जॉर्ज फ़्लॉयड: क्या मुझे अपने नस्लवादी फे़सबुक दोस्त को छोड़ देना चाहिए?

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- Author, चेरी विल्सन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
हममें से किसी के भी साथ ऐसा हो सकता है कि अचानक पता चले की आपका फे़सबुक का कोई दोस्त नस्लवादी विचार रखता है.
मेरे मामले में वो ऐसा व्यक्ति है जिसे मैं बचपन से जानती हूं. आमतौर पर मैं अपने दोस्तों के पुराने स्टेटस देखती हूं या फेसबुक क्विज़ के उनके नतीजे देखती हूं.
लेकिन जॉर्ज लॉयड की मौत के बाद, नस्लवाद विरोधी प्रदर्शन और विवादित ब्रिटिश स्टैचु को हटाने से जुड़ी बहस को लेकर कई लोग नस्लवादी पोस्ट डालने लगे हैं.
मुझे पता है कि ये उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है. ये मज़ाक है. इसे गंभीरता से मत लो लेकिन जब भी मैं ऐसा कुछ देखती हूं तो ये मुझे चोट पहुंचाता है.
मुझे वो सभी नस्लवादी नाम याद आते हैं जिनसे मुझे पुकारा जाता था. मुझे हमेशा पूछा जाता था, “तुम कहां से हो?” (वैसे इस सवाल का जवाब इंग्लैड है. मैं ग्रेट मैनचेस्टर में पली-बढ़ी हूं.)
फिर पूछा जाता, “नहीं, तुम कहां से हो, कहां से?” (ओह, तो तुम्हारा मतलब है कि मेरी त्वचा का रंग ऐसा क्यों है?)
मुझे वो समय भी याद आता है जब मैं और मेरी बहन को लंदन के एक क्लब में नहीं आने दिया गया क्योंकि वो सिर्फ़ “यूरोपीय भीड़” (गोरे के लिए कोड) ही चाहते थे. साथ ही वो वक़्त भी जब लोगों को लगता था कि मेरे घुंघराले बाल छूने में कोई दिक्कत नहीं (मैं कोई पालतू जानवर नहीं हूं).
नस्लवाद किसी को “एन-शब्द” कहने से कहीं ज़्यादा है.
मुझे नहीं पता कि मुझमें उस शख़्स को जवाब देने की ऊर्जा है या नहीं, लेकिन अगर मैं नहीं बोलती, तो मैं उसे कुछ भी कहने की छूट दे रही हूं.

क्या करें?
मैंने फै़सला किया कि मुझे कुछ तो करना चाहिए. लेकिन, मैं सलाह चाहती हूं कि उसे फ्ऱेंड लिस्ट से हटा दूं या उसे जवाब दूं.
सोशल साइकोलॉजिस्ट डॉक्टर किऑन वेस्ट का कहना है कि ये इस पर निर्भर करता है कि आप क्या पाना चाहती हैं.
किऑन वेस्ट का मानना है, “अगर आप अपने मानसिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखना चाह रही हैं तो मेरी सलाह है कि उस व्यक्ति से संपर्क करने की ज़रूरत नहीं है.”
“मुझे नहीं लगता कि नस्लवादी बातें करने वालों से बार-बार उलझने से तुम्हें अच्छा लगेगा, तुम्हें बहुत बुरा महसूस होगा.”
“लेकिन, अगर आप उनसे कम नस्लवादी और थोड़ी संवेदनशील पोस्ट करवाना चाहती हैं तो आपको ज़रूर रिप्लाई का बटना दबाना चाहिए.”
”ज़रूरी नहीं कि इससे उनकी सोच बदल जाए लेकिन इससे उन्हें ये पता चलेगा कि उनका व्यवहार स्वीकार करने लायक नहीं है, जिसे वो अब तक सामान्य समझते थे.”

