You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पति की मौत, बच्चों की परवरिश और नाकाम इश्क़ की दास्तां
साल 2012 में अपने पति रसेल की मौत के सदमे ने सोफ़ी टाउनसेंड को बुरी तरह से तोड़ दिया था लेकिन दो बच्चों की माँ सोफ़ी को अपने बच्चों के लिए इस ग़म से हर हाल में उबरना था.
39 साल की उम्र में उन्होंने एक अकेली माँ और विधवा के तौर पर अपनी ज़िंदगी की नई शुरुआत की. यहाँ वो अपनी इस नई शुरुआत और संघर्ष के बारे में हमें बता रही हैं.
ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स के उत्तरी तट पर स्थित बायरॉन बे (बायरॉन की खाड़ी) एक अद्भुत जगह है. इसका वर्णन किसी हॉलिडे डेस्टिनेशन की तरह लग सकता है लेकिन इसके बिना यहाँ के बारे में बताना मुश्किल है.
शीशे की तरह आर-पार दिखने वाला साफ़ पानी, दूर-दूर तक फैले सफ़ेद रेत और वर्षावन के जंगल किसी जादुई जगह की तरह आभास देते हैं.
यह 2013 की बात है. मेरे पति को मरे एक साल हो चुके थे. मैंने जब बायरॉन जाने के बारे में पहली बार सोचा तो उस वक़्त मेरे ज़ेहन में उनकी राख वहाँ के समुद्र में बहाने का ख़याल था.
शवदाह गृह से उनकी राख एक बदसूरत से प्लास्टिक के डिब्बे में मुझे मिली थी. बायरॉन के नज़दीक ही मेरे पति का लालन पालन हुआ था. मुझे उस वक़्त लगा था कि उनकी राख समुद्र में जाकर बहा आएंगे. लेकिन जब मैं कार में सवार हुई तो मैं ये नहीं कर सकी.
सिडनी से वहाँ तक 10 घंटे का सफ़र था. ये किसी हॉलिडे ट्रिप की तरह था. हम वहाँ समुद्र किनारे रेत पर नंगे पांव चला करते थे और सुकून और राहत महसूस करते थे.
हमने ज़्यादातर वक़्त जो वहाँ का मुख्य समुद्री बीच था वहीं पर गुज़ारा. वहाँ ज़्यादा भीड़-भाड़ होती थी और वहाँ आराम से पैदल चलते हुए मछली और आईसक्रीम की दुकान तक हम पहुँच जाते थे.
लेकिन आख़िरी दिन मैंने अपनी बेटियों से कहा कि हम वेटगॉस बीच पर जाएंगे. मेरी बेटियाँ पॉपी और बेयर जो उस वक़्त 9 और 11 साल की थीं, वो मेरे इस आइडिया को लेकर ज़्यादा उत्साहित नहीं थीं. लेकिन मैं उस बीच को बहुत पसंद करती हूँ. उनके डैड पहली बार मुझे छुट्टियों में वहीं ले गए थे.
लहरों के बीच फंसा परिवार
उस वक़्त हमने वहाँ समुद्र किनारे बैठकर रेत पर ख़ूब मस्ती की थी. समुद्र की लहरों के उतार-चढ़ाव को देखा था. रेत पर तरह-तरह की आकृतियाँ बनाई थीं. ख़ैर मेरी बेटियाँ किसी तरह तैयार हो गईं और वो बीच पर पहुँच कर समुद्र की लहरों में मस्ती भी करने लगीं. उन दोनों ने मुझे खींच लिया. हम लहरों के उतार-चढ़ाव के साथ अपनी चिंताओं को भूलते चले गए और उसकी लय में कहीं खो से गए.
तभी अचानक से मुझे एहसास हुआ कि समुद्र की एक लहर हमें खींचकर किनारे से दूर ले गई है. बेयर और पॉपी भी मुझसे दूर हो गई थीं और वे दोनों मेरी तरफ़ तैरकर आने की कोशिश कर रही थीं. मैं उन्हें इस कोशिश में जूझते और उसमें नाकाम होते हुए देख रही थी.
