आज़ादी के 75 साल: सर गंगाराम कौन थे, जिनके नाम पर बना अस्पताल पाकिस्तान और भारत दोनों जगह है

- Author, साजिद इकबाल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
कुछ ही शख्सियतें हैं जिनकी विरासत भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में आज भी मौजूद हैं.
इनमें से एक हैं मशहूर इंजीनियर और समाजसेवी सर गंगा राम. सर गंगा राम ट्रस्ट और उनके परिवार वालों ने दिल्ली और लाहौर में इनके नाम पर जो अस्पताल बनवाया, वो आज भी साझी विरासत का प्रतीक है.
सर गंगा राम का घर विभाजन से पहले पाकिस्तान के लाहौर शहर में था, लेकिन विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया.
ब्रिटिश शासन से अगस्त 1947 में भारत आज़ाद तो हुआ लेकिन दो मुल्कों में बंट गया- भारत और पाकितान. विभाजन की इस त्रासदी में करीब 15 लाख लोग धार्मिक हिंसा के शिकार हुए जबकि एक करोड़ 20 लाख लोग शरणार्थी बन गए.
सर गंगा राम का निधन 1927 में ही हो चुका था, लेकिन उनकी विरासत की झलक सआदत हस मंटो की एक कहानी में मिलती है. यह कहानी विभाजन की एक सच्ची घटना पर आधारित है, जिसमें लाहौर स्थित सर गंगा राम अस्पताल के बाहर मौजूद उनकी प्रतिमा को हिंदू नाम के चलते गिराने के लिए एक भीड़ एकत्रित हो गई, जब उसमें एक आदमी घायल हुआ तो भीड़ चिल्लाई, "इसको जल्दी से सर गंगा राम अस्पताल ले चलो."
बाबा प्यारे लाल बेदी की किताब
गंगा राम अनुशासन प्रिय होने के साथ साथ बेहद दयालु शख़्स थे. उन्होंने आर्किटेक्चर, इंजीनियरिंग, खेती किसानी और महिलाओं के अधिकार के लिए काफ़ी कुछ किया. वे ख़ासकर विधवाओं की स्थिति को सुधारने के लिए भी काम करते रहे.
सर गंगा राम के बारे में जो भी जानकारी आज मौजूद है, उसमें से अधिकांश हिस्सा 1940 में उनके जीवन और काम पर आधारित बाबा प्यारे लाल बेदी की किताब 'हार्वेस्ट फ्रॉम द डेजर्ट: द लाइफ़ एंड वर्क ऑफ़ सर गंगा राम' से मालूम हुआ है.
उनका जन्म लाहौर से करीब 64 किलोमीटर दूर मांगतावाला गांव में 1851 को हुआ था. उनके पिता दौलत राम भारत के उत्तर प्रदेश से वहां से पहुंचे थे और पुलिस विभाग में जूनियर पुलिस इंस्पेक्टर के तौर पर काम करते थे.
बाद में परिवार पंजाब प्रांत के अमृतसर शहर आ गया और गंगा राम की यहीं के सरकारी हाई-स्कूल से पढ़ाई हुई.
स्कूल के बाद कॉलेज की पढ़ाई करने के लिए गंगा राम लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज गए. इसके बाद उन्होंने उत्तराखंड स्थित रूड़की के थॉमसन इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई करने के लिए स्कॉलरशिप हासिल की. उन्हें उस जमाने में 50 रुपये की स्कॉलरशिप मिलती थी, जिसमें से आधे पैसे वे अमृतसर में माता-पिता को भेज देते थे.

आधुनिक लाहौर का जनक
बहुत अच्छे अंकों से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद वे लाहौर के मुख्य इंजीनियर राय बहादुर कन्हैया लाल के दफ़्तर में प्रशिक्षु के तौर पर काम करने लगे.
इसके बाद से ही लाहौर शहर के निर्माण में गंगा राम के योगदान का समय शुरू हुआ. जल्दी ही वे शहर के शीर्ष सिविल इंजीनियर बन गए और अपने काम से उन्होंने शहर को आकार दिया.
उन्होंने लाहौर म्यूज़ियम, द एचिसन कॉलेज, द मेयो स्कूल ऑफ़ ऑर्ट्स (अब इसे नेशनल कॉलेज ऑफ़ ऑर्ट्स कहा जाता है), मुख्य डाकघर, मेयो अस्पताल का अलबर्ट विक्टर विंग और गवर्मेंट कॉलेज की केमिकल लेबोरेटरी जैसी इमारतों का ना केवल उन्होंने डिज़ाइन तैयार किया, बल्कि उसका निर्माण भी कराया.
बेदी ने लिखा है कि गंगा राम ने पश्चिमी तकनीक और उपकरणों की मदद और भारतीय स्थापत्य शैली के मेल से पंजाब की जलवायु के अनुकूल इमारतों का निर्माण किया. जहां गर्मी और ठंडक से दोनों से बचाव होता था और स्वच्छ हवा मिलती थी.
लाहौर शहर में आज भी मौजूद उनके निशानों को देखते हुए पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार खालिद अहमद गंगा राम को आधुनिक लाहौर का जनक कहते हैं.
गंगापुर का सपना
जब सरकारी मुलाजिम के तौर पर गंगा राम लाहौर शहर के निर्माण में जुटे थे, तब उनका दिल ग्रामीण पंजाब के लिए धड़कता था, जहां उनका बचपन बीता था.
सरकारी नौकरी से सेवानिवृत होने के बाद 1903 में वे अपने गांव पहुंचे. उनकी सेवाओं को देखते हुए पुरस्कार स्वरूप में चेनाब कॉलोनी में सरकार ने ज़मीन दी, इसी इलाके को बाद में लायलपुर और फ़ैसलाबाद के नाम से जाना गया.
यहीं उन्होंने आधुनिक सिंचाई और खेती की व्यवस्था वाले आदर्श गांव गंगापुर को स्थापित किया. उन्होंने गंगापुर से दो मील की दूरी पर स्थित बुकियाना रेलवे स्टेशन को जोड़ने के लिए एक अनोखी परिवहन व्यवस्था का निर्माण किया.
उन्होंने पतली रेलवे ट्रैक ही बिछाया जिस पर दो ट्रॉली को घोड़े खींचते थे. गंगापुर में उन्होंने जिस तरह की सिंचाई व्यवस्था की थी, उसे वे दूसरी जगहों पर भी स्थापित करना चाहते थे.
पंजाब के रेनाला खुर्द इलाके में उन्होंने महत्वाकांक्षी पनबिजली परियोजना स्थापित की थी.
आधिकारिक तौर पर इस परियोजना ने 1925 में काम करना शुरू किया था. तब इस संयंत्र के पांच टर्बाइन इंजन से 360 किलोमीटर की ज़मीन को सिंचाई की सुविधा मिलती थी, जिससे ज़मीन की उपज बढ़ गई थी.

