आर्मीनिया की शहज़ादी, जिसकी कहानी मध्य पूर्व से मंगोलिया तक फैली है

इमेज स्रोत, TbilisiStMus
- Author, असद अली
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
"औरत क्या है? शैतान का एक हथियार, एक जाल जिसमें हम फंस कर मौत के मुंह में चले जाते हैं. औरत क्या है? बुराई की जड़, किनारे पर फंसा दुर्घटनाग्रस्त जहाज, गंदगी का ढेर, एक घिनौनी ग़लती, आंखों का धोखा."
औरतों के बारे में ये शब्द, 13वीं शताब्दी के बाइज़ेंटाइन साम्राज्य के एक ईसाई बुद्धिजीवी तयोनास्ट्स के हैं.
उसी शताब्दी में महिलाओं के बारे में एक और दृष्टिकोण के अनुसार, "राजा के सेवकों को कभी भी सत्ता नहीं मिलनी चाहिए, इससे उनकी (राजा) की शान बर्बाद हो जाती है. यह बात विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए सच है. जो नक़ाब पहनने वाली हैं और कम अक्ल हैं.... यदि राजाओं की पत्नियां शासकों की भूमिका निभाना शुरू कर देती हैं, तो वे केवल दूसरों के हुक्म का पालन करती हैं. क्योंकि वे दुनिया को उस तरह से नहीं देख सकती हैं जिस तरह से पुरुष देखते हैं. पुरुषों की नज़र हर समय वैश्विक मुद्दों पर होती हैं... हर दौर में, जब भी राजा अपनी रानियों के प्रभाव में रहे हैं, तो इसका परिणाम अराजकता, शर्मिंदगी, बदनामी और भ्रष्टाचार के अलावा कुछ नहीं रहा."
ये शब्द 11वीं सदी के प्रसिद्ध व्यक्तित्व 'निज़ाम-उल-मुल्क', के राजाओं के लिए लिखे गए दिशा निर्देश 'सियासतनामा या सियार अल मुल्क' से लिए गए हैं. जिससे 13वीं शताब्दी में भी मार्गदर्शन लिया जा रहा था.
एक इतिहासकार के अनुसार, यह एक ऐसा समय था जब शासन के दिशा निर्देशों में, चाहे वो ईसाई हों या मुस्लिम, महिलाओं के विषय पर समान स्त्रीद्वेष झलकता था.
एक तरफ़ यह वैचारिक वातावरण और दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत. इन दोनों के बीच विरोधाभास का लाभ उठाते हुए, मध्य पूर्व में भी, महिलाएं पर्दे के पीछे और सामने से सत्ता के लिए संघर्ष में सक्रिय दिखती हैं. कई बार वे सफल हुई हैं और कभी-कभी वे असफल भी रही हैं.
उनमें से एक पूर्व दासी शजर-अल-दार है, जो बाद में अय्यूबी साम्राज्य की रानी बनी. इसके अलावा, मंगोलिया की शासक तोरगिन ख़ान, जॉर्जिया की रानी टेमर, रानी टेमर की वारिस, उनकी बेटी रानी रुसोदान, अलेप्पो की शासक ज़ैफ़ा ख़ातून, करमान की शासक तुर्कान ख़ातून और हमारी आज की कहानी की केंद्रीय किरदार जॉर्जिया और आर्मीनिया की संयुक्त फ़ौज के कमांडर इवान की बेटी टेम्टा शामिल हैं.
टेम्टा को अपने जन्म के समय ही वो सभी कमज़ोरियां विरासत में मिली थी, जो हर बेटी को हर दौर में और हर समाज में मिलती थी. उनकी जन्म तिथि का नहीं पता और यह भी संभव था कि, जॉर्जिया जैसे शक्तिशाली साम्राज्य के दरबार में परिवार की महत्वपूर्ण स्थिति के बावजूद, उनका नाम भी शायद किसी को ज्ञात न होता.
इतिहास से पता चलता है कि उनके परिवार द्वारा किसी चर्च या धार्मिक इमारत के निर्माण के बाद, पुरुषों के नाम लिखे गए. और पुरुषों में भी वो पुरुष अधिक महत्वपूर्ण थे जिनको संभवतः कोई राजनैतिक स्थान मिल सकता था. महिलाओं का बहुत कम उल्लेख है. परिवार की किसी भी इमारत पर टेम्टा का नाम नहीं है. उनकी पहचान उनके पिता से थी. उनका जीवन किस तरफ़ करवट लेगा यह भी उनके पिता के हितों पर निर्भर करता था.
तो फिर उस जीवन की शुरुआत कैसे हुई जब इतिहासकार यह लिखने के लिए मजबूर हो गये कि "टेम्टा की कहानी में, माउंट कॉफ़ (जॉर्जिया और आर्मीनिया) के ईसाई, अय्यूबी, सेल्जुक तुर्क और अनातोलिया और सीरिया के अन्य तुर्की एकजुट हो जाते हैं."

इमेज स्रोत, Tamta's World
यह 13वीं शताब्दी के शुरुआती दिनों की बात है, जब पूर्वी अनातोलिया के राज्यों के लिए हर गर्मियों के मौसम में एक दूसरे से जंग सामान्य बात थी.
टेम्टा के पिता, ईवान भी, जॉर्जिया की सेना को लेकर एक ऐसी ही मुहिम पर इखलात गए हुए थे. लेकिन वहां ऐसी परिस्थिति बनी कि घेराबंदी के दौरान उन्हें क़ैदी बना लिया गया. उनकी रिहाई के लिए दोनों पक्षों की कूटनीतिक मंडलियां हरकत में आ गईं और एक समझौता किया. इस समझौते में उनकी बेटी टेम्टा, और इखलात के शासक अल-उहुद की शादी की शर्त भी शामिल थी.
इस प्रकार, पहली बार ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में टेम्टा का ज़िक्र सन 1210 में होने वाले इस समझौते में अपने पिता की रिहाई के लिए, 'फिरौती' के रूप में किया गया. इसके बाद हालात यहां तक पहुंचे, कि टेम्टा ने माउंट क़ॉफ से मंगोलिया तक एक मंगोल क़ैदी के रूप में हज़ारों मील की यात्रा की. "यह उन दिनों में एक आदमी के लिए भी बड़ी बात थी."
