रूह कांप जाती है उनकी बातें सुनकर

पिछले कुछ वर्षों में रूस में अल्पसंख्यक जातियों या प्रवासियों पर दक्षिणवादी गुटों के हमले बढ़े हैं. उन्हें धमकाया जाता है, डराया जाता है और कई बार हत्या भी कर दी जाती है.
शुरु में तो रूसी प्रशासन ने इसे नजरअंदाज किया लेकिन अब ऐसे लोगों को जेल में भेजा जा रहा है जिन पर प्रवासियों को मारने के आरोप हैं.
लेकिन इन अतिराष्ट्रवादी गुटों ने अब बदला लेने की घोषणा की है.
ये लोग अब एक राजनीतिक गुट के तौर पर उभरना चाहते हैं जो व्लादीमिर पुतिन को टक्कर दे सके. हम अतिराष्ट्रवादी समझे जाने वाले ऐसे ही कुछ लोगों से मिले.
ख़तरनाक इरादे
जब मैं इनसे मिला तो रूस की राजधानी मॉस्को के एक जंगल में अधेड़ उम्र के ये पाँच रूसी पुरुष अपनी बंदूकों में गोलियाँ भर रहे थे.
टिमोर अपनी हंटिंग राइफल लेकर जंगल में निशाना लगाने के अभ्यास में लगे थे. असल में वो ये निशाना केवल जानवरों पर नहीं लगाना चाहते. उनके इरादे कहीं ज्यादा खतरनाक हैं.
टिमोर और उनके दोस्त अल्ट्रानेशनलिस्ट या अतिराष्ट्रवादी हैं, दक्षिणपंथी गुटों के सदस्य. इनका मानना है कि आज के रूस को उन लोगों से खतरा है जिन्हें वे प्रवासी मानते हैं. अपने साथ हथियार रखने को टिमोर गलत नहीं मानते.
टिमोर कहते हैं, “पहले के ज़माने में केवल प्रवासी, ग़ुलाम और पागल लोग हथियार नहीं रख सकते थे. अब मान लीजिए दस लोगों का गुट आप पर लोहे की छड़ों से हमला कर दे, अगर आपके पास तो बंदूक है तो बस उन्हें मार दीजिए. कोई समस्या ही नहीं है. आप अपने को बचा तो सकते हैं.”
'प्रवासियों की बर्बर हत्या'
टिमोर और उनके साथियों का कहना है कि उन्होंने कभी किसी को मारा नहीं है. लेकिन हाल के वर्षों में ऐसी घटनाएँ हुई हैं जब अतिराष्ट्रवादी गुटों के सदस्यों ने मध्य एशिया या रूसी कॉकसिस के लोगों को पीटा है या मार डाला है.
इस तरह के हमलों के वीडियो इंटरनेट पर डाले गए हैं. एलेक्ज़ांडर वरहफॉस्की एक गैर सरकारी संस्था में में काम करते हैं जो रूस में इस तरह की हिंसा पर निगरानी रखने का काम करता है.
प्रवासियों पर हमलों के एक वीडियो के बारे में एलेक्ज़ेंडर बताते हैं, “उन्होंने दो लोगों को पकड़ा था- एक तजाकिस्तान से और एक दागेस्तान से. इन्हें जंगल में ले जाया गया और एक को गोली मार दी गई. एक की चाकू से गर्दन काट दी थी. ये वीडियो इन लोगों की क्रूरता के बारे में बताते हैं. वे ऐसे वीडियो प्रोपोगैंडा के तौर पर बनाते हैं.”
विदेशियों को लेकर नफरत की जो बात एलेक्ज़ेंडर कर रहे थे वो 2008 में ज्यादा उभर कर आई. एलेक्ज़ेंडर का कहना है कि उसके बाद से प्रशासन ने ऐसे अपराध करने वालों को जेल में डालना शुरु किया है.
रूस में हमारी मुलाकात टेसाक से हुईं जो नस्लीय नफरत भड़काने के आरोप में जेल जा चुके हैं.
वे कहते हैं, “मुझे लगता है कि सभी प्रवासियों को रूसियों से दूर अलग गाँव में रहना चाहिए. उन्हें सही दस्तावेज़ लेकर आना चाहिए जिनमें लिखा हो उनमें क्या हुनर हैं. उन्हें सिर्फ अपने देश की वेश्याओं के साथ यौन संबंध बनाना चाहिए न कि रूसी स्कूली छात्राओं के साथ जिन पर प्रवासियों के हमलों का खतरा रहता है.”
पुतिन का बहुसंस्कृतिवाद

पुतिन बहुसंस्कृतिवाद को बढ़ावा देते हैं जो अतिराष्ट्रवादियों को पसंद नहीं है. लीलिया शेफसोवा मॉस्को की एक यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विश्लेषक हैं.
वे कहती हैं, “पुतिन चाहते हैं कि रूस सुपरपावर बने लेकिन राष्ट्रवादी विचाराधारा के आधार पर नहीं. ये बात अतिराष्ट्रवादी विचाराधारा वाले लोगों को समझ में आ गई है. वे समझ गए हैं कि पुतिन उनके लिए नहीं है कि पुतिन साम्राज्यवादी हैं और उनसे डरते हैं.”
ये तो पता नहीं कि पुतिन किस चीज से डरते हैं लेकिन हाँ जिस बात ने क्रेमलिन को डरा दिया था वो थे 2010 के दंगे. दिसंबर 2010 में रूस में जबरदस्त दंगे हो गए थे जब मॉस्को में एक फुटबॉल प्रशंसक का कत्ल हो गया था.
ये दंगे दर्शाते हैं कि अतिराष्ट्रवादियों की लोकप्रियता और आत्मविश्वास बढ़ रहा है. वे मानते हैं कि रूस तो रूसियों के लिए है.
अतिराष्ट्रवादी गुटों के जिन लोगों से मैं मिला वे रूसी समाज के हाशिए पर हैं.
ये स्पष्ट नहीं है कि क्या वो इस सोच को आगे लेकर जाना चाहते हैं या नहीं. लेकिन ये तो साफ है कि उनके प्रवासी विरोधी विचारधारा को बदलना आसान नहीं.












