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फ्रांस में धार्मिक चिन्हों पर पाबंदी लागू | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ्रांस में सरकारी स्कूलों में हिजाब और पगड़ी सहित सभी धार्मिक चिन्हों के प्रयोग पर पाबंदी लगाने वाला क़ानून आज से लागू हो गया है. इस क़ानून से फ्रांस के एक करोड़ 20 लाख बच्चे प्रभावित होंगे जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं. फ्रांसीसी सरकार का कहना है कि प्रशासन और धर्म को पूरी तरह से अलग रखने की फ्रांसीसी परंपरा के अनुरूप ही यह क़ानून बनाया गया है. इराक़ में बंधक बनाए गए दो पत्रकारों ने सरकार से अपील की थी कि वह इस क़ानून को वापस ले ले ताकि उनकी जान बच सके लेकिन सरकार ने उनके अनुरोध को मानने से इनकार कर दिया.
क़ानून के मुताबिक़ सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे ऐसा कोई भी चिन्ह नहीं पहन सकते जिससे उनके धर्म का पता चलता हो, इनमें हिजाब, सिखों की पगड़ी, यहूदी टोपी और ईसाइयों के सलीब शामिल हैं. फ्रांस में आज स्कूली शैक्षणिक सत्र का पहला दिन है और वहाँ के अधिकारी इस क़ानून के लागू होने की वजह से काफ़ी सतर्क हैं क्योंकि इस क़ानून का सिखों और मुसलमानों ने जमकर विरोध किया था. फ्रांस में अरब देशों से आए मुसलमानों की बड़ी आबादी रहती है इसलिए इस क़ानून को लेकर हंगामा खड़े होने की आशंका व्यक्त की जा रही है. स्कूलों को निर्देश दिए गए हैं कि वे हिजाब या पगड़ी पहनकर आने वाले छात्र-छात्राओं को स्कूल में दाख़िल नहीं होने दें. क़ानून सरकारी स्कूलों में धार्मिक चिन्हों पर पाबंदी का प्रस्ताव फ्रांसीसी सरकार ने पिछले वर्ष दिसंबर महीने में रखा था और इस वर्ष मार्च महीने में ज़ोरदार बहस के बाद इसे संसद की मंज़ूरी मिल गई.
फ्रांस इस तरह का क़ानून बनाने वाला यूरोप का पहला देश नहीं है, तुर्की में ऐसे क़ानून कई वर्षों से लागू हैं. जर्मनी और ब्रिटेन में इस पर बहस तो चलती रही है लेकिन स्कूलों में हिजाब या यहूदी टोपी जैसे धार्मिक चिन्हों पर कोई क़ानूनी प्रतिबंध नहीं है. कुछ मानवाधिकार संगठनों ने भी फ्रांस के इस फ़ैसले की आलोचना करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन बताया है. फ्रांस में सरकारी नौकरियाँ करने वाले लोगों के धार्मिक चिन्हों का प्रयोग करने पर पहले से ही पाबंदी है. बंधक पत्रकार इराक़ में बंधक बनाए गए दो फ़्रांसीसी पत्रकारों ने अपने देश की सरकार से अपील की है कि स्कूलों में हिजाब पहनने पर लग रहा प्रतिबंध वापस ले लें, जिससे उनकी जान बच सके. अरबी टेलीविज़न चैनल अल-जज़ीरा पर प्रसारित एक वीडियो में दोनों बंधकों ने अपने देश के नागरिकों से भी अपील की कि वे क़ानून के विरुद्ध प्रदर्शन करें. अपहर्ताओं ने प्रतिबंध वापस लेने के लिए सोमवार तक की समय सीमा रखी थी, अब क़ानून के लागू होने के बाद इन पत्रकारों की हत्या किए जाने की आशंका और बढ़ गई है. इससे पहले दोनों पत्रकारों के समर्थन में राजधानी पेरिस में हज़ारों लोगों ने प्रदर्शन किया. फ़्रांसीसी सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि वह इस क़ानून को वापस नहीं लेगी. |
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