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मध्य पूर्व पर संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र में पहली बार स्वतंत्र फ़लस्तीन के गठन का प्रस्ताव वर्ष 2002 में मार्च महीने में पारित किया गया था. फ़लस्तीनी समस्या के समाधान की दिशा में संयुक्त राष्ट्र का यह अब तक का सबसे बड़ा क़दम माना जाता है और फ़लस्तीनी इस प्रस्ताव पर अमल करने की माँग करते रहे हैं. प्रस्ताव के बारे में कुछ जानकारियाँ--- प्रावधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के इस प्रस्ताव में एक ऐसे क्षेत्र की परिकल्पना का समर्थन किया गया है 'जहाँ इसराइल और फ़लस्तीन एक दूसरे के पड़ोस में सुरक्षित रहें और उनकी निर्धारित सीमाएँ हों.' यह पहला अवसर था जब संयुक्त राष्ट्र के किसी प्रस्ताव में फ़लस्तीन को राष्ट्र का दर्जा देकर संबोधित किया गया हो. संयुक्त राष्ट्र के इस प्रस्ताव में मध्य पूर्व में सभी प्रकार की हिंसा, आतंक फैलाने वाली कार्रवाइयों तथा विध्वंस और लोगों को भड़काने वाली कार्रवाइयों पर तुरंत रोक लगाने मांग की गई. साथ ही, क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए सऊदी अरब के शांति प्रस्ताव के अलावा सभी कूटनीतिक प्रयासों का भी समर्थन किया गया था. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के इस 1397वें प्रस्ताव को 14 मतों के अंतर से पारित कर दिया गया. सीरिया ने मतदान में भाग नहीं लिया, लेकिन किसी सदस्य देश ने प्रस्ताव के ख़िलाफ़ मत नहीं दिया. महत्व प्रस्ताव का महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि इसका मसौदा अमरीका ने तैयार किया था.
उल्लेखनीय है कि पिछले कई वर्षों से अमरीका मध्य पूर्व के संबंध में संयुक्त राष्ट्र में कोई प्रस्ताव लाने से कतराता रहा है. अमरीका की यह पहल को इस बात का संकेत माना गया कि वह अपनी मध्य पूर्व नीति में बदलाव ला रहा है. हालांकि अमरीका लंबे अरसे से फ़लस्तीनी राष्ट्र की परिकल्पना को किसी भी शांति प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण अंग मानता रहा है और नवंबर में राष्ट्रपति बुश ने यही बात संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी कही थी. लेकिन इस नए संदर्भ में फ़लस्तीनी राष्ट्र को मिला अमरीकी समर्थन विशेष महत्व रखता है. संबंध संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव से कुछ सप्ताह पूर्व ही सऊदी अरब ने एक शांति प्रस्ताव रखा था जिसमें कहा गया था कि अगर इसराइल फ़लस्तीनियों के साथ समझौता करके उस ज़मीन का क़ब्ज़ा छोड़ देता है जो उसने 1967 में हथियाई थी, तो अरब देशों से इसराइल को मान्यता और शांति का आश्वासन मिल सकता है. उल्लेखनीय है कि दोनों ही पक्षों ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का स्वागत किया था. इसराइल ने इसे संतुलित करार दिया तो फ़लस्तीनियों का कहना था कि यह प्रगति का संकेत है. फ़लस्तीनी इसलिए भी ख़ुश थे कि अंतत: उन्हें फ़लस्तीनी राष्ट्र के निर्माण को लेकर कोई ठोस प्रतिबद्धता तो देखने को मिली. मगर इस उद्देश्य को हासिल कैसे किया जाए इस बारे में प्रस्ताव मौन है. मगर संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी ने कहा कि प्रस्ताव पर मतदान से पूर्व संयुक्त राष्ट्र के महासचिव कोफ़ी अन्नान ने फ़लस्तीनी भूमि पर इसराइली कब्ज़े को पहली बार ग़ैरकानूनी करार दिया है हिंसा इसराइल का लंबे समय से तर्क रहा है कि जब तक क्षेत्र में हिंसा नहीं थम जाती यह प्रस्ताव कोई मायने नहीं रखता. जहाँ तक विभिन्न शांति प्रस्तावों और प्रयासों का संबंध है वो फ़िलहाल इसराइली और फ़लस्तीनी नेताओं को वार्ता के लिए प्रेरित करने के अलावा कुछ ज़्यादा हासिल नहीं कर पाए थे, ग़ज़ा से यहूदी बस्तियाँ हटाना अब तक की सबसे बड़ी प्रगति है. अगर गज़ा पट्टी से बस्तियाँ हटने के बाद हिंसा कम होती है तो शायद कुछ और प्रगति हो सके, अब फ़लस्तीनियों की नज़रें पश्चिमी तट पर है, यह इलाक़ा भी 1967 की लड़ाई में उनसे छीन लिया गया था. | इससे जुड़ी ख़बरें सैनिक कट्टर यहूदियों की बस्ती में घुसे17 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना बस्तियाँ ख़ाली कराने के लिए कार्रवाई जारी18 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन- हमास 17 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना अराफ़ात के उत्तराधिकारी महमूद अब्बास17 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना अरियल शेरॉनः व्यक्तित्व परिचय17 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना मध्य-पूर्व संघर्ष का इतिहास17 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना घर लौटने की आस में लाखों शरणार्थी17 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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