इतिहासकार एंथनी इस्टमंड ने अपनी पुस्तक 'टेम्टाज वर्ल्ड' में राजकुमारी टेम्टा की कहानी शुरू करते हुए लिखा कि, जॉर्जिया के सेनापति इवान के क़ैदी बनने की गूंज लगातार टेम्टा के बची ज़िंदगी में जीवन भर सुनाई देती रही.
इतिहास बताता है कि अपनी शादी और मृत्यु के बीच लगभग 45 वर्षों में, टेम्टा दो अय्यूबी राजकुमारों की और चंगेज़ ख़ान का सामना करने वाले प्रसिद्ध योद्धा जलालुद्दीन ख्वारिज़्मी की पत्नी बनीं. इस दौरान एक बार उनका 'बलात्कार' हुआ था. उनके शहर पर सेल्जूक़ ने कब्ज़ा कर लिया. जब मंगोल पूर्व से विजय होते हुए आए, तो उन्हें इखलात से क़ैदी बना लिया गया और लगभग 5,000 किलोमीटर दूर मंगोलिया भेज दिया गया. जो कई हफ़्तों की कठिन यात्रा थी.
उनकी कहानी संभवत: 1254 में इखलात में ही उनकी मृत्यु पर समाप्त हुई. जहां उस समय वह मंगोलों के प्रतिनिधि के रूप में शहर की शासक थी, और यहां के अय्यूबी शासक अतीत की बात हो गई थी. समय के साथ उनके अंतिम विश्राम स्थल की जानकारी समय की धूल में गुम हो गई है. मध्य पूर्व के इतिहासकारों के लिए, एक महिला का जीवन इतना दिलचस्प नहीं था कि उसका पूरा रिकॉर्ड रखा जाये.
लेकिन, जैसा कि इतिहासकार एंथनी इस्टमंड ने लिखा है कि, उस समय की विभिन्न भाषाओं में संरक्षित स्रोतों में कहीं कहीं उनका इतना उल्लेख ज़रूर मिलता है जिस से एक स्टोरी बनाई जा सके.

इमेज स्रोत, DEA / G. DAGLI ORTI/Getty Images
टेम्टा का अय्यूबी दुनिया में आगमन और दो शादियां
अल-उहूद सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी के कई भतीजों में से एक थे. 1210 में अल-उहूद को इखलात का शासक बने ज़्यादा समय नहीं हुआ था और उनका शासनकाल भी ज़्यादा लंबा नहीं था. टेम्टा से शादी के कुछ समय बाद ही उनकी मृत्यु हो गई और उनकी जगह उनके भाई, अल-अशरफ़ मूसा इखलात के शासक बने.
परिणामस्वरूप, जॉर्जिया के साथ टेम्टा के पिता की रिहाई के लिए होने वाले समझौते को पूरा करने की ज़िम्मेदारी उन पर आ गई थी, और टेम्टा की शादी भी अब उनसे हो गई. इस्टमंड लिखते हैं कि, इस शादी के बाद, टेम्टा एक बार फिर इतिहास के पन्नों से गायब हो जाती हैं. उनके जीवन का अगला दौर जलालुद्दीन ख्वारिज़्मी के इखलात पर विजय के साथ शुरू होता है. जिसने 1230 में चंगेज ख़ान का सामना किया था. अब वह अय्यूबियों की अरबी दुनिया से निकल कर तुर्क फ़ारसी दुनिया का हिस्सा बन गई. लेकिन इस दौरान एक ईसाई राजकुमारी का अय्यूबियन दरबार में कैसा समय गुज़रा?
अय्यूबी दरबार में ईसाई राजकुमारी
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विभिन्न धर्मों को मानने वालों के बीच शादिया उस ज़माने में वैश्विक कूटनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा और आम बात थी. इस्टमंड ने लिखा है कि इसका सबसे अच्छा उदाहरण 12वीं और 13वीं शताब्दी में अनातोलिया में अय्यूबियों के शक्तिशाली मुस्लिम विरोधी सेल्जुक शासकों में मिलता है. जहां सुल्तानों ने एक बार पांच पीढ़ियों तक ईसाई राजकुमारियों से शादी की थी.
लेकिन इतिहास से पता चलता है कि अय्यूबियों का ईसाई अभिजात वर्ग की लड़की से शादी करने का कोई उल्लेख नहीं मिलता और टेम्टा का विवाह अय्यूबी परिवार के लिए एक असाधारण घटना थी.
इस्टमंड लिखते हैं कि सेलजुक और अय्यूबी साम्राज्य, पत्नियों के लिए मुश्किल दुनिया थी. एक ओर, उन्हें घूंघट और हिजाब में रहना था, और दूसरी तरफ़, उन्हें दरबार की वास्तविक राजनीति और अपनी वित्तीय सुरक्षा का भी ध्यान रखना था.
लेकिन इसके बावजूद, इतिहासकार इस्टमंड बताते हैं, टेम्टा ने इखलात में अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने के तरीके खोज लिए थे, जैसा कि इस क्षेत्र की कुछ अन्य महिलाओं ने भी किया था.
अर्मेनियाई इतिहासकार क्राकोस गांदज़ाकित्सि लिखते हैं, "सुल्तानों के घर में इस महिला के आने का, राज्य में रहने वाले ईसाइयों को बहुत फ़ायदा हुआ... ईसाई मठों पर टैक्स को कम कर दिया गया और आधों पर तो पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया था."
इसके अलावा उन्होंने ईसाई पवित्र स्थलों पर जाने वालों के लिए भी छूट हासिल कर ली थी.
इस्टमंड बताते हैं कि टेम्टा के जीवन के बारे में अधिकांश जानकारी अर्मेनियाई इतिहासकार क्राकोस से ही मिलती है, जो टेम्टा के समय में जीवित थे.

