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मुग़ल ऐसे मनाते थे सावन का जश्न
- Author, आरवी स्मिथ
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
सावन की कसक और रूमानियत अक्सर किस्से कहानियों और कविताओं का हिस्सा रही हैं.
जब आषाढ़ महीने की आख़िरी रात तूफ़ान के साथ मॉनसून का आगाज़ न हुआ तो मोहन राकेश ने अपनी यादगार कृति 'आषाढ़ का एक दिन' रच डाली.
लेकिन इससे बहुत पहले की बात है जब मुगल दरबार में ब्रितानी रेसिडेंट विलियम फ्रेज़र अपने मित्र कर्नल जेम्स स्किनर के साथ बरसात का मौसम के आने की ख़ुशी में झूम उठते थे.
दिल्ली के कश्मीरी गेट पर विलियम फ्रेज़र के घर पर और हांसी में कर्नल स्किनर के आवास पर दोनों मित्र साथ-साथ सावन की रूमानियत का मज़ा लेते.
हरियाणा के दूरदराज़ के इलाकों में दोनों दोस्त घने बादलों के बीच शराब पीते.
विलियम फ्रेज़र की हवेली को बाद में हिंदू राव ने ख़रीद लिया था और अब इसे हिंदू राव अस्पताल के नाम से जाना जाता है.
कई कहानियां मशहूर हैं कि एशियाई संस्कृति में रचे-बसे 'साहिब' विलियम फ्रेज़र अपनी महिला मित्रों के साथ सुहाने मौसम में दिल्ली से दूर बावली में समय बिताने चले जाया करते.
फ्रेज़र शायद ही कभी अपने वतन लौटे थे. उनके भाई दिल्ली में उनके साथ आकर रहे थे और टीबी की बीमारी से उनकी मौत हो गई थी. फ्रेज़र ने अपने बीमार भाई का इलाज यूनानी चिकित्सक हक़ीम अजमल ख़ान के दादा से करवाया था.
विलियम फ्रेज़र की उनमें बहुत आस्था थी. वो फ़ारसी, अरबी, उर्दू और संस्कृत के विद्वान थे और इलाज की भारतीय तरीकों में काफ़ी दिलचस्पी रखते थे, इनमें आयुर्वेद भी शामिल है.
विलियम फ्रेज़र फ़िरोज़पुर के युवा नवाब शमसुद्दीन ख़ान के काफ़ी क़रीब आ गए थे, लेकिन नवाब की छोटी बहन के साथ नज़दीकियां बढ़ने पर उनकी हत्या करवाए जाने की भी एक कहानी बताई जाती हैं.
विलियम फ्रेज़र यूरोपीय कम और हिंदुस्तानी ज़्यादा थे, माना जाता है कि शायद मशहूर लेखक रुडयार्ड किपलिंग का किरदार जोसेफ़ जलालुद्दीन मैकिनटॉश, फ्रेज़र पर ही आधारित था. जलालुद्दीन मैकिनटॉश जन्म से तो ब्रितानी थे लेकिन जैसे हिंदुस्तान ने उन्हें गोद ले लिया था.
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि फ्रेज़र को ब्रितानियों के बर्ताव में अकड़ पसंद नहीं थी. उन्हें निजी तौर पर मैटकाफ़े बंधुओं से बड़ी चिढ़ थी. चार्ल्स मैटकाफ़े फ्रेज़र से पहले ब्रितानी रेसिडेंट थे और उनके भाई सर थॉमस, फ्रेज़र की हत्या के बाद ब्रितानी रेसिडेंट बने.
शायद फ्रेज़र का आकलन ग़लत था क्योंकि सर थॉमस मैटकाफ़े भी हिंदुस्तान को चाहने वाले निकले.
महरौली में मोहम्म्द क़ुली के कब्र के पास उन्होंने अपने खाली समय में रहने के लिए अपना बसेरे 'दिलखुशा' बना लिया था, सर थॉमस यहां कुर्ता पजामा पहनकर, खस के इत्र का मज़ा लेते हुए सावन का लुत्फ़ लिया करते थे.
आषाढ़ की गर्मी और उमस सर थॉमस मैटकाफ़े को परेशान ज़रूर करती लेकिन बर्फ़ीले पानी से भरा टब उन्हें और उनकी शराब को ठंडा रखने के लिए काफ़ी हुआ करते थे.
उन दिनों ग्लोबल वॉर्मिंग ने ख़तरे की घंटी नहीं बजाई थी और सावन लगभग तय समय पर यानी कि 29 जून को दिल्ली में दस्तक दे दिया करता था.
सावन के आख़िरी दिन बादलों की गड़गड़ाहट और कड़कड़ाती बिजली की चमकार में मेहरौली में ऐतिहासिक इमारतें भी रौशन हो जाया करती थीं. क़ुतुब मीनार को कई बार आकाशीय बिजली, तो कई बार भूकंप से नुकसान पहुंचा. एक ब्रितानी अधिकारी मेजर रॉबर्ट स्मिथ ने लाइटनिंग कंडक्टर लगाकर क़ुतुब मीनार को आकाशीय बिजली से बचाने का इंतज़ाम किया था.
सावन की तूफ़ानी रात में होने वाली तेज़ बारिश सर थॉमस को दिल्ली में अपने मैटकाफ़े हाउस की याद दिलाती क्योंकि भारी बरसात में महरौली में पुरानी ऐतिहासिक इमारतों में रहना आसान नहीं था.
दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी के अंत की शुरुआत सर थॉमस के लिए क्रिसमस के समय जैसी ख़ुशी लाया करती. लेकिन 'दिलखुश' में सावन के स्वागत में कोई औपचारिकता नहीं हुआ करती, वो अपना कुर्ता उतारकर बारिश की बूंदों में अपना तन- मन दोनों भिगो लेते.
किसी भी अंग्रेज़ साहिब की तरह, मटका कोठी में सर थॉमस भी यही चाहते कि महिलाएं संतरे और आम खाने के लिए गुसलखाने में जाएं ताकि आम और संतरे के रस से वो अपने कपड़ों को गंदा न कर लें.
कई बार यूं लगता है कि मैटकाफ़े के बारे में फ्रेज़र जो सोचते थे वो कुछ हद तक ठीक था, फ्रेज़र को लगता था कि मैटकाफ़े बंधु घमंडी और अकड़ू थे.
मुग़ल भी सावन की राह तकते
बाबर, हुमायूं, अक़बर और शाहजहां भी गर्मियों से राहत के लिए सावन का इंतज़ार करते.
मुग़ल शासकों में जहांदार शाह अपनी दलकश पत्नी लाल कंवर को प्यार करने के लिए बरसात के मौसम को सबसे बेहतर मानते थे.
उनके बाद आए फ़ारूक सियार, जिन्होंने आगरा में दिल्ली गेट बनाने के लिए सावन का महीना ही चुना था.
मोहम्मद शाह रंगीला की कृति 'बरसात की रातें' भी सावन के लिए उनकी चाहत का सबूत है.
शाह आलम के तौर पर शहज़ादा अली गौहर जब युवा थे को तैराकी पसंद करते, वैसे ही अक़बर शाह और बहादुर शाह ज़फ़र भी तैराकी के शौक़ीन थे.
सावन के तुरंत बाद महरौली में फूलों वाली की सैर की परंपरा तो अभी भी जारी है.
आख़िरी मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फ़र बरसात के मौसम महरौली में बिताना पसंद करते थे, सावन में यहां हर पेड़ पर झूले पड़ जाते और मल्हार की स्वर लहरियां सावन का समां बांधती.
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