मैंने चिल्लाकर उनसे कहा कि वो घबराएं नहीं और किनारे की ओर तैरना जारी रखें. ऐसे वक़्त में सबसे बुरा होता है कि आप लगातार किनारे की ओर आने की कोशिश करते हैं और इस कोशिश में नाकाम हो जाते हैं.
उस वक़्त आपको धैर्य और शांति बनाए रखना होता है और ताक़त बचाकर रखनी होती है. साथ ही साथ अपनी सांस बरक़रार रखनी होती है. मैं उन्हें डूबते हुए देख रही थी. मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था कि मैं खतरे के निशान को पार कर गई थी. मुझे कुछ पता नहीं चल रहा था कि ऐसा कैसे हुआ. मैं ज़ोर से चिल्ला रही थी "घबराओ मत" लेकिन साफ़तौर पर हम बहुत ख़तरनाक स्थिति में पहुँच चुके थे.
छोटी बेटी पॉपी मेरे नज़दीक थी. वो लगभग मेरे बांहों में आ गई थी. बेयर अब भी तैर रही थी लेकिन लहरें उसे मुझसे दूर कर रही थीं. वो ऊपर-नीचे हो रही थी. मैंने उसे इशारे से अपने हाथ हवा में उठाए रखने को कहा. तभी एक लहर पॉपी और मुझे चट्टानों की ओर ले गया.
मुझे ऐसा लगा कि हम वहाँ सुरक्षित हो सकते हैं अगर उस पर चढ़ गए तो लेकिन बार-बार हम चट्टान से टकरा रहे थे. मैं अपने शरीर को पॉपी और चट्टान के बीच में रखने की कोशिश कर रही थी. मैं उसे अपने सिर से ऊपर उठाकर रखने की कोशिश कर रही थी ताकि चट्टान से वो ना टकराए. लेकिन मैं इतनी ताक़तवर नहीं थी. बेयर भी मेरी आंखों से ओझल हो गई थी.
कहीं से फ़रिश्ता आया
तभी एक आवाज़ आई, "मैंने तुम्हें पकड़ लिया है. बस मुझे पकड़ी रहो."
मैंने कहा, "लेकिन मेरी बेटी और मेरी दूसरी बेटी, वो..."
लेकिन उसने अपना फ़ोकस बनाए रखा. वो लहरों में तैरता रहा और हमें किनारे रेत पर ले आया. वहाँ पर पहले से बेयर बैठी हुई कंपकंपा रही थी. हम तीनों बैठकर वहाँ तेज़-तेज़ सांसे ले रहे थे, रो रहे थे और साथ में राहत भी महसूस कर रहे थे.
जिस शख़्स ने हमें बचाया था, उसका मैं शुक्रिया अदा कर रही थी. वो मेरे आभार व्यक्त करने से थोड़ा असहज हो रहा था. मैं अपनी बेटियों को लेकर अपने किराए के आपार्टमेंट में आ गई. यह हमारे घर लौटने से पहले की आख़िरी रात थी.
मैंने खाना बनाया और हमने फिर एक साथ बैठकर खाया. हम साथ बैठकर बातें कर रहे थे. पॉपी मौत के मुँह से निकल कर लौटने के अनुभव के बारे में बोले जा रही थी. वो सारे घटनाक्रम को अपने नाटकीय अंदाज़ में पेश कर रही थी.
ऐसा महसूस हो रहा था कि वो सादा सा खाना बहुत ख़ास हो गया है. वो हमारे जीवित बचने के जश्न जैसा था. मैंने उनके लिए लंबे वक़्त से खाना नहीं बनाया था. उनके पिता की मौत के बाद उस साल पहली बार बनाया था. अपने पिता की मौत के बाद कहीं न कहीं उन दोनों ने अपनी मां को भी खो दिया था.
ये भी पढ़ें: 'अगर यह ख़ुश नहीं रहेंगी तो हम भी ख़ुश नहीं रहेंगे…'
जब रसेल के फेफड़े के कैंसर के बारे में पता चला था तब हमने तय किया था कि हम अपनी बेटियों के सामने जितना संभव हो सके उतना सहजता से रहने की कोशिश करेंगे.