इमेज स्रोत, Fine Art Images/Heritage Images/Getty Images
मुस्लिम और ईसाई पत्नियां
इस्टमंड लिखते हैं कि मुस्लिम राज्यों में शासकों की मुस्लिम पत्नियों का जीवन ईसाई पत्नियों से इतना भिन्न था कि ईसाई महिलाओं को कम से कम सैंद्धांतिक तौर पर, अपने और अपने बच्चों के लिए दूसरी बीवियों से ख़तरा नहीं था.
टेम्टा के मामले में, वह कुछ हद तक अय्यूबी शक्ति के केंद्र से दूर एक सीमाई क्षेत्र में रहने की वजह से, किसी हद तक बहुत सी कठिनाइयों से बची हुई थी. इसके अलावा, उनके पति अल-अशरफ़ की किसी भी पत्नी का बेटा नहीं था. इसलिए उन सभी में राजनीति एक बड़ा कारण नहीं था. लेकिन वही पर बेयोगी के मामले में, उनके लिए भविष्य में बेटे के सहारे की कोई संभावना भी नहीं थी.
एक अय्यूबी की पत्नी के रूप में, टेम्टा को पहले से कहीं अधिक धन और प्रभाव प्राप्त हुआ. लेकिन ईसाई होने के कारण उसकी स्थिति कमज़ोर थी. वह एक ऐसे दरबार में थीं जहां उसका कोई रिश्तेदार या दोस्त नहीं था. लेकिन फिर भी सब नकारात्मक नहीं था. सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि, उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए नहीं कहा गया था.
आर्मीनियाई और जॉर्जियाई सेना के कमांडर ईवान को रिहाई के लिए, अपनी बेटी की शादी तो करनी पड़ी. लेकिन इसका मतलब शक्तिशाली अय्यूबी परिवार से संबंध बनाना भी था. अय्यूबियों के लिए इस समझौते के परिणामस्वरूप पूर्व में एक दुश्मन कम हो गया था. इस्टमंड लिखते हैं कि टेम्टा विभिन्न समूहों के हितों का प्रतीक बन गई."
"इस प्रकार, अपनी शादी के फ़ैसले में मर्ज़ी शामिल न होने और एक मोहरे के बावजूद, ऐसा लगता है कि इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक फ़ायदा टेम्टा को ही हुआ."

इमेज स्रोत, PHAS/Getty Images
टेम्टा के लिए उदाहरण जॉर्जिया की रानी टेमर
इस्टमंड लिखते हैं कि अल-अशरफ़ के लिए टेम्टा से शादी करना ज़रूरी नहीं था. यदि उन्होंने अपने भाई की विधवा के साथ यह संबंध बनाया है, तो इसका मतलब यह है कि टेम्टा इस ईसाई-बहुल शहर में अपनी अहमियत साबित कर चुकी थीं.
इसके अलावा, शहर की ईसाई आबादी के लिए मिलने वाली छूट और विशेष रूप से येरूशलम में पवित्र स्थलों की यात्रा करने वालों के लिए रियायतें प्राप्त की. जिसके लिए, उन्हें अन्य अय्यूबी राज्यों के शासकों के साथ भी बातचीत करनी पड़ी होगी. इस्टमंड लिखते हैं कि संभव है कि, उन्होंने अरबी भाषा पर भी मज़बूत पकड़ बनाई होगी.
लेकिन अय्यूबी साम्राज्य में कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए उनके पास क्या उदाहरण थे? ध्यान रहे कि टेम्टा का बचपन उस दौर में गुज़रा जब जॉर्जिया पर एक महिला रानी टेमर का शासन था. जो उस क्षेत्र पर शासन करने वाली पहली महिला थी.

इमेज स्रोत, Fine Art Images/Heritage Images/Getty Images
महिलाओं को राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया जाता था इस्तेमाल
जिस शताब्दी में टेम्टा ने अपनी आँखें खोलीं, उस दौर में मुस्लिम हो या ईसाई, महिलाओं की सत्ता को अप्राकृतिक समझा जाता था. लेकिन यह वो दौर भी था जब रानी टेमर के नेतृत्व में, 'जॉर्जिया ने 1199 में ग्रेटर आर्मीनिया के अधिकांश क्षेत्र पर नियंत्रण हासिल कर लिया था. जो आज पूर्वी तुर्की और आर्मीनिया में शामिल हैं. और अगले दशक में अनातोलिया के कई छोटे मुस्लिम राज्य भी उसके शासन में आ गए थे. उदाहरण के लिए, इस्टमंड लिखते हैं, कि रोमन साम्राज्य के शासक तुगरल शाह जॉर्जिया की रानी के अधीन थे और उनके इस्लामिक झंडे पर क्रॉस का चिन्ह भी था.
इस्टमंड लिखते हैं कि उस समय के मुस्लिम इतिहासकार जॉर्जिया के विस्तारवाद से परेशान थे. टेमर की सेना ने पूर्वी ईरान में खुरासान पर भी हमला किया था. एक इतिहासकार ने इस ख़तरे को ज़ाहिर भी किया था कि जॉर्जिया बग़दाद से ख़लीफ़ा को हटा कर वहां कैथोलिक ईसाइयों को बैठाना चाहती थी और शहर की मस्जिदों को चर्चों में बदलना चाहती थी. रानी टैमर के शासनकाल को जॉर्जिया के इतिहास का स्वर्ण युग और उन्हें "संत" कहा जाता था.
लेकिन रानी टेमर की सारी शक्ति के बावजूद, टेम्टा के साथ होने वाले व्यवहार से साबित होता है कि, एक महिला के रानी बनने का मतलब यह नहीं था कि, हर महिला को अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार था.
अपनी पुस्तक में, इस्टमंड ने शाही परिवारों में महिलाओं के महत्व का वर्णन किया. लेकिन साथ ही यह भी लिखा कि "मध्य पूर्व में, बहनों, बेटियों, भतीजियों और भांजियों की हैसियत संपत्ति की तरह थी. जिसे उनके पुरुष रिश्तेदार अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करते थे."
