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कई देशों ने हमलों की निंदा की | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया के कई देशों ने ईराक़ में हुए धमाकों की निंदा की है. ईरान ने इन घटनाओं को 'आतंकवादी' हमलों की संज्ञा दी है और कहा है कि मारे गए लोगों में कम से कम 40 ईरान के नागरिक थे. जहाँ ईरान ने इन घटनाओं को अमानवीय बताया है वहीं उसने अमरीकी सेना को भी दोष देते हुए कहा है कि सेना वहाँ पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं कर पाई. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर कहा है कि इन घटनाओं से इराक़ में गठबंधन फ़ौजों का 'इराक़ में राजनीतिक और आर्थिक' काम जारी रखने का निश्चय और दृढ़ होगा. जर्मनी और फ़्रांस ने भी इन हमलों की निंदा की है. इराक़ की शासकीय परिषद ने तीन दिन के शोक की घोषणा की है. परिषद के कुर्द, शिया और सुन्नी सदस्यों ने अपने मतभेद भुलाकर एक आवाज़ में इन हमलों की निंदा की है. उनका कहना है कि जो लोग इराक़ में जातीय हिंसा भड़काने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें सफल नहीं होने दिया जाएगा. भारत के लखनऊ शहर में शिया धर्मगुरु कल्बे जव्वाद ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ये इराक़ी मुसलमानों को आपस में लड़ाने का षड्यंत्र है. उनका आरोप था, "ये काम इसराइल या फिर ऐसी ही ताकतों का हो सकता है और वैसे तो अमरीका को भी इन घटनाओं से फ़ायदा होता है." उनका मानना था कि जब तक इराक़ में शांति कायम नहीं होती तब तक अमरीकी सेनाओं के वहाँ बने रहने का कोई न कोई कारण रहेगा. |
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