वाक़ई में यह आइडिया बहुत पागलपन वाला था क्योंकि कैंसर में कुछ भी सामान्य नहीं रहता. अपने पिता को दिन ब दिन कमज़ोर, दुबला और अधिक बीमार होते देखना बिल्कुल सामान्य नहीं था उनके लिए. रसेल दर्द से राहत के लिए ज़्यादा से ज़्यादा मॉरफिन पर निर्भर होता चला गया था.
अपनी मां को ये सब संभालते देखना और अपने सामने रोने से बचने की कोशिश करते देखना उनके लिए सामान्य नहीं था.
कैंसर का पता लगने के नौ महीने के बाद फ़रवरी के महीने में उनकी मौत हो गई. अपनी मां को अपने पिता के सिरहाने बैठकर उनकी मौत पर सुबकते हुए देखना एक असहनीय पीड़ा वाला एहसास है मानो दुनिया अब ख़त्म हो चुकी है. यह कोई सामान्य अनुभव नहीं होता.
ज़िम्मेदारियों का बोझ
रसेल की मौत के बाद मैं दुख में डूबी हुई थी. मेरे बेटियों ने इसे महसूस किया था. वो मेरी तरफ़ बेहतर होने की उम्मीद से देखा करती थीं. पहले साल तो ऐसी बहुत सारी चीज़ें थीं जिसके बारे में मुझे पता ही नहीं था कि उन्हें कैसे करना है. मुझे बिजली और गैस के बिल भरने थे. इसके बारे में मुझे जानना था क्योंकि ये हमेशा रसेल के नाम पर होता था. मुझे उसकी मदद के बिना घर को साफ-सुथरा रखना था.
ये भी पढ़ें: एक दृष्टिहीन जोड़े की दिलचस्प प्रेम कहानी
जिस साल उसकी मृत्यु हुई, उस साल की सर्दियों में मुझे यह सीखना था कि कैसे घर को गर्म रखते हैं. हमने हफ़्तों ठंड में ठिठुरते बिताया. मुझे यह भी नहीं पता था कि कैसे उन बच्चियों को मुझे अपने सीने से लगाकर उन्हें बेहतर महसूस करवाना है.
मैंने लंबे वक़्त से उन्हें शोक में रहने की वजह से अच्छे से खाना नहीं खिलाया था. मैं सब भूल चूकी थी. मैंने जब उस दिन पास्ता बनाया जो थोड़ा ज़्यादा पक गया था तो किसी दावत खाने की तरह महसूस हुआ. रसेल की मौत के एक साल गुज़र जाने के बाद हमने फिर से जीने की शुरुआत की. लेकिन यह शुरुआत इतनी आसान भी नहीं थी.
कई दिन अच्छे गुज़रे तो कई बुरे दिनों का भी सामना करना पड़ा. वे एक-दूसरे से बहस करती थीं वो दोनों मुझसे भी बहस किया करती थीं. घर में अक्सर ख़ामोशी छाई रहती थी. शायद ही कभी हंसी की आवाज़ सुनने को मिलती थी.
मैं कभी-कभार रोते हुए उठ जाती थी. अपनी बेटियों की आंखों में जो उदासी मुझे दिखाई देती थी वो मेरी समझ से कहीं अधिक होती थी. रसेल की पहली बरसी के बाद की सर्दियों में मैंने घर को गर्म रखना सीख लिया. अब हम साथ बैठकर खाने लगे. मैं रात में खाना बनाती थी. मैं उन्हें कुछ थोड़े-बहुत खाना बनाना सिखाने लगी. हम साथ बैठते और दिन कैसा बीता, इसे लेकर बातें करते. हाँ, लेकिन अब हम चार नहीं सिर्फ़ तीन ही थे.
हम बेहतर महसूस करने की कोशिश करते.
रसेल की दूसरी बरसी के कुछ महीने के बाद जब पॉपी 11 साल की होने वाली थी, तब उसके एक रात पहले मैंने उसे स्कूल ले जाने के लिए कपकेक बनाए. यह एक तरह से तमाम उथल-पुथल के बाद ज़िंदगी की जीत की निशानी थी.