अय्यूबी साम्राज्य में टेम्टा का जीवन 1220 के दशक के अंत में अचानक पूर्व दिशा से एक आक्रमणकारी के आगमन के साथ समाप्त हुआ. इस बदलाव के कई पहलू हैं. एक सेल्जुक राजकुमारी और उसके पति के बीच मतभेद, टेम्टा की तीसरी शादी और अय्यूबियों की दुनिया से निकल कर फ़ारसी-तुर्क दुनिया में जाना प्रमुख कारण के रूप में देखा जाता है.

इमेज स्रोत, Fine Art Images/Heritage Images/Getty Images
सेल्जुक साम्राज्य की राजकुमारी और जलालुद्दीन ख्वारिज़्मी की शादी
इतिहास से पता चलता है कि मंगोलों की पूर्व से पश्चिम की तरफ कार्रवाई की वजह से तुर्क-फ़ारसी क़बीले अपना क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर हो गए. उनमें ख्वारिज़्मी भी शामिल थे, और, इस्टमंड के अनुसार, उनके नेता, जलालुद्दीन ख्वारिज़्मी ने ईरान, अज़रबैजान और माउंट क़ाफ में साम्राज्य स्थापित कर लिया था.
उस दौरान, ईरान के सेल्जुक सुल्तान तुगरल शाह तृतीय की बेटी मलिका, अज़रबैजान के अता बेग मुज़फ़्फ़रुद्दीन उज़्बेक की पत्नी थीं. मुज़फ़्फ़रुद्दीन को एक युद्ध के लिए जाना पड़ा. उनकी अनुपस्थिति में उनकी पत्नी मलिका को तबरेज़ शहर की ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ी थी.
संक्षेप में, जब जलालुद्दीन ख्वारिज़्मी ने तबरेज़ की घेराबंदी की तो मलिका ने निश्चित हार को देखते हुए शहर के पदाधिकारियों की सहमति से आक्रमणकारी के साथ समझौता करके शहर उसको सौंप दिया.
इस्टमंड ने लिखा, इसके बाद मलिका ने अपने पति को तलाक़ देने के लिए मजबूर किया और उसने जलालुद्दीन ख्वारिज़्मी से शादी कर ली. अपने नए पति से उन्हें तीन शहर शासन करने के लिए मिले. इस्टमंड का कहना है कि मलिका ने तलाक़ लेने के लिए बग़दाद और दमिश्क में आलिमों से फतवे भी लिए.
इस्टमंड लिखते हैं, "मलिका की कहानी से पता चलता है कि महिलाएं सत्ता और अधिकारों के उपयोग करने के तरीकों को अच्छी तरह जानती थीं. और अपने क्षेत्रों की सुरक्षा और अपने लाभ के लिए उनका इस्तेमाल करना भी जानती थीं.
हालांकि, जलालुद्दीन से उनकी ये शादी भी बाद में ख़त्म हो गई. यहीं से मलिका, जलालुद्दीन और टेम्टा की कहानी एक हो जाती है.

इमेज स्रोत, DE AGOSTINI PICTURE LIBRARY
टेम्टा का रेप
इस्टमंड लिखते हैं कि जलालुद्दीन ख्वारिज़्मी के इखलात आने की एक वजह उनकी पत्नी मलिका का उन्हें छोड़ कर इस शहर में आना माना जाता है. इतिहासकारों के अनुसार मलिका ने फिर यहां से अज़रबैजान में जलालुद्दीन के ख़िलाफ़ बग़ावत उकसाने की कोशिश भी की थी. लेकिन जब जलालुद्दीन यहां पहुंचे तो मलिका इखलात में नहीं थी. लेकिन टेम्टा वहां मौजूद थी. जिन्हें सुल्तान के गुस्से का सामना करना पड़ा.
इस्टमंड ने उस समय के इतिहासकार अलाउद्दीन अता मलिक़ जुवेनी के हवाले से लिखा कि, उन्होंने (जलालुद्दीन ने) महल में प्रवेश किया. जहां उन्होंने इवान की बेटी के साथ रात गुज़ारी. जो मलिक अल-अशरफ़ की पत्नी थी और इस तरह उन्होंने अपनी पत्नी मलिका के भाग जाने पर अपने गुस्से की प्यास बुझाई.
जलालुद्दीन ख्वारिज़्मी और टेम्टा की शादी
इस्टमंड लिखते हैं कि उस समय के इतिहासकारों के लेखों से पता चलता है कि किसी शहर की हार के बाद रेप सामान्य बात थी. लेकिन अभिजात्य वर्ग की महिलाएं इससे बच जाती थीं. इस बारे में वैश्विक स्तर पर शासकों में एक समझौता था.
वे लिखते हैं कि इस परिस्थिति में टेम्टा और सेम्यूनिस (13वीं शताब्दी के आख़िरी सालों की एक बाइज़ेंटाइन राजकुमारी) का रेप वैश्विक समझौते का उल्लंघन था. "इस रेप से यह भी साबित होता है कि इन महिलाओं की हैसियत अपने राज्यों की नज़र में ज़ीरो थी." टेम्टा का रेप एक ही समय में जॉर्जिया,आर्मीनिया और अय्यूबियों के लिए शर्मिंदगी वाली घटना थी.
कुछ ही समय के बाद जलालुद्दीन के साथ शादी के बाद उनके संबंध को क़ानूनी हैसियत मिल गई थी. हालांकि ये शादी सिर्फ़ चार महीने ही चल सकी. अगस्त 1230 में जलालुद्दीन की अल-अशरफ़ और सल्जूक़ों की संगठित सेना के हाथों हार हो गई. इस्टमंड लिखते हैं जंग के बाद समझौते के परिणामस्वरूप ही शायद टेम्टा वापस इखलात आ सकीं. हालांकि इसके बाद अल-अशरफ़ दमिश्क़ चले गए और उनकी इखलात में दिलचस्पी ख़त्म हो गई.
इस्टमंड लिखते हैं कि जलालुद्दीन के लिए टेम्टा से शादी करने की कोई मजबूरी नहीं थी. लेकिन फिर भी उनके ऐसा करने से एक बार फिर साबित होता है कि टेम्टा ने स्थानीय स्तर पर इतनी हैसियत बना ली थी जिसका जलालुद्दीन फायदा उठाना चाहते थे.
