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ऐसे मनाया जाता था मुगलों के दरबार में ईसाइयों का ईस्टर
- Author, आरवी स्मिथ
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत में ईस्टर सेंट थॉमस (पहली सदी) के समय से ही मनाई जा रही है, लेकिन इस त्योहार ने मुगलों के समय में यहां के स्थानीय रंगों में ढलना शुरू किया.
तब मुगलों की राजधानी आगरा हुआ करती थी और अकबर और जहांगीर दोनों ने इसका संरक्षण जेसुइट मिशनरी को दे रखा था.
क्रिसमस और ईस्टर उत्सवों को प्रोत्साहित किया जाता था क्योंकि अंग्रेज़ी, फ्लेमिश (बेल्जियम के लोग), पुर्तगाली, फ्रांसीसी और अमरीकी व्यापारियों के साथ ही रईस और शासक (जो निश्चित रूप से, मुसलमान थे) इसमें बहुत उत्साह से शामिल होते थे.
अकबर ने आगरा में एक चर्च का निर्माण करवाया था जिसे जहांगीर ने फिर से सजाया था.
न केवल यह, बल्कि उन्होंने अपने दो भतीजों का बैपटिज़्म जेसुइट विधि से ही करवाया था.
मुगल दरबार में ईसाई
चर्च के रखवाले खुशी और उत्साह में तब तक घंटे की रस्सियों को झटके से खींचते रहते जब तक यह गिर नहीं जाते.
ये घंटे इतने भारी होते कि अकेल हाथी से भी उसे कोतवाली तक नहीं पहुंचाया जा सकता था.
वापस उन दिनों के ईस्टर पर आते हुए, यह अजीब लग सकता है कि उपवास की अवधि को उसी दृढ़ता के साथ मनाया जाता था जैसे रमज़ान में मनाते हैं, हां भोज और नृत्य में कटौती कर दी जाती थी.
पांचवें रविवार (पैशन संडे) और ईस्टर से पहले वाले रविवार (पाम संडे) के साथ ही ईस्टर का हफ़्ता मुगल दरबार में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों व्यापारियों के लिए शोक की एक कठिन अवधि होती थी.
ईस्टर से ठीक पहले गुरुवार को पारंपरिक भेड़ के खाने के बाद, पवित्र शनिवार तक चर्च के घंटों को धीरे बजाया जाता था.
अकबर को ईसाई धर्म से था लगाव
गुरुवार और ईस्टर के बीच पड़ने वाला गुड फ़्राइडे, उपवास का सबसे पवित्र दिन होता था.
क्या ख़ुद बादशाह इसमें कभी शामिल हुए थे, इसका पता तो नहीं, लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अकबर को ईसाई धर्म के प्रति बेहद लगाव था और वो ईसाइयों के इस पवित्र दिन से ख़ुद को दूर नहीं रखते थे.
गुड फ़्राइडे के दिन आगरा क़िले के अंदर या बाहर रहने वाले ईसाई, शाम को शहर के दूसरे छोर पर स्थित चर्च तक एक जुलूस निकालते.
सुसज्जित हाथियों, ऊंटों और घोड़ों के साथ यह जुलूस मुख्य बाज़ार से होता हुआ गुज़रता. अंग्रेज़ों के प्रतिनिधि कैप्टन हॉकिंस इस जुलूस का नेतृत्व करते जिसके आगे ईसा मसीह को चांदी के तीस सिक्कों के लिए यहूदियों के हाथों बेचने वाले जूडस इस्कैरिएट का एक पुलता होता था.
प्रथा का अहम हिस्सा
'जुडस के पुतले' को जलाना शायद राजनीतिक और अन्य नेताओं को नीचा दिखाने के लिए इस प्रथा का अहम हिस्सा था.
यह इस मायने में बेहद अलग था कि उस वक्त आगरा की तरह दुनिया के किसी और हिस्से में 'जुडस का पुतला' नहीं फूंका जाता था.
ये गद्दार को इतने क़रीब से दर्शाने का प्रतीक था.
इसे बनाने में कई हफ़्ते लगते और यह काम अधिकतर मिट्टी के खिलौने बनाने वालों और आगरा में विदेशी व्यापारियों की पत्नियों के जिम्मे होता.
मुगलों के हरम से भी इसकी मांग होती. महिलाएं इन पुतलों को जबरन लेने में मदद करतीं और दिन के उस वक्त का पूरे उत्साह से इंतजार करतीं जब इसे जलाया जाता.
आगरा के हिंदुओं के लिए यह वक्त दशहरे के जैसा होता जब रावण के पुतले में आग लगाई जाती है.
अकबर और जहांगीर
और जब जुलूस चलते चलते आखिरकार अकबर के चर्च तक पहुंचता, जूडस इस्कैरिएट का विधिवत पूरे जुनून के साथ आग के अंगारों में अंत कर दिया जाता.
जैसे ही पुतला जल कर राख होता दर्शकों की बड़ी गर्जना गूंजती और जुलूस में शामिल लोग जिस तरह आए थे, वैसे ही वापस लौट जाते.
ईस्टर के रविवार को ईसाई एक बार फिर चर्च पर जुटते जहां अकबर और जहांगीर प्रमुख आमंत्रित लोगों में से होते थे.
इतने पटाखे फोड़े जाते थे कि इसकी गरज और हल्ले के कारण कोई सोचता कि आगरा पर बम दागे जा रहे हैं.
इसके बाद पूरी तरह से भरी राजसभा में दावत और उत्सव शुरू होता जिसमें केवल बहुत ज़्यादा रूढ़िवादी लोग ही भाग नहीं लेते.
उन दिनों में आयोजित किए जाने वाले समारोह आज भी आगरा के चर्च में जारी हैं, लेकिन जुडस के पुतले को अब नहीं जलाया जाता है.
'दीन-ए-इलाही' से नाता
इसकी जगह इलाके के कैथोलिक मृत यीशू के आकार की प्रतिमा को लेकर प्रार्थना करते हुए चर्च का चक्कर लगाते हैं.
इनमें से कुछ प्रार्थना उर्दू में भी की जाती हैं और ये उतने ही दुख भरे होते हैं जितना कि मुसलमानों में मर्सिया पढ़ा जाता है.
इसके बाद इस प्रतिमा को संगमरमर के मेहराब में साल भर के लिए रखे जाने से पहले लोगों की पूजा के लिए अकबर के चर्च में रखा जाता है.
ईस्टर, वास्तव में यहूदियों का 'पासओवर' त्योहार है. यह ईसा मसीह के दोबारा जीवित होने और नए जीवन और जीवन के बदलाव के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है.
पूरी तस्वीर यह बताती है कि यह अकबर और उनके वज़ीर अबुल फ़ज़ल की धार्मिक संकल्पना 'दीन-ए-इलाही' में फ़िट बैठता था.
और यही दीन-ए-इलाही, न कि ईसाइयत, ईस्टर के उत्सव में शामिल होने की वजह भी थी.