|
'क़दीर ख़ान को सीआईए ने बचाया था' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ईरान, उत्तर कोरिया और लीबिया को परमाणु जानकारी देने की बात स्वीकार करने वाले पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल क़दीर ख़ान को उनके नीदरलैंड प्रवास के दौरान अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए की वजह से गिरफ़्तार नहीं किया गया था. यह बात नीदरलैंड के एक पूर्व प्रधानमंत्री रूड लबर्स ने बताई है, लबर्स का कहना है कि सीआईए ने 1975 में नीदरलैंड सरकार से कहा था कि ख़ान पर मुक़दमा न चलाया जाए. परमाणु जानकारी की तस्करी के मामले में नीदरलैंड की अदालत ने 1983 में अब्दुल क़दीर ख़ान की ग़ैर-मौजूदगी में उन्हें दोषी करार दिया था, लेकिन बाद में तकनीकी आधार पर यह निर्णय बदल दिया गया. पाकिस्तान के परमाणु बम के जनक कहे जाने वाले अब्दुल क़दीर ख़ान को अब पाकिस्तानी सेना की कड़ी निगरानी में रखा गया है. 1970 के दशक के मध्य में अब्दुल क़दीर ख़ान एक डच यूरेनियम कंपनी में काम करते थे जहाँ उनके ऊपर परमाणु जानकारी की तस्करी करने का आरोप लगा था. एल्मेलो में स्थित डच यूरेनियम संवर्धन प्लांट में इंजीनियर के तौर पर काम करने वाले ख़ान की गतिविधियों पर अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए की गहरी नज़र थी, वे जानना चाहते थे कि ख़ान किन लोगों से मिलते-जुलते हैं. एक डच रेडियो से बातचीत में लबर्स ने कहा, "अमरीकी चाहते थे कि ख़ान की जासूसी करके और अधिक जानकारी निकाली जा सके." अब्दुल क़दीर ख़ान 1976 में नीदरलैंड से पाकिस्तान आ गए और देश के परमाणु कार्यक्रम की नींव रखी. पाकिस्तान के सबसे बड़े राष्ट्रनायकों में रहे अब्दुल क़दीर ख़ान ने जब स्वीकार कर लिया कि उन्होंने परमाणु हथियार संबंधी ख़ुफ़िया जानकारी ईरान, लीबिया और उत्तर कोरिया को दी है तो पाकिस्तान सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ी. हालाँकि अब्दुल क़दीर ख़ान को राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने उनकी ग़लतियों के लिए माफ़ कर दिया लेकिन उन्हें सभी सरकारी पदों से हटाकर कड़ी सैनिक निगरानी में रखा गया. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||