लेकिन टेम्टा की पहली शादी का क्या हुआ? इस्टमंड लिखते हैं कि, "इस शादी की क़ानूनी हैसियत इसमें ज़बरदस्ती करने का पहलू, ये इस वजह से शक के दायरे में थी कि, अल अशरफ अभी जीवित थे और उन्होंने टेम्टा को तलाक़ भी नहीं दिया था."
टेम्टा की इखलात वापसी शांति वार्ता के नतीजे में हुई. अपने पहले पति के पास वापस आने के बाद वह एक बार फिर इतिहास के पन्नों से ग़ायब हो जाती हैं. ध्यान रहे कि जलालुद्दीन ख्वारिज़्मी की 1231 में मृत्यु हो गई थी.

इमेज स्रोत, Fine Art Images/Heritage Images/Getty Images
जलालुद्दीन का आक्रमण और सत्ता में उथल पुथल
जिस तरह मलिका ने जलालुद्दीन के हमलों में अपना फ़ायदा देखा था. इस्टमंड ने लिखा कि, इसी तरह जलालुद्दीन के हमलों ने और महिलाओं के लिए भी रास्ते बनाए.
इतिहासकार इब्ने वासिल लिखते हैं कि अज़रबैजान में रेनदीज़ के क़िले पर जलालुद्दीन के हमले में दो भाइयों की मौत के बाद, शासन उनकी बहन को मिल गया. इस महिला का नाम क्या था? इतिहास ने वो दर्ज नहीं किया.
इतिहासकार बताते हैं कि अय्यूबी शासनकाल की महिलाओं के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध हैं. कूटनीतिक महत्ता के बावजूद उनकी हैसियत को बहुत कम स्वीकार किया गया है.
अधिकांश दस्तावेज़ों में उनका उल्लेख करते हुए उनके सरनेम लिखे गए थे. उदाहरण के तौर पर, इस्टमंड बताते हैं कि, इखलात के शासक अल-अशरफ़ की बहन, जो अय्यूबी साम्राज्य के सुलतान अल आदिल की बेटी थीं. उनकी शादी एक सल्जूक़ सुल्तान से हुई. इन्हें केवल 'मलिका आदिल्या' लिखा गया. इसी तरह दूसरी महिलाओं के लिए अस्मत-अल-दुनिया-व-अल-दीन और सफ़वत-अल-दुनिया-व-अल-दीन जैसे शब्द लिखे मिलते हैं.
मुसलमान सुल्तानों से शादी करके आने वाली कई ईसाई राजकुमारियों के नाम ईसाई दस्तावेज़ों से मिलते हैं. टेम्टा के जीवन में अगला मोड़ उस समय आया जब उस इलाके में मंगोल आये.

इमेज स्रोत, Archiv Gerstenberg/ullstein bild via Getty Images
टेम्टा के पति अल-अशरफ़ की मौत और मंगोलों की क़ैद
1236 में मंगोल शासक ख़ान ओगदायी ने अपनी सेना को माउंट क़ाफ़ में परमानेंट क़ब्ज़े का आदेश दिया. इस्टमंड लिखते हैं, ये साफ़ नहीं है कि उस समय टेम्टा कहां थीं.
एक मत ये है कि वह आर्मीनिया में अपने भाई अवाग के पास थीं. जिसने मंगोलों से समझौते के लिए अपनी बेटी की शादी की भी पेशकश की थी. लेकिन ये उनके शहर को नहीं बचा सका.
कुछ समय में ही इखलात भी मंगोलों के क़ब्ज़े में चला गया. इसके कुछ ही समय बाद अल-अशरफ़ की मौत हो गई और टेम्टा विधवा हो गईं.
चंगेज़ ख़ान के पोते का ख़ेमा और भाई बहन की पेशी
इस्टमंड लिखते हैं, अवाग को वोल्गा नदी के किनारे रुके चंगेज़ ख़ान के पोते बातो के सामने लाया गया. जो पश्चिम में मंगोल सेना के कमांडर थे. अवाग ने अपनी अधीनता की घोषणा की और उनकी वफादारी को सुनिश्चित करने के लिए उन्हें एक मंगोल दुल्हन भी दी गई. अब अवाग की ज़िम्मेदारी आर्मीनिया के अभिजात वर्ग को मंगोलों के अधीन लाना था.
टेम्टा को भी बातो के सामने लाया गया लेकिन वहां से उन्हें वापस भेजने के बजाये क़रा कोरम में ओगदाई ख़ान के पास भेज दिया गया. आर्मेनिया में अवाग की अहमियत को देखते हुए, इस्टमंड लिखते हैं, उनकी बहन टेम्टा को क़ैदी बनाने की वजह समझ में आती है. टेम्टा मंगोल कैंप से नौ साल बाद वापस आईं. मंगोलिया जाने के बाद टेम्टा एक बार फिर इतिहास के पन्नों से गायब हो जाती हैं.
इस्टमंड लिखते हैं, मंगोलिया में उन्होंने क्या किया या उनके साथ क्या व्यवहार हुआ इसके बारे में ऐतिहासिक दस्तावेज़ खामोश हैं. लेकिन उस दौर में मंगोलों के क़ैदी बनने वाले ईसाइयों की ज़िंदगी के बारे में जानकारी से उन्होंने एक खाका बनाने की कोशिश की है.

इमेज स्रोत, Women of History
मंगोलों का महिलाओं के बारे में रवैया और टेम्टा बनीं शासक
इखलात से करा कोरम में मंगोलों के कैम्प तक हवाई दूरी लगभग 4800 किलोमीटर थी. लेकिन पैदल और घोड़ों पर ये यात्रा और भी लम्बी थी. टेम्टा ने यह यात्रा दो बार की है. एक बार क़ैदी की हैसियत से मंगोलिया जाते हुए और फिर शासक की हैसियत से इखलात वापस आते हुए.
टेम्टा ने जो यात्रा की उस पर उनके बाद जाने वाले दो लोगों के हालात संरक्षित हैं. उनमे से एक आर्मीनिया के बादशाह हैटम प्रथम थे. जो टेम्टा से लगभग 10 साल बाद 1246 में गायोक के मंगोलो के ख़ान बनने के समारोह में शामिल होने के लिए मंगोलिया गए थे.
