'छत्तीसगढ़ की उदासीनता, आंध्रप्रदेश की समस्या'

- Author, सलमान रावी,
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, खम्मम, आंध्र प्रदेश से
आंध्र प्रदेश के भद्राचलम से 70 किलोमीटर दूर जंगलों के बीचो बीच एक छोटी सी बस्ती है जहाँ पंद्रह से बीस झोपड़ियां हैं. पहले ये बस्ती जंगल के मुहाने पर ही बसी थी, मगर आंध्रप्रदेश के वन विभाग के अमले नें इस बस्ती को जला दिया था.
यहां के आदिवासियों ने कुछ ही दूरी पर एक बार फिर अपना डेरा डाल दिया. मगर अब अदालत ने वन विभाग को इन बस्तियों में आग नहीं लगाने का निर्देश जारी किया है जिसके बाद से ये बस्ती बची हुई है.<link type="page"><caption> आदिवासियों के पलायन की रिपोर्ट का तीसरा भाग सुनने के लिए यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2012/01/120120_chhatis_refugee_psa.shtml" platform="highweb"/></link>
हाल ही में छत्तीसगढ़ से भाग कर आए आदिवासियों को सुविधाएं मुहैया कराने के सवाल पर स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के बीच विवाद छिड़ गया है.
दो पाटों के बीच
आरोप हैं कि आंध्र प्रदेश के इन इलाक़ों में बसने वाले आदिवासी शरणार्थियों की बस्तियों में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं.
वैसे प्रशासन ने ख़ास तौर पर एकीकृत आदिवासी विकास कार्यक्रम के तहत उन्हें राहत पहुंचाने की कोशिश ज़रूर की है.
मगर वन विभाग का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए जिससे छत्तीसगढ़ से और आदिवासी आकर्षित होकर यहां आने लगें. यही वजह है कि चाहकर भी अधिकारियों को अपने हाथ पीछे खींचने पड़े.
आंध्र प्रदेश के खम्मम ज़िले के अधिकारियों का कहना है कि वे इन आदिवासियों की एक सीमा के अन्दर ही मदद कर पाएंगे.
ख़ानाबदोश का दर्ज़ा

अधिकारियों का कहना है कि वे छत्तीसगढ़ से पलायन कर आंध्र के खम्मम और भद्राचलम में बसे आदिवासियों की उतनी मदद नहीं कर पा रहे हैं जितनी वे चाहते हैं.
वे इन्हें ख़ानाबदोश मानते हैं और कहते हैं कि इस वजह से उनके लिए कुछ भी ठोस तरीके़ से कर पाना संभव नहीं है.
भद्राचलम के एक वरिष्ठ अधिकारी हरि किरण के मुताबिक़, स्थानीय प्रशासन इस पशोपेश में है कि इन शरणार्थियों के लिए पक्के मकान दिए जाएं या नहीं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, ''हम बड़े पशोपेश में हैं. इस बात की क्या गारंटी है कि वे पांच सालों के बाद भी यहीं रहेंगे. अगर छत्तीसगढ़ के हालत सामान्य हो जाते हैं और वे वापस चले जाते हैं तब क्या होगा? मैंने अपने अमले से कहा है कि छत्तीसगढ़ से आने वालों का सर्वे किया जाए."
बंदिशों का हवाला

