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मानवाधिकार आयोग की तीखी आलोचना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की वार्षिक बैठक में उसकी अभूतपूर्व आलोचना हुई है. इस हद तक कहा गया कि दुनिया में दुर्व्यवहार को रोकने में इस संस्था की असफलता से पूरे संयुक्त राष्ट्र के रुतबे पर असर पड़ सकता है. ख़ुद मानवाधिकार आयुक्त लुई आर्बर ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के काम को भेदभावपूर्ण और चुन-चुनकर किया बताया. जहाँ बेलरूस, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे छोटे देशों के 'बुरे' मानवाधिकार रिकॉर्ड की तीखी आलोचना की गई वहीं पर्यवेक्षकों ने कहा कि चीन, रूस और जिम्बाब्वे जैसे प्रभावशाली देशों का ज़िक्र भी नहीं हुआ. सूडान के संदर्भ में दारफ़ुर की स्थिति पर सूडान की सरकार की भूमिका पर कोई टिप्पणी नहीं की गई. सूडान मानवाधिकार आयोग का सदस्य है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने आयोग के ढांचे में फेरबदल की बात कही. उनका कहना था कि इसमें उन देशों को ही शामिल किया जाना चाहिए जिनकी मानवाधिकार कायम रखने के विषय में प्रतिबद्धता पर कोई सवाल नहीं है. |
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