मंगोलों ने टेम्टा को जॉर्जिया और आर्मीनिया के राजनीति में वापस आने का मौक़ा दिया. इससे पहले अल-अशरफ़ की पत्नी होते हुए वो इखलात में रही थीं. उस समय आर्मीनिया के लोगों के साथ उनके नज़दीकी संपर्क थे. लेकिन उनके क्षेत्र में राजनैतिक जीवन के सबूत नहीं मिलते हैं.
इस्टमंड लिखते हैं,अपने जीवन के अंतिम दौर में जब वो मंगोल गवर्नर की हैसियत से इखलात वापस आईं तो ज़ाहिरी तौर पर उनका राजनैतिक क़द बढ़ चुका था.
वे लिखते हैं कि टेम्टा की अपनी ज़िंदगी और जॉर्जिया और आर्मीनिया की राजनीति में उस समय की कुछ दूसरी महिलाओं की बढ़ती हुई भूमिका की एक बड़ी वजह मंगोलों का महिलाओं के प्रति रवैया था.
मंगोलों में पारंपरिक तौर पर महिलाओं को उन क्षेत्रों की महिलाओं से अधिक स्वायत्तता और स्थान प्राप्त थे जो उन्होंने जीते थे.

इमेज स्रोत, TbilisiStMus
मंगोल महिलाओं के दरबार
इस्टमंड ने लिखा है कि चंगेज़ ख़ान के परिवार में शादी करने वाली महिलाओं को बहुत से अधिकार प्राप्त थे. हर एक का अपना दरबार था जिसके अंतर्गत कई खेमे आते थे. हर खेमे के लिए दो सौ बैल गाड़ियां थीं. उनमें से कई बैल गाड़ियों को 22 जानवर खींचते थे. उनकी अपनी दौलत थी, वो संपत्ति रख सकती थीं और व्यापार कर सकती थीं. ये सब उनकी मृत्यु के बाद किसी और महिला को मिल सकती थी. वो सेना का नेतृत्व कर सकती थीं. खुद भी जंग में भाग ले सकती थीं और अपने बच्चों की शिक्षा और धर्म के चयन का अधिकार था.
टेम्टा के मंगोलिया में रहने के दौरान अधिकांश समय तोरगिन ख़ातून वास्तव में शासक थी.
1241 में अपने पति ओगदाई की मौत के बाद नए शासक के निर्णय तक शासन उनके हाथ में था. उनका बेटा गायोक छोटा था और इस तरह बागडोर कई साल तक उनके हाथ में रही. गायोक की ही ताजपोशी के अवसर पर बड़ा दरबार आयोजित किया गया था. जिसमें दूर दूर से शासक आये थे.
तोरगिन ख़ातून के दौर में कई महिलाओं को महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद मिले. उनमें ईरान से आई एक पूर्व दासी फ़ातिमा भी थीं.
राजकुमारी तुर्कान ख़ातून का मंगोलों से गठबंधन और तख़्त नाशिनी
इतिहासकार लिखते हैं कि, महिलाओं के शासन के नतीजे टेम्टा की सत्ता के अंतिम दिनों में सामने आये जब और भी महिलाओं ने ताक़त हासिल कर ली. उत्तर पूर्व ईरान में किरमान में 1257 में अपने पति की मृत्यु के बाद तुर्कान ख़ातून सत्ता में आईं.
मंगोल साम्राज्य के साथ संबंध के आधार पर वह 1281 तक शासक रहीं. उन्हें सेना पर सीधे नियंत्रण हासिल था. कुछ स्रोतों के अनुसार उनके नाम का जुमे का खुत्बा (शुक्रवार को जुमे की नमाज़ से पहले दिया जाने वाला उपदेश) भी पढ़ा जाता था. उनके बाद उनकी बेटी पादशाह ख़ातून को सत्ता मिली जिनका शासनकाल पांच साल का था.
हालांकि इतिहासकार लिखते हैं कि महिलाओं की सत्ता पूरी नहीं थी. हर उदाहरण में महिला को सत्ता किसी पुरुष से संबंध की वजह से मिली थी.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 1
तोरगिन ख़ातून की सलाहकार और उनकी पूर्व दासी फ़ातिमा का अंत
इसके अलावा मंगोल महिलाओं को विरोध का सामना भी करना पड़ा था. उनके विरोध में उनके महिला होने को ही बहाना बनाया जाता था. विशेष रूप से अभिजात वर्ग के बाहर से सशक्त पद पर आने वाली महिलाओं को इस चीज़ का सामना करना पड़ता था.
इसका एक उदाहरण मंगोल दरबार में तोरगिन ख़ातून की सलाहकार और पूर्व दासी फ़ातिमा है. इतिहास बताता है कि मंगोल दरबार में अपने पुरुष समकक्षों के उलट महिलाओं पर रिश्वत लेने और गद्दारी जैसे आरोप लगते थे. फ़ातिमा पर जिस्मफरोशी, दलाली और जादू टोना जैसे आरोप लगाए गए. परिस्थिति ऐसी हो गई कि तोरगिन ख़ातून शासक होने के बावजूद उन्हें नहीं बचा सकीं.
इस्टमंड ने इतिहासकार जुवेनी का संदर्भ देते हुए लिखा कि उन्हें निर्वस्त्र करके उनपर अत्याचार किया गया. "और फिर उनके शरीर के सभी सुराख़ सीने के बाद उन्हें एक कालीन में लपेट कर दरिया में फेंक दिया गया."
तोरगिन ख़ातून और टेम्टा की मंगोलिया से वापसी
टेम्टा शासक बन कर मंगोलिया से इखलात वापस आई, इसे महिलाओं की सशक्त स्थिति के तौर पर देखा जाना चाहिए.
इस्टमंड लिखते हैं कि उनकी रिहाई दो महिला शासकों तोरगिन और रूसोडान के बीच कूटनीति का नतीजा थी. ध्यान रहे कि उस समय जॉर्जिया पर रानियों को शासन करते हुए पचास साल हो चुके थे. रूसोडान का शासनकाल 1223-45 और इससे पहले उनकी माँ का शासनकाल 1184-1210 तक था.
