क्या खिचड़ी पक रही है सऊदी और इसराइल के बीच?

- Author, हसब अमार
- पदनाम, बीबीसी फ़ारसी सेवा
जब सऊदी अरब के राजनीतिक विश्लेषक पहली बार किसी इसराइली टेलीविज़न पर दिखे तो अरब जगत के लिए ये चौंका देने वाला मामला था.
राजनीतिक विश्लेषक अब्दुल हमीद हाकिम एक इसराइली न्यूज़ चैनल पर इस सवाल पर परिचर्चा में बहस करते दिखे कि सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों ने क़तर से कूटनीतिक संबंध क्यों तोड़े?
अब्दुल हमीद हाकिम ने कहा, "सियासी मकसद के लिए मज़हब का इस्तेमाल करने वाले हमास और अल-जिहाद जैसे चरमपंथी संगठनों का अरब देशों की राजनीति में कोई रोल नहीं होना चाहिए. इन देशों ने तय किया है कि मध्य पूर्व में केवल और केवल अमन होगा."
उन्होंने आगे कहा, "और इस दिशा में पहला कदम चरमपंथ के स्रोत को ख़त्म करना है."

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सऊदी प्रतिनिधिमंडल
इसराइली टेलीविज़न पर किसी अरब विश्लेषक की मौजूदगी और इसराइल से लड़ने वाले चरमपंथी गुटों पर उनके कमेंट कई लोगों के लिए हैरान करने वाली बात थी.
इसराइल इन चरमपंथी गुटों को मध्य-पूर्व में शांति की राह में रोड़ा समझता है और अरब जगत में कई लोगों के लिए ये चरमपंथी संगठन इसराइली कब्ज़े के खिलाफ़ लड़ रहे हैं.
कुछ लोग ये सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या सऊदी अरब पहले से इसराइल के संपर्क में है?
अब्दुल हमीद हाकिम पिछले साल जुलाई में इसराइल जाने वाले सऊदी प्रतिनिधिमंडल में भी शामिल थे.
इस प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख सऊदी आर्मी के रिटायर्ड जनरल अनवर सईद ईशागी थे. अनवर सईद ईशागी कई सालों तक सऊदी अरब की सरकार के सलाहकार के तौर पर काम कर चुके हैं.

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सऊदी मीडिया
फिलहाल वे जेद्दा में 'सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड लीगल स्टडीज़ इन मिडिल ईस्ट' के चीफ़ हैं. ये भी कहा गया कि यरूशलम में उनकी मुलाकात इसराइली विदेश मंत्रालय के महानिदेशक डोरे गोल्ड से हुई.
हालांकि सऊदी मीडिया में इन ख़बरों को खारिज किया गया कि उनका कोई प्रतिनिधिमंडल इसराइल भी गया है.
लेकिन अनवर सईद ने इसराइल दौरे की पुष्टि करते हुए कहा, "सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड लीगल स्टडीज़ इन मिडिल ईस्ट के प्रमुख की हैसियत से मुझे फलस्तीनी प्राधिकरण ने अरब शांति योजना पर चर्चा करने के लिए रामल्ला आने की दावत दी थी. इस यात्रा के दौरान मैं यरूशलम भी गया, वहां की अक्सा मस्जिद में नमाज़ भी पढ़ी. इसके बाद फलस्तीनी भाइयों ने मुझे डिनर पर बुलाया. इस पार्टी में शरीक होने वाले लोगों में डोरे गोल्ड भी एक थे. रामल्ला में भी इसराइली संसद के अरब मेंबरों ने मुझसे मुलाकात की."

इसराइली अफसरों से मुलाकात
अनवर सईद ईशागी ने ये बात भी जोर देकर कही कि उनकी इसराइल यात्रा निजी थी और इसका सऊदी सरकार से कोई लेना-देना नहीं था.
जून, 2005 में भी वॉशिंगटन स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ़ फ़ॉरेन रिलेशंस की एक कॉन्फ्रेंस में अनवर सईद ईशागी शरीक हुए थे जिसमें उनकी बगल में डोरे गोल्ड बैठे थे.
अपने भाषण में उन्होंने दावा किया कि ईरान क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहा है और अरब देशों का ये मानना है कि ईरान अरब देशों में तख्तापलट कर फ़ारस साम्राज्य को फिर से खड़ा करना चाहता है.
उनसे पहले कुछ और सऊदी अधिकारियों ने इसराइली अफसरों से मुलाकात की है.
सऊदी खुफिया विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रिंस तुर्की फैसल और इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जनरल याकोव एमिडारार की पिछले साल वॉशिंगटन में ही मुलाकात हुई थी.

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अरबों की समझदारी
इस मुलाकात में सऊदी अरब और इसराइल के बीच सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई.
इस मीटिंग में प्रिंस तुर्की फैसल ने कहा कि अगर इसराइल अरब जगत के साथ अमन के साथ रहेगा तो दोनों पक्ष हर चुनौती से निपट सकते हैं.
उनके मुताबिक यहूदियों के पैसे और अरबों की समझदारी से बहुत कुछ किया जा सकता है.
मई में प्रिंस फैसल ने मई में इसराइली खुफिया विभाग के पूर्व अधिकारी एमोस येड्लिन से ब्रसेल्स में मुलाकात की थी.
सऊदी पत्रकार अब्दुल अजीज खामिस इस बात से इनकार करते हैं कि ये मुलाकातें सऊदी अरब और इसराइल के बीच आधिकारिक स्तर पर हुई हैं.
उनका कहना है, "ईरान और सऊदी अरब के बीच जब संकट की स्थिति आती है तो सऊदी-इसराइल संबंधों की चर्चा तेज़ हो जाती है और फलस्तीन के मुद्दे पर सऊदी अरब के समर्थन को संदेह की नज़र से देखा जाने लगता है. सऊदी अरब को अब इन अफवाहों की आदत पड़ गई है."

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ईरान के ख़िलाफ़
लेकिन कई विