कि ये पर्यावरणवादी ग्रुप ये ग़लत संकेत दे रहे हैं जैसे भारत में क़ानून ही नहीं है.

इसी महीने ग्रीनपीस और इंटरनेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स लीग्स ने एक रिपोर्ट में आरोप लगाया था कि भारत और अन्य एशियाई विकासशील देशों में जहाज़ तोड़ने के लिए भेजने वाले देश वहाँ की ख़राब व्यवस्था की अनदेखी कर रहे हैं जिसके कारण वहाँ हज़ारों लोगों की जान चली जाती है.

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