इस्टमंड लिखते हैं कि टेम्टा की मंगोलिया यात्रा का रिकॉर्ड मौजूद नहीं है. लेकिन हमें पता है कि वो वहाँ गई थीं. क्योंकि जॉर्जिया की नई रानी रूसोडान (रानी टेमर की बेटी) ने मंगोलिया से उनकी वापसी की माँग की थी.
वह अपने मंगोल फ़रमारवाओं के नाम पर शासक थी. बिल्कुल उसी तरह जैसे उन दिनों में जॉर्जिया, तरेबेजुनद की बाइज़ेंटाइन साम्राज्य, अनातोलिया के सल्जूक़ और मोसल के लोलो शासक मंगोलों के अधीन थे.
यहां यह बताना ज़रूरी है कि 1243 में कोसदाग की लड़ाई में मंगोलों ने सल्जूक़ साम्राज्य,आर्मीनिया और जॉर्जिया को हरा दिया था. अब सल्जूक़ साम्राज्य के शहरों में मंगोलों ने अपने अधीन शासक नियुक्त कर दिए. टेम्टा जब नौ साल बाद मंगोलों की क़ैद से वापस लौटीं तो इसी राजनीतिक प्रणाली के तहत वह इखलात की शासक बनाई गई थीं.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 2
टेम्टा मंगोलों की नियुक्त की गई शासक और इखलात की जनता
टेम्टा ने लगभग दस वर्षों तक शासन किया. लेकिन यह एक आसान काम नहीं था. मंगोलों का पालन करने वाले सभी शासक एक भारी बोझ के नीचे काम करते थे. यह न केवल टेम्टा के लिए एक मुश्किल समय था, बल्कि इसने उसे अलोकप्रिय भी बना दिया.
इखलात शहर, जहां वह पहली बार अल-उहुद की पत्नी बन कर आई थी. तब वे न केवल ईसाइयों पर टैक्स को कम करने में कामयाब रहीं, बल्कि अधिक लोगों के लिए येरूशलम के पवित्र स्थलों की यात्रा करना आसान बना दिया था. अब उन्हें अपने मंगोल आकाओं के खजाने का मुंह भरने के लिए ज़्यादा टैक्स लगाना पड़ रहा था.
टेम्टा ने शायद 1254 में अपनी मृत्यु के समय तक लगभग दस वर्षों तक मंगोल अधीनता में शासन किया. इखलात में बिताए जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं की तरह, उनकी मृत्यु की तारीख़ प्रत्यक्ष प्रमाण के बजाय तथ्यात्मक साक्ष्य द्वारा निर्धारित की जाती है. अपनी मौत के साथ ही, वह एक बार फिर से गुमनामी में चली गईं. इस्टमंड लिखते हैं, "हम नहीं जानते कि उन्हें कहां दफ़नाया गया था."
इस्टमंड ने टेम्टा की कहानी में मध्य पूर्व की भी कई राजकुमारियों और रानियों के बारे में बताया है. जिन्होंने महिलाओं के लिए सबसे कठिन स्थिति में खुद के लिए जगह बनाने की कोशिश की. और उनका भी उल्लेख किया है जो अपने समय की राजनीति में केवल एक मोहरे की हैसियत से ज़्यादा कुछ नहीं थीं.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 3
"इस्लाम छोड़ो, शादी टूट गई, अब फिर से मुसलमान बनकर नई शादी कर लो"
इस्टमंड लिखते है, "ऐसे कई उदाहरण हैं जहां शासकों ने विवाह के ज़रिए अपनी इच्छा से गठबंधन करने के कई उपाय किए. 1164 में, मलातिया राज्य के शासक यजीबसन अपने भतीजे की शादी पड़ोसी राज्य के शासक की बेटी से कराकर अपनी हैसियत बढ़ाना चाहते थे. लेकिन राजकुमारी की शादी उनके दुश्मन सेल्जुक़ सुल्तान कुलच अरसलान से हो चुकी थी. लेकिन वह इससे निराश नहीं हुए. उन्होंने पति के राज्य में जाते हुए रास्ते से ही राजकुमारी का अपहरण करा लिया. उन्हें इस्लाम त्यागने के लिए मजबूर किया ताकि उनकी शादी टूट जाए. जब राजकुमारी ने धर्मत्याग की घोषणा की, तो सुल्तान ने उसे दोबारा इस्लाम में परिवर्तित करा अपने भतीजे से उसकी शादी कर दी."
टेम्टा जब जलालुद्दीन की इखलात पर विजय के नतीजों का सामना कर रही थीं. उन्हीं दिनों एक अय्यूबी शहज़ादी अपने परिवार के पुरुषों में विवाद का सामना कर रही थीं.
1232 में, टेम्टा के जेठ और मिस्र के सुल्तान कामिल ने अपनी बेटी आशोर ख़ातून की शादी अपने भतीजे नासिर अल-दाऊद से की जो मृत सागर के दक्षिण क्षेत्र कर्क के शासक थे. लेकिन अगले साल, जब उन्हें शक हुआ कि नासिर उसके ख़िलाफ़ साजिश रच रहा है, तो उन्होंने दंपति पर दबाव बना कर उस शादी को ख़त्म करा दी.
नासिर बग़दाद भाग गया और ख़लीफ़ा की मदद मांगी. उनके हस्तक्षेप से चाचा और भतीजे में सुलह हुई और उन्हें अपने वतन लौटने की अनुमति मिली.
इसके बाद, 1236 में, उनके भाइयों और भतीजों ने सुल्तान कामिल के ख़िलाफ़ एक और साजिश रची. लेकिन, इस्टमंड के अनुसार, इस बार कामिल वफ़ादार रहे और बदले में आशूरा ख़ातून से शादी को बहाल कर दिया गया.

इमेज स्रोत, DE AGOSTINI PICTURE LIBRARY
टेम्टा की ननद, सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी की भतीजी और अलेप्पो शहर
13वीं शताब्दी में महिला शासक बनने का एक और उदाहरण टेम्टा की ननद का है. ये सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी की भतीजी थीं. जो उनके बाद साम्राज्य का शासन संभालने वाले अल-आदिल (सुल्तान कामिल के पिता) की बेटी ज़ैफ़ा ख़ातून थीं.