क्या ये लोग बदल सकते हैं?
जब मैंने अपने एक जानने वाले की नस्लवादी पोस्ट देखी तो मैं सोचने लगी कि क्या मेरा जवाब कुछ बदल सकता है.
वो ये कह सकते हैं कि “तुम नस्लवादी कार्ड खेल रही हो.”
इसलिए मैंने और लोगों से पूछा कि उन्होंने नस्लवादी सोच रखने वाले लोगों के बारे में जानने पर क्या किया.
27 साल की अलीशा स्टेंडिग ने बताया, “मैंने कमेंट्स का जवाब देना शुरू किया लेकिन ये बुरा होता चला गया.”
“किसी ने मुझे कहा कि तुम्हारा रेप होना चाहिए. जबकि मैं ये समझाने की कोशिश कर रही थी कि काले लोगों की ज़िंदगी भी मायने रखती है.”
“इसके बाद, मैंने लोगों को डिलीट और ब्लॉक करने का फैसला लिया. सच बताऊं तो मैं इस सबसे थोड़ा डर गई थी.”
केन्याई लेखक और कॉमेडियन नजांबी मैक्ग्रैथ ने एक नस्लवादी शख़्स को जवाब दिया लेकिन ये कभी-कभी “थकावट भरा” था.
नजांबीक कहती हैं, “उन्हें लगता है कि अपने विचार बताने से हो सकता है कि वो ये समझ पाएं कि दूसरों को कैसा महसूस होता है.”
“भले ही उस व्यक्ति के विचार ना बदलें लेकिन उसके दिमाग में रहेगा कि किसी ने इस पर आपत्ति जताई थी.”
“वो अब उतना बेफिक्र नहीं है जितना मेरे जवाब देने से पहले हुआ करता था.”

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सोशल मीडिया पर शिक्षा
कैसिया विलियम्स कहती हैं कि उनके पति को नस्लवाद का सामना करना पड़ा है. इसलिए उन्हें लगता है कि जब वो फेसबुक पर ऐसा कुछ देखती हैं तो उन्हें आवाज़ उठानी चाहिए.
वह कहती हैं, “मैं चुप रहकर ये सब नहीं देख सकती. कई लोगों ने मुझे सुना और कहा कि अपना ज्ञान साझा करने के लिए शुक्रिया और वो दूसरों को भी शिक्षित करने लगे. मुझे लगता है कि ये महत्वपूर्ण है.”
“हालांकि, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो सुनना ही नहीं चाहते और मुझे लगने लगता है कि ये समय की बर्बादी है.”
डॉक्टर वेस्ट का कहना है कि अगर आप लोगों की पोस्ट पर जवाब दे रहे हैं तो ये उम्मीद ना करें कि वो तुरंत ही बदल जाएंगे.
रिसर्च कहती है कि इंटरनेट पर बहस करने से लोग कम पक्षपाती हो जाएंगे, ऐसा नहीं है. लेकिन, उन्हें ये पता चल जाता है कि दूसरे उनके इस व्यवहार को सही नहीं मानते.
“लोगों को शिक्षित करने के तरीक़े हैं लेकिन फिर भी उसमें समय लगता है. इसके लिए इंटरनेट पर लड़ाई करने का तरीक़ा सही नहीं है.”
नस्लवाद विरोधी चैरिटी ‘होप नॉट हेट’ में इंटेलिजेंस के प्रमुख मैथ्यू कॉलिन्स कहते हैं कि डर और समझ की कमी से ज़्यादा नस्लवादी विचार और कट्टरता पैदा होती है.
मैथ्यू मानते हैं कि समाज को एक मजबूत नेतृत्व की ज़रूरत है जो लोगों में नस्लवादी समानता को लेकर मौजूद डर को ख़त्म कर सके. लोगों को डर लगता है कि उनके पास जो है वो समानता आने से खो देंगे.
“हमें ध्यान रखना होगा कि अगर हम लोगों के इस डर को कम नहीं कर पाते कि समानता उनसे कुछ छीन लेगी, तो हमें बहुत सारा विरोध झेलना पड़ेगा.”
मैं जिस व्यक्ति को जानती हूं उसके फेसबुक पेज पर काले लोगों को लेकर मज़ाक किया गया था. मैं कुछ नहीं कर सकती सिवाए नज़रअंदाज़ करने के. मैं इस सबसे थक चुकी हूं. अब अनफ्ऱेंड बटन दबाने का समय आ गया है.
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