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'मानवाधिकार के वायदे पूरे नहीं हो रहे' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस के मौक़े पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त लुईज़ आर्बुर ने मानवाधिकारों की स्थिति पर चिंता प्रकट की है. उन्होंने चेतावनी दी है कि मानवाधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र में वादे तो कई किए गए हैं और भविष्य को लेकर भी कई कल्पनाएँ हैं लेकिन ऐसा हो नहीं रहा. उन्होंने कि दुनिया के देशों को सुरक्षा की चाह और स्वतंत्रता की आवश्यकता में संतुलन स्थापित करना होगा. वैसे संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकार आयोग में सुधार की बात कही है. आरोप है कि आयोग का राजनीतिकरण हो गया है और यह सदस्य देशों के राष्ट्रीय हितों को ज़्यादा भाव देता है. वर्ष 2004 में दुनियाभर से मानवाधिकार हनन की कई घटनाएँ सामने आईं. लेकिन सबसे ज़्यादा चर्चित रहीं सूडान और इराक़ में अबू ग़रेब जेल की घटनाएँ. मानवाधिकार आयुक्त आर्बुर ने कहा कि मानवाधिकार को सबसे ज़्यादा ख़तरा जिनसे हैं उनमें दो प्रमुख हैं. एक आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई है तो दूसरे हैं वे इलाक़े जहाँ हथियारबंद संघर्ष चल रहे हैं. उन्होंने आतंकवाद के जवाब में की जा रही कार्रवाई को भ्रमित करने वाला बताया और कहा कि इससे नागरिक स्वतंत्रता पर ख़तरा पैदा हो रहा है. आर्बुर ने कहा कि उन इलाक़ों में भी मानवाधिकार संकट में है जहाँ हथियारबंद विद्रोह चल रहा है. उन्होंने माना कि मानवाधिक आयोग के साथ भी समस्या है. सूडान के दारफ़ुर इलाकें में चल रहे संकट पर विचार-विमर्श तक न कर पाने में नाकाम रहने पर कई मानवाधिकार संगठनों ने आयोग के अस्तित्त्व और उसकी विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाए हैं. आर्बुर ने कहा, "मेरा मानना है कि पिछले कई सालों के दौरान मानवाधिकार को बढ़ावा देने और उसकी रक्षा की दिशा में आयोग ने काम नहीं किया है. इस दौरान आयोग राजनीति में उलझा रहा और ऐसा लगा कि वह कुछ देशों के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में लगा है." हाल ही में संयुक्त राष्ट्र में जो सुधार की मांग उठी है, उनमें मानवाधिकार आयोग भी शामिल है. अब मांग की जा रही है कि आयोग में क्षेत्रीय गुटों द्वारा सदस्यों को नामांकित करने की बजाय संयुक्त राष्ट्र के सभी 191 सदस्य देशों को आयोग में सीट मिलनी चाहिए. लेकिन मानवाधिकार संगठनों ने इसका भी विरोध किया है. उनका कहना है कि आयोग को छोटा होना चाहिए और इसे सदस्य देशों के लिए मानवाधिकार को लेकर कड़े मानदंड बनाने चाहिए. |
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