अकेलेपन का एहसास
सुबह जब हम स्कूल पहुंचे तो उसने मुझे जल्दी-जल्दी गुडबाय किया और केक लेकर अंदर चली गई क्योंकि उसे अपने दोस्तों से मिलने की जल्दी थी. मैं उसे क्लास में जाते हुए देखती रही. बच्चों ने उसे घेर लिया था और उसी पल मुझे अपने अकेलेपन का एहसास हुआ.
अक्सर यह एहसास उन लम्हों में होता जब बच्चों को स्कूल छोड़कर लौट रही होती या फिर कभी जब बेयर बोलती कि वो अपने दोस्तों के साथ वयस्त है और मेरे साथ फ़िल्म देखने नहीं आ सकती है. बेयर अब 13 साल की हो गई थी. वो अपने हाई स्कूल के दूसरे साल में पहुँच चुकी थी और कम ही अपने कमरे से बाहर निकलती थी.
ये भी पढ़ें: रतन टाटा अमरीका में शादी करने ही वाले थे कि...
मैं अपनी बेटियों से बहुत प्यार करती हूँ लेकिन जैसे-जैसे वो बड़ी हो रही थीं मुझसे दूर होती जा रही थीं. मुझे किसी की ज़रूरत महसूस होने लगी थी.
मैं ऐसा कोई चाहती थी जो मुझसे ये पूछे कि मेरा दिन कैसा रहा. कोई ऐसा जो मुझे रातों में अपनी बाहों में रखे. मैं इसे लेकर कुछ भी फ़ैसला करने से डरी हुई थी लेकिन नहीं करने को लेकर भी डरी हुई थी क्योंकि अकेलापन मुझे खाए जा रहा था.
मैंने इंटरनेट पर डेटिंग आज़माना शुरू किया लेकिन वो काम नहीं कर सका. मैंने अपनी एक दोस्त को तब बताया कि कैसे इंटरनेट पर मिले एक आदमी ने मुझे बताया कि वो उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में पाई जाने वाली मछली को लेकर पागल है. तब मेरी दोस्त ने कहा कि सिर्फ़ इस आधार पर किसी को नापसंद नहीं किया जा सकता है.
हालांकि वो मुझे इसके बाद एक बार में ले गई. वहाँ मेरी मुलाक़ात किसी से हुई. मुझे उसकी मुस्कान पसंद थी. उसकी हंसी और उसके मज़ाक सब बहुत सहज लगे. उससे मैं प्रभावित हुई.
हमने बातें कीं और ठहाके लगाए. कुछ वक़्त के लिए मेरा अकेलापना ख़त्म होता चला गया. मुझे वो वक़्त बहुत सुकून भरा लगा. मुझे इसकी ज़रूरत थी. हम बहुत जल्दी एक-दूसरे के क़रीब आते गए.
कुछ हफ़्तों के बाद मैं बेटियों से उसे मिलाने के बारे में सोचने लगी. मैं जानती थी कि वे उससे मिलकर ख़ुश होंगी. वो भी उन्हें प्यार करेगा. लेकिन उसने कहा कि वो अभी इतनी जल्दी उनसे मिलने को लेकर सहज नहीं है और अभी इंतज़ार करना चाहता है. लेकिन मैं इस बात को लेकर आश्वस्त थी कि यह सही होगा.
मैं चाहती थी कि वे उन्हें जाने. मुझे लगता रहा कि वो मुझे ख़ुश रखता है तो वो मेरी बेटियों को भी ख़ुश रखेगा. तो फिर मैं क्यों इंतज़ार करती?
मैंने उससे कहा कि मैं उससे प्यार करती हूँ. लेकिन उसे इस बात को लेकर झिझक थी यह बहुत जल्दी है.
