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सिख छात्रों के मामले पर फ़ैसला आज | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ्रांस में एक अदालत इस मामले पर शुक्रवार को फ़ैसला सुनाएगी कि क्या पगड़ी पहनने वाले सिख छात्रों को स्कूल से निकाला जा सकता है. फ्रांस में नया क़ानून लागू होने के बाद पेरिस के एक स्कूल से निकले गए तीन सिख छात्रों ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील की थी. फ्रांस में सितंबर महीने में स्कूल का सत्र शुरू होने के बाद से ही विवाद ज़ोर पकड़ रहा है, अब तक कम से कम पाँच मुस्लिम छात्राओं को सिर ढँकने के कारण स्कूलों से निकाला जा चुका है. जिन तीन सिख छात्रों को स्कूल से निकाला गया है उन्होंने छोटी पगड़ी (पटका) पहनी थी और उनका कहना है कि उसे धार्मिक चिन्ह नहीं माना जाना चाहिए. ये तीनों छात्र पिछले सात महीनों से स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, कुछ स्कूलों ने पटका पहनने वाले सिख छात्रों को स्कूल आने की अनुमति दे दी है लेकिन जिस स्कूल के ख़िलाफ़ अपील की गई है उसका कहना है कि अलग-अलग धर्म के लोगों के लिए अलग-अलग नियम नहीं हो सकते. दरअसल, जब नया क़ानून बनाया गया तो फ्रांस के सिखों से कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया, फ्रांस में लगभग सात हज़ार सिख रहते हैं, उनके विरोध के बाद फ्रांस की सरकार का ध्यान उनकी तरफ़ गया. फ्रांस के नए क़ानून के मुताबिक़ स्कूलों में सभी धर्मों के प्रकट धार्मिक चिन्हों पर पाबंदी लगा दी गई है जिसमें हिजाब, सलीब, पगड़ी, यहूदी टोपी शामिल है. इस क़ानून के लागू होने के बाद फ्रांस में सिखों और मुसलमानों ने अनेक प्रदर्शन किए थे. यह मुक़दमे वैसे तो तीन छात्रों का है लेकिन इसे बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इस पर आने वाला फ़ैसला आगे के लिए एक क़ानूनी मिसाल बन जाएगा. फ्रांस की सरकार का कहना है कि यह क़ानून देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बचाने के लिए बहुत ज़रूरी है लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय इसे नस्लभेदी क़ानून बता रहे हैं. |
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