अल-आदिल ने ज़ैफ़ा की शादी सुल्तान सलाहुद्दीन के बेटे अल-ज़हीर गाज़ी से करा दी थी. अल-ज़हीर अलेप्पो के शासक थे. इस शहर की गिनती सुल्तान सलाहुद्दीन अयूबी के उन कुछ क्षेत्रों में होती थी जिसे उनके भाई अल-आदिल ने सुलतान सलाहुद्दीन अय्यूबी की मृत्यु के बाद सत्ता संभालने पर अपने राज्य में शामिल नहीं किया था.
ज़ैफ़ा का ज़िक्र भी टेम्टा की तरह शादी के बाद गायब हो जाता है और दो दशकों तक उनका कोई ज़िक्र नहीं मिलता है. उनका नाम 1236 में उनके बेटे की मृत्यु के बाद फिर सामने आता है. जब वह अपने सात वर्षीय पोते सलाहुद्दीन द्वितीय के संरक्षक शासक के रूप में सत्ता संभालती हैं.
1243 में अपनी मौत तक ज़ैफ़ा अलेप्पो की कार्यवाहक शासक थीं. इस्टमंड ने लिखा कि इस दौरान वह कभी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आईं. उन्होंने अपने एक निजी दास के नेतृत्व वाली सलाहकार परिषद के माध्यम से शासन किया. वह लिखते हैं कि उन्होंने इतनी ख़ामोशी से शासन किया कि अगर हाल ही में एक इतिहासकार यासिर तबा ने उन्हें गुमनामी से बाहर नहीं निकाला होता तो इतिहास में उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज किए जाने का ख़तरा था.
इतिहासकार इब्ने वासिल लिखते हैं कि उन्होंने (ज़ैफ़ा ने) अपनी जनता के साथ न्याय किया, उनके साथ प्रेम और उदारता का व्यवहार किया. अलेप्पो में बहुत से टैक्स को कम किया. वह न्यायाधीशों, तपस्वियों, बुद्धिजीवियों और सभी धर्मों के लोगों के प्रति सहानुभूति रखती थीं और उन्होंने कई धर्मार्थ संस्थाओं की स्थापना की थी.
इस्टमंड लिखते हैं कि उस दौर में शादी दोनों पक्षों की स्थिति को ज़ाहिर करती थी. यदि लड़की एक कमज़ोर परिवार से होती, तो इसके बुरे परिणाम होते. चाहे दोनों का एक ही धर्म हो. इसका सबसे ख़राब उदाहरण 13वीं शताब्दी के अंत में बाइज़ेंटाइन साम्राज्य में मिलता है.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 4
बाइज़ेंटाइन शहज़ादी के रेप पर इस हज़ार साल पुराने साम्राज्य की चुप्पी
ये टेम्टा की शादी के दशकों बाद का एक उदाहरण है. बाइज़ेंटाइन साम्राज्य के राजा एंड्रोनिकोस द्वितीय की पांच वर्षीय बेटी समयूनिस की शादी सर्बिया के 40 वर्ष से भी अधिक उम्र के राजा स्टीफन तृतीय से हुई थी. बाइज़ेंटाइन साम्राज्य सिमट रहा था. इसके राजा को सर्बिया के आक्रमण को रोकने के लिए मजबूरी में यह शादी करनी पड़ी. इतिहासकारों का मानना है कि यह राजा स्टीफन की चौथी या पांचवीं शादी थी.
ऐसा नहीं था कि बाइज़ेंटाइन साम्राज्य में इस शादी पर हंगामा नहीं हुआ. राजा को बाइज़ेंटाइन चर्च से माफ़ी मांगनी पड़ी, यह कहते हुए कि वह इस मामले में असहाय थे. पांच साल की राजकुमारी समयूनिस को उसके पति के सर्बिया राज्य में इस आश्वासन के साथ भेजा गया कि, बालिग होने तक वह अलग रहेंगी और उसका ख्याल रखा जाएगा. लेकिन आठ साल की होने पर सर्बियाई राजा ने कई बार उसका बलात्कार किया. जिसकी वजह से उसने बच्चे पैदा करने की सलाहियत खो दी.
समयूनिस ने कई बार वहाँ से भागने की असफल कोशिश की. एक बार वह अपनी माँ के अंतिम संस्कार में शामिल होने के बहाने वहाँ से निकलने में सफल रही. लेकिन उनके भाई ने ही उन्हें वापस भेज दिया. इतिहासकारों का कहना है कि वापसी के रास्ते में उनकी पीठ नंगी थी और वह घोड़े के साथ बंधी हुई पैदल चल रही थीं.
इस्टमंड ने लिखा कि "अतीत का शक्तिशाली बाइज़ेंटाइन साम्राज्य अब एक छोटी लड़की की तरह था. जिसके साथ बिना किसी डर के दुर्व्यवहार किया जा सकता था." टेम्टा की शादी इस घटना के लगभग एक सदी पहले 13वीं शताब्दी की शुरुआत में मजबूरी की हालत में अय्यूबी परिवार में की गई थी.
इतिहासकार इस्टमंड ने अपनी पुस्तक 'टेम्टाज़ वर्ल्ड' के अंत में लिखा कि, टेम्टा इतिहास का एक फुटनोट है. जिसे 19वीं शताब्दी में एक फ़्रांसीसी इतिहासकार मागी फ्लेस्ते ब्रूसेत ने जॉर्जियाई ऐतिहासिक दस्तावेजों का अनुवाद करते हुए खोजा था. लेकिन वो और एक शताब्दी तक इससे ज़्यादा जगह हासिल नहीं कर सकी. इसी तरह, इखलात, उनका शहर, जिसे इतिहासकार कहते हैं कि चार दुनियाओं का संगम था. जहां अरबी, फ़ारसी, जॉर्जियाई और आर्मीनियाई भाषा बोली जाती थी, अब पूर्वी तुर्की में एक छोटा और महत्वहीन स्थान है.
ये भी पढ़ें
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















