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मंगलवार, 13 जनवरी, 2004 को 22:03 GMT तक के समाचार
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ईरानी चुनाव पर संकटः सवाल-जवाब
ईरानी संसद
ईरानी संसद के लिए चुनाव 20 फ़रवरी को होने हैं

ईरान में 20 फ़रवरी को होनेवाले चुनाव में सैकड़ों सुधारवादी उम्मीदवारों के खड़े होने पर पाबंदी लगा दिए जाने से देश में एक राजनीतिक संकट की स्थिति पैदा हो गई है. आइए जानते हैं कि इस फ़ैसले की तह में क्या कुछ छिपा है.

फ़ैसले की वजह क्या है?

ये फ़ैसला दरअसल ईरान में कट्टरपंथियों और सुधारवादियों के बीच जारी शक्ति संघर्ष का एक उदाहरण है. मजलिस यानी देश की संसद पर सुधारवादियों का प्रभुत्व है मगर संविधान में ऐसी कई संस्थाओं का उल्लेख है जिनका निर्णय ही अंतिम माना जाता है और ये संस्थाएँ सुधारवादियों के हाथों में हैं. ईरान में जल्दी ही इस्लामी क्रांति की पच्चीसवीं सालगिरह मनाई जानेवाली है.

 ये एक ऐसा फ़ुटबॉल मैच है जहाँ रेफ़री एक टीम को मैदान से बाहर भेजकर दूसरे को खेलने के लिए छोड़ देता है

उपराष्ट्रपति मोहम्मद अली अबताही

ऐसा हो सकता है कि कट्टरपंथियों को ये लगा हो कि चुनाव के बाद संसद पर सुधारवादियों का प्रभाव रोकने के लिए ये सही मौक़ा हो. बीबीसी के टीकाकार सादिक़ सबा का कहना है कि कट्टरपंथियों की हिम्मत इसलिए बढ़ी क्योंकि उन्हें ये लगा कि आम आदमी सुधारवादियों का साथ देकर अपनी ज़िंदगी ख़तरे में नहीं डालना चाहेंगे.

चुनाव में उतरने से किनको रोका गया?

जिनको रोका गया उनकी सही संख्या का तो पता नहीं है मगर संसदीय सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर ऐसा अनुमान है कि 8,000 उम्मीदवारों में से केवल आधे को चुनाव लड़ने की स्वीकृति दी गई. जिनको रोका गया उनमें 80 मौजूदा संसद के सदस्य हैं और सभी सुधारवादी हैं.

मोहम्मद रज़ा ख़ातमी भी इनमें से एक हैं जो ईरान की प्रमुख सुधारवादी पार्टी के प्रमुख हैं और ईरानीम राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी के भाई भी हैं. ऐसे लोग भी इनमें शामिल हैं जिन्होंने हाल ही में ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतोल्ला अली ख़मेनेई को पत्र लिखकर उनसे देश में और आज़ादी दिए जाने की माँग की थी. दो महिला कार्यकर्ताओं को भी रोक दिया गया है.

सुधारवादियों का क्या कहना है?

राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी
राष्ट्रपति ख़ातमी ख़ुद सुधारवादी हैं

सुधारवादी इसे देश में उदारवाद को रोकने की एक कोशिश बता रहे हैं. एक सुधारवादी मोहसिन मिरदामादी ने इस फ़ैसले को "रक्तहीन विद्रोह" की संज्ञा दी है. उपराष्ट्रपति मोहम्मद अली अबताही ने इसे एक ऐसा "फ़ुटबॉल मैच" बताया है जहाँ रेफ़री एक टीम को मैदान से बाहर भेजकर दूसरे को खेलने के लिए छोड़ देता है. इसके पहले भी कट्टरपंथी सुधारवादियों के रास्ते में बाधा खड़ी करते रहे हैं. एक बाधा खड़ी हुई थी शादी की उम्र के नाम पर जहाँ उदारवादी लड़कियों की उम्र नौ साल से बढ़ाकर 13 साल और लड़कों की उम्र 14 साल से बढ़ाकर 15 साल करना चाहते थे मगर कट्टरपंथियों ने ऐसा नहीं होने दिया.

राष्ट्रपति ख़ातमी की स्थिति क्या है?

ख़ातमी स्वयं एक सुधारवादी हैं और उन्होंने इस फ़ैसले की आलोचना की है. मगर उन्होंने लोगों से संयम रखने को कहा है और वे चाहते हैं कि ये मसला बातचीत से सुलझाया जाए. उन्होंने उन लोगों से अपील करने को कहा है जिन्हें रोक दिया गया. वे ख़ुद भी एक परिषद से बात कर सकते हैं जिसे 1998 में संसद और सर्वोच्च परिषदों के बीच के विवाद को हल करने के लिए गठित किया गया था.

इससे अन्य देशों के साथ ईरान के रिश्तों पर क्या असर पड़ सकता है?

इस फ़ैसले के महत्वपूर्ण नतीजे हो सकते हैं. हाल ही में ईरान ने संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के सदस्यों को ईरान के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों की सख़्ती से निगरानी करने देने के लिए स्वीकृति दे दी थी. फिर अमरीका ने भी ईरान के साथ बातचीत शुरू करने का संकेत दिया है. यूरोपीय संघ ने ये बातचीत शुरू भी कर दी है. ऐसे में अगर ईरान में सत्ता कट्टरपंथियों के हाथ में चली जाती है तो अमरीका और यूरोपीय देशों से ईरान की बढ़ती निकटता थम सकती है.

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