खम्मम जिले में चल रहे एकीकृक आदिवासी विकास कार्यक्रम के परियोजना अधिकारी प्रवीण कुमार का कहना है कि तमाम अड़चनों के बावज़ूद उनकी सरकार छत्तीसगढ़ से पलायन कर आये आदिवासियों की मदद करना चाहती है, मगर बहुत सारी बंदिशें भी हैं
प्रवीन कुमार का कहना है कि पिछले तीन दशकों से छत्तीसगढ़ के आदिवासी आंध्र के इन इलाक़ों में आते रहे हैं.
उन्होंने कहा, "अभी नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष चल रहा है. पहले ऐसा नहीं था. वे जंगल में आकर उसे काटकर बस रहे थे. उन्होंने एक तरह से जंगलों में घुसपैठ कर ली है. इस घुसपैठ को लेकर वन विभाग के लोगों का रूख़ बेहद कड़ा है.''
जंगलों की कटाई
प्रवीन कुमार का कहना है इन आदिवासियों की वजह से वनों की कटाई हो रही है. यहीं से विवाद शुरू होता है. इस विवाद के कारण बुनियादी सेवाएं देने में भी दिक्कत आती हैं.
इसके बावज़ूद प्रवीण कुमार कहते हैं कि उनके विभाग की कोशिश के बाद कई बस्तियों में बच्चों की पढ़ाई और लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई है. उनका कहना है कि इन आदिवासियों में से कई को राशन कार्ड और रोज़गार गारंटी कार्ड भी दिए गए हैं.
वे तर्क देते हैं कि चूंकि छत्तीसगढ़ से आने वाले आदिवासी एक जगह से दूसरी जगह ठिकाना बदल लेते हैं, इसलिए सही ढंग से उनका आंकलन नहीं हो पाता है.
सरकार पहल करे

मामले के जानकार अधिकारियों को ये भी लगता है कि अब छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश की सरकार के बीच इस मुद्दे पर गंभीरता से बातचीत होनी चाहिए.
एक अधिकारी प्रवीण कुमार ने बीबीसी से कहा, "हम कोशिश कर रहे हैं कि छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश की सरकारों में इस मुद्दे को लेकर अब बातचीत हो. हम चाहते हैं कि इस मामले का छत्तीसगढ़ में ही समाधान हो और हमारे लिए ये समस्या ना बने."
ये आदिवासी दरअसल उन लोगों की जमात है जिन्हें कोई अपनाना नहीं चाहता है. आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों ही जगहों पर इन्हें शक की निग़ाहों से देखा जाता है. भद्राचलम के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक गजराव भूपाल कहते हैं कि इन आदिवासियों का रिश्ता छत्तीसगढ़ के माओवादियों से है.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "छत्तीसगढ़ एक समस्याग्रस्त क्षेत्र है. हमारे साथ उसकी लम्बी सीमा है. वहां की परिस्थितियों की वजह से आदिवासियों के आने का सिलसिला जारी है. सिर्फ खम्मम में ही 19 हज़ार ऐसे आदिवासी आकर बसे हैं. ये वे लोग हैं जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वहां के नक्सालियों से रिश्ता है.
माओवादियों से संबंध

अधिकारियों का कहना है कि छत्तीसगढ़ के माओवादी इन आदिवासियों को अपनी ढाल बनाना चाहते हैं. वे आंध्रप्रदेश में शरण लेते हैं और कई बार उनकी बस्तियों से हथियार भी बरामद किए गए है.
छत्तीसगढ़ से भाग कर आए आदिवासियों के बीच कई सालों से काम करने वाली संस्था एग्रीकल्चरल एंड सोशल डेवलपमेंट सोसायटी यानी एएसडीएस के वेंकटेश का मानना है कि इस तरह के विस्थापितों के लिए राज्य और केंद्र सरकार के पास कोई योजना नहीं है.
वे कहते हैं कि सरकार को इन विस्थापितों के लिए जल्द क़ानून बनाना चाहिए.
उनका मानना है कि अगर अलग से क़ानून बनेगा तो इन विस्थापितों के लिए सरकारों को काम करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा.
ख़ानाबदोश ही सही, मगर ये लोग आख़िरी इस देश के ही नागरिक हैं. ये विस्थापित भी हुए तो सिर्फ़ अपनी जान बचाने के लिए.
ज़िम्मेदारी तय नहीं
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग से पिछले कई सालों से इनका पलायन जारी है, मगर आज तक ये तय नहीं हो पाया है कि सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना किसकी ज़िम्मेदारी है.
दो राज्यों की रस्साकशी में अपने ही घर में शरणार्थी बने ये आदिवासी आज कहीं के नहीं हैं.
अपनी ज़मीन, अपने लोग और अपना सब कुछ पीछे छोड़ आए इन आदिवासियों की आने वाली पीढ़ी को ये भी नहीं पता कि उनका भविष्य क्या होगा. उन्हें यह भी नहीं पता कि क्या वे कभी अपनी जड़ों तक वापस लौट पायेंगे.