पहले नाकाम प्यार का एहसास
अब मैं फिर से अकेली हो चुकी हूँ. यह एहसास बिल्कुल वैसा है जैसे किसी ज़ख़्म को खरोंच देना. जब तक आप उस ज़ख़्म को नहीं खरोंचते तब तक उसका दर्द इतना ही रहता है कि आपको पता नहीं चलता लेकिन जैसे ही आप उसे खरोंचते हैं तो वो ऐसी असहनीय पीड़ा में तब्दील हो जाता है कि मानो जान ही निकल जाए.
रसेल जो मुझे प्यार करता था, उसकी ग़ैर-मौजूदगी में यह मेरे पहले नाकाम प्यार का एहसास था. जब आप किसी की मौत के सदमे से बाहर आने की कोशिश करते हैं तो वो इतना सीधा, सरल और आसान नहीं होता.
जिन दोस्तों और परिवार के लोगों ने मुझे साथ रखा और सहारा दिया, वो अब भी मुझे हौसला देते हैं. मैं अपनी बेटियों को मेरी मदद के बिना आगे बढ़ते हुए देखकर बेहतर महसूस करती हूँ.
अब वो दोनों नौजवान हो चुकी हैं. बेयर 20 साल की हो गई है और पॉपी 17 की.
इस दौरान एक दिन एक बुटिक में जब मैं अपने लिए जींस ले रही थी तब रसेल का फेवरेट गाना रेडियो पर आ रहा था. मैं वहाँ से हिल नहीं सकी. दुकान पर काम करने वाले ने दरवाज़े पर दस्तक दी लेकिन मैं कुछ कह नहीं सकी.
इसी तरह से किसी एक और दिन मैं याद कर रही थी वो कलई लगे सफ़ेद शर्ट में कैसा दिखता था और फिर मैं टूट गई. उसके बिना जब रातों में मैं अकेले कूड़ा डालने जाती थी तब डर जाती थी कि वो मेरी मदद के लिए मेरे साथ नहीं है.
लेकिन ऐसे भी लम्हें इस दौरान याद आए जब मैं उसके किसी मज़ाक को याद कर हंस पड़ी.
उसके अंतिम अवशेष अब भी प्लास्टिक के उस डिब्बे में पड़े हुए हैं. किसी महंगे कलश पर पैसे ख़र्च करने की बात उसे पसंद नहीं आती. मुझे नहीं पता कि उसे कहाँ जाकर डालना है. हर जगह मुझे बहुत दूर लगती है.
ये भी पढ़ें: बंदूक के बीच पनपा प्यार, नक्सली ने डाले हथियार!
मैंने सोचा था कि अपने बाग़ीचे में उसे बिखेर दूंगी लेकिन जैसे ही मैंने इसके लिए अपना मन बनाया तो एक दिन आंधी में हमारे घर के पीछे की दिवार गिर गई. साफ़-सफ़ाई के बाद इसे फिर से करना मुझे बहुत मुश्किल जान पड़ा.
लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैं अकेली अच्छा महसूस करती हूँ लेकिन सच पूछिए तो मैं ख़ुद को बहुत अकेली नहीं पाती हूँ. मेरी बेटियाँ हैं, मेरा कुत्ता है, मेरा परिवार है और मेरे दोस्त हैं. मैं अपने पड़ोसियों के साथ कॉफ़ी पीने जाती हूँ. पार्क में टहलती हूँ. यह ठीक है. ठीक से कुछ ज़्यादा ही ठीक है.
कभी-कभार मैं सपना देखती हूँ कि वो ज़िंदा है और मैं जग जाती हूँ और उसे नहीं पाकर सदमें में चली जाती हूँ. लेकिन तभी मैं याद करती हूँ उसका पीला ज़र्द पड़ चुका चेहरा. उसकी वो दुबली होती काया. उसकी आख़िरी लेती हुई सांस जो घरघराहट से भरी हुई और अजीब थी. मुझे अच्छी चीज़ें भी याद आती हैं. बहुत सारी अच्छी बातें हैं याद करने के लिए और बहुत सारी चीज़ें हैं जिनके भरोसे मैं आगे भविष्य की ओर देखूँ लेकिन इस बीच मैं ठीक हूँ.
बच्चों के नाम बेयर और पॉपी बदले हुए हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)