|
राहत कार्यों में समन्वय की मुश्किलें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुनामी के बाद मृतकों की संख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन साथ ही राहत कार्य भी जारी हैं. दुनिया भर की सरकारें इस ओर योगदान दे रही हैं. कहीं धन के ज़रिए तो कहीं सैन्य सहायता दे कर. आम लोग भी पीछे नहीं हैं. लेकिन शिकायतें ये आ रही हैं कि यह सब कुछ तेज़ी से पहुँच नहीं पा रहा है. इस तरह का संकट पहले कभी सामने आया हो ऐसा याद नहीं आता. भारी विनाश तो हुआ ही है इसका दायरा कई अलग-अलग देशों तक फैला हुआ है. और ज़ाहिर है राहत कार्य का जो अभियान शुरू किया गया है वह बहुत व्यापक भी है और जटिल भी. और इसीलिए विस्तृत समन्वय का काम लगभग अंसभव सा ही लग रहा है. किसी भी एक संस्था के पास-चाहे वह संयुक्त राष्ट्र ही क्यों न हो, न तो इतने संसाधन हैं और न ही इतने अधिकार कि वह इतनी बड़ी भूमिका निभा पाए.
ऐसे मौक़े पर वे संस्थाएँ काम आती हैं जो अलग-अलग देशों में अपने तौर पर काम में जुटी हुई हैं. स्थानीय स्तर पर सहायता जैसे सहायता संस्था चिल्ड्रेन इन नीड की ब्रितानी शाखा की ही मिसाल ले लीजिए. वह काफ़ी लंबे समय से श्रीलंका में काम कर रही है और वहाँ उसके स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर सरकार से अच्छे संबंध बने हुए हैं. वह कई यूरोपीय देशों से धनराशि ले कर श्रीलंका में जारी परियोजनाओं तक पहुँचा चुकी है. इस संस्था की ब्रितानी शाखा श्रीलंका में काम जारी रखे हुए है तो उसकी अमरीकी शाखा इंडोनेशिया के आचेह प्रांत में इसी तरह की भूमिका निभा रही है. इस स्तर पर देखा जाए तो अच्छा समन्वय बना हुआ है लेकिन व्यापक स्तर पर देखें तो इस त्रासदी की वजह से जो पुनर्वास और पुनर्निर्माण की समस्याएँ आड़े आने वाली हैं उनकी देखरेख के लिए कुछ विशिष्ट संस्थाओं की ज़रूरत पड़ेगी. मानवतावादी कामों में लगे कार्यकर्ताओं की क़ाबलियत और नीयत पर किसी को शक करने की ज़रूरत नहीं है लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मानवतावादी एजेंसियों को समय-समय पर आलोचना का सामना करना पड़ा है. इस महीने की शुरुआत में ब्रिटेन में अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्री हिलेरी बेन ने कहा ही था कि संयुक्त राष्ट्र के मानवतावादी कार्यों के समन्वय कार्यालय ओचा के पास समन्वय का काम सुचारू रूप से करने के न तो संसाधन हैं और न ही ताक़त. उन्होंने इसके लिए कुछ सुधारों का सुझाव दिया था. और अब जबकि संयुक्त राष्ट्र अपने मिशनों और उनकी क्षमताओं का पुनरआकलन करेगा तो इस त्रासदी के परिप्रेक्ष्य में यह बहस और तेज़ हो जाएगी. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||