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ब्रिटेन में तेज़ी से बढ़ते भारतीय रेस्तराँ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहते है कि खाना बनाना भी एक कला है और इसे ब्रिटेन में भारतीय रेस्तराँ के ख़ानसामाओं से बेहतर शायद कोई नहीं जानता. पिछले कई वर्षों में जिस तरह से भारतीय खाना बनाने और उसे परोसने के तरीक़ों में बदलाव आया है उसने एक बार फिर लोगो का ध्यान आकर्षित किया है. इसमें सबसे बड़ा योगदान रहा है ख़ानसामाओं का जिन्होंने भारतीय व्यंजनों को नए आयाम दिए हैं. लंदन के सिनेमन क्लब रेस्तराँ में ख़ानसामा विवेक सिंह कहते हैं, "भारतीय खाना लोकप्रिय तो हमेशा से है मगर उसे सम्मान नहीं मिल रहा था. इसलिए बदलाव की ज़रूरत पड़ी". भारतीय रेस्तराँ अब केवल करी हाउस नहीं रहे हैं बल्कि लंदन के बेहतरीन रेस्तराँ में गिने जाते हैं. लंदन के मेला रेस्तराँ में ख़ानसामा कुलदीप सिंह कहते है कि भारतीय ख़ानसामाओं के लिए इस मुक़ाम तक पहुँचना कोई आसान काम नहीं था. कुलदीप सिंह कहते है, "ब्रिटेन में भारतीय खाने को लेकर लोगों की सोच बदलना सबसे मुश्किल काम था." ब्रिटेन में क़रीब 10 हज़ार भारतीय रेस्तराँ हैं जो हर हफ़्ते 20 लाख थालियाँ परोसते हैं और ये उद्योग हर साल ढाई अरब पाउंड से भी ज़्यादा का कारोबार करता है. भारतीय ख़ानसामाओं का मानना है कि उनकी सफलता में रचनात्मकता ने अहम भूमिका अदा की थी. जैसे दुनिया के बेहतरीन होटलों को पाँच या सात सितारा होटल का दर्जा दिया जाता है उसी तरह यूरोप और अमरीका में रेस्तराँ को भी एक ख़ास तरह का सितारा दिया जाता है जिसे मिशलिन स्टार कहते हैं. इस समय लंदन का टैमरिंड रेस्तराँ अकेला भारतीय मिशलिन रेस्तराँ है.
टैमरिंड में ख़ानसामा 28 वर्षिय एल्फ्रड प्रसाद कहते हैं कि यह उनके लिए सौभाग्य की बात है. उनके खाने के इतने दीवाने है, तो उनके खाने के जादू का राज़ क्या है? एल्फ्रड कहते हैं, "जादू तो मेरी माँ का खाना बनाने का तरीक़ा है. मैंने बचपन से माँ को रसोई में खाना बनाते देखा है. मेरी सभी तरकीबें माँ की देन है." माँ के हाथ के बने खाने का स्वाद तो दूर देश में भी याद रहता है मगर वो खाना बनाने का माँ का तरीक़ा अगर याद रह जाए तो पैसा और नाम दोनों कमाया जा सकता है |
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