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फ्रांस में विवादास्पद क़ानून को समर्थन
फ्रांस में मंत्रिमंडल ने धार्मिक चिन्हों के प्रयोग पर रोक लगाने संबंधी क़ानून को अपना समर्थन दिया है. अगले सप्ताह संसद की बैठक शुरू होने वाली है जिसमें इस क़ानून को मंज़ूरी देने की प्रक्रिया शुरू होगी. एक विशेषज्ञ समिति ने सिफ़ारिश की थी कि फ्रांस में धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने के लिए पगड़ी, हिजाब और बड़े सलीबों के प्रयोग पर रोक लगा दी जाए. इस सिफ़ारिश का राष्ट्रपति शिराक ने समर्थन किया था. अगर ये क़ानून पारित हो जाता है तो यहूदी टोपियों, इसाई सलीबों, सिखों की पगड़ियों और मुसलमानों के हिजाबों पर रोक लग जाएगी.
इस क़ानून में प्रस्ताव रखा गया है कि सभी स्कूलों में धार्मिक पहचान दिखाने वाले चिन्हों और पोशाकों पर पूरी तरह रोक लगा दी जाए. राष्ट्रपति शिराक ने मंत्रिमंडल से कहा है कि देश की धर्मनिरेपक्षता को बचाए रखने के लिए ऐसे क़दम उठाए जाने की बहुत ज़रूरत है. फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने कहा, "इस मामले में कुछ नहीं करना ग़ैर ज़िम्मेदाराना रवैया होगा, पूरी तरह ग़लत होगा." उन्होंने कहा, "इस बारे में कार्रवाई न करने का अर्थ होगा कि स्कूल में शिक्षकों को कठिन परिस्थितियों में अकेला छोड़ देना." अगले मंगलवार को इस क़ानून को पहली बार संसद में पेश किया जाएगा. भारी विरोध इन प्रस्तावों का मुसलमानों और सिखों ने भारी विरोध किया है. फ्रांस में लगभग 50 लाख मुसलमान रहते हैं और उनका मानना है कि यह उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर हमला है. इसी तरह सिखों ने भी इस प्रस्तावित क़ानून का मुखर विरोध किया है और फ्रांस में कई प्रदर्शन किए हैं. लेकिन शिराक का कहना है कि वे इस क़ानून को लागू करके ही रहेंगे, वैसे फ्रांस के 70 प्रतिशत से अधिक नागरिक इस क़ानून को लागू किए जाने के पक्ष में हैं. शायद एक सर्वेक्षण से मिला यह आँकड़ा शिराक के आत्मविश्वास का कारण है. फ्रांस की विपक्षी सोशलिस्ट पार्टी का कहना है कि यह क़ानून अस्पष्ट है और ग़लत दिशा में उठाया गया क़दम है. सोशलिस्ट पार्टी का कहना है कि इससे मुस्लिम कट्टरपंथियों को लोगों को और बरगलाने का मौक़ा मिल जाएगा. |
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