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विधवाओं के हक़ के लिए संघर्ष
गंगा राम अपनी फाइलों को देखने और दिन की तैयारी के लिए सुबह जल्दी उठ जाते. बेदी लिखते हैं कि वह कभी-कभी उर्दू कवि मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली की लिखी कविता, मुनाजत-ए-बेवगन (विधवा की प्रार्थना) के छंदों का पाठ करते थे.
इन छंदों को पढ़ते हुए अक्सर वे अपने आंसू रोक नहीं पाते थे. संभवत: रूढ़िवादी हिंदू समाज में विधवाओं के लिए उन्होंने जो काम किया, उसके पीछे इस कविता से ही प्रेरणा मिली हो.
पंजाब प्रांत के अंबाला शहर में 1917 में उन्होंने हिंदूओं की धार्मिक बैठक में विधवाओं के पुनर्विवाह को लेकर प्रस्ताव पास कराने की कोशिश की.
हालांकि इसमें वे कामयाब नहीं हुए लेकिन उन्होंने तब अपने दो हज़ार रुपयों (उस दौर में ये बड़ी रकम थी) से विधवा विवाह संघ की स्थापना की थी.
यह संघ विधवाओं की मुश्किलों के बारे में सामाजिक जागरुकता के लिए काम करने लगा. थोड़े ही दिनों में गंगा राम को एहसास हुआ कि कुछ विधवाएं पुनर्विवाह के लिहाज से बूढ़ी हो चुकी हैं और उनमें से बहुत अपनी मर्जी से दोबारा शादी नहीं करना चाहती हैं.

सरकार की अनुमति से गंगा राम ने 1921 में ढाई लाख रुपये की लागत से हिंदू विधवाओं के लिए एक घर बनवाया, जहां इन महिलाओं को जीवन यापन करने के लिए प्रशिक्षित करने की व्यवस्था मौजूद थी. इस विधवाओं के लिए बने इस आश्रय में दो स्कूल और एक छात्रावास स्थापित किए गए.
यहां महिलाओं को हैंडिक्राफ्ट्स का ना केवल प्रशिक्षण दिया जाता था, बल्कि वे दूसरों को प्रशिक्षित कर सकें, इतनी तैयारी करायी जाती थी. गंगा राम ने वित्तीय चुनौतियों का सामना करने वाली हिंदू और सिख महिलाओं के लिए लेडी मेनार्ड इंडिस्ट्रियल स्कूल की स्थापिता में भी वित्तीय मदद की.
सर गंगा राम ट्रस्ट
1923 में सर गंगा राम ट्रस्ट की स्थापना की गई. बेदी की किताब के मुताबिक इसी साल लाहौर के बीचोंबीच सर गंगा राम मुफ्त अस्पताल और डिस्पेंसरी की स्थापना हुई, जो आगे चलकर अत्याधुनिक चिकित्सीय सुविधाओं से युक्त अस्पताल के तौर पर विकसित हुआ.
पुस्तक के मुताबिक यह पंजाब प्रांत में मेयो अस्पताल के बाद सबसे पुराना और बड़ा अस्पताल है. सर गंगा राम ट्रस्ट की ओर से 1924 में हिंदू छात्रों की मदद के लिए हिंदू स्टुडेंट्स करियर्स सोसायटी की स्थापना की. इसके अलावा सर गंगा राम बिजनेस ब्यूरो और लाइब्रेरी की स्थापना की गई.

गंगा राम ने अपने जीते जी जो आख़िरी चैरिटी का काम किया वह दो एकड़ ज़मीन पर एक हिंदू अपाहिज आश्रम की स्थापना करना था. यह एक तरह से बुर्जुगों और विकलांग लोगों के लिए आश्रय स्थल था.
सर गंगा राम की मौत 1927 में लंदन स्थित उनके घर में हुई, उसके बाद उनके पार्थिव राख के कुछ हिस्से को लाहौर लाया गया और उनकी इच्छा के मुताबिक अपाहिज आश्रम के बगल में दफ़न किया गया. अब ये आश्रम तो मौजूद नहीं है, लेकिन गंगा राम की समाधि आज भी मौजूद है.
बेदी के मुताबिक, जाने माने उर्दू लेखक ख़्वाजा हसन निज़ामी ने गंगा राम के निधन पर लिखा था, 'अगर कोई अपना जीवन दान दे सकता था तो वह अपना जीवन ज़रूर सर गंगा राम को दान देता ताकि वे कुछ दिनों तक और जिंदा रह कर भारत की उपेक्षित महिलाओं की भलाई का काम कर पाते."
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