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सोमवार, 26 जनवरी, 2004 को 17:08 GMT तक के समाचार
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ईरान में चुनाव टालने की धमकी
शूरा-ए-निगहबान
शूरा-ए-निगहबान ने संसद का विधेयक निरस्त कर दिया

ईरान में सुधारवादियों ने चेतावनी दी है कि प्रत्याशियों से जुड़ा विवाद हल नहीं हो पाने की स्थिति में वे संसदीय चुनाव कराने से इनकार भी कर सकते हैं.

सुधारवादी माने जाने वाले राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी के एक प्रवक्ता ने कहा, "सभी प्रत्याशियों को समान अवसर मिलने चाहिए."

प्रवक्ता अब्दुल्ला रमज़ानज़ादे ने ईरान के छात्रों की समाचार एजेंसी आईएसएनए से कहा, "इस संभावना के बिना हम चुनाव नहीं करा सकते."

सुधारवादियों में इस बात को लेकर ग़ुस्सा है कि कट्टरपंथी मुसलमानों की संस्था शूरा-ए-निगहबान ने कई कोशिशों के बाद भी लगभग तीन हज़ार प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिया है.

इससे पहले शूरा-ए-निगहबान ने चुनाव में सुधारवादियों को हिस्सा लेने देने से जुड़े विधेयक पर 'वीटो' कर दिया.

ईरान की संसद ने सुधारवादी प्रत्याशियों पर लगा प्रतिबंध हटाने और चुनाव नियम बदलने वाला एक विधेयक रविवार को पारित किया था.

सांसदों की एक आपातकालीन बैठक में हस्तक्षेप का ये फ़ैसला लिया गया था और इस विधेयक पर शूरा-ए-निगहबान को सहमति देनी थी मगर उसने ऐसा नहीं किया.

वैसे ये सुधारवादी सांसद अगर चाहें तो अहम फ़ैसले लेने वाली एक और संस्था 'एक्सपीडियेंसी काउंसिल' में अपील कर सकते हैं लेकिन वहाँ भी कट्टरपंथियों का प्रभुत्व होने की वजह से फैसला उनके हक में होने के कोई आसार नहीं दिखते.

संसद में धरना देकर विरोध
शूरा-ए-निगहबान के फ़ैसले के विरुद्ध सांसदों ने संसद में ही धरना दिया

अकबर हाश्मी रफ़संजानी इस काउंसिल के प्रमुख हैं.

संसद में पारित विधेयक के अनुसार जो लोग पिछला चुनाव लड़ सके थे वे एक बार फिर चुनाव में भाग्य आजमा सकते थे.

ईरान में मौजूद बीबीसी संवाददाताओं का कहना है कि ये देश के अब तक से सबसे बुरे राजनीतिक संकटों में से एक है. इसमें लगभग साढ़े तीन हज़ार लोगों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा है.

ईरान में 20 फरवरी को चुनाव होना है.

अब सुधारवादियों का कहना है कि शूरा-ए-निगहबान के इस कदम से देश में स्वतंत्र चुनाव करवाने के उनके प्रयासों को गहरा धक्का लगा है.

कुछ का कहना है कि अब कट्टरपंथियों को करारा जवाब देने का एक तरीका है कि सांसदों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के सामूहिक इस्तीफ़े दिलवाए जाएँ.

वहीं कुछ और सांसदों का सुझाव है कि चुनाव का बहिष्कार किया जाए.

कुछ अतिसुधारवादी सांसद नागरिक अवज्ञा आंदोलन के ज़रिए जनता का समर्थन हासिल करने की बात कर रहे हैं लेकिन देश में सुधार की धीमी रफ्तार से जनता वैसे ही ऊब चुकी है और इन राजनीतिक दांव पेचों में उसकी ख़ास दिलचस्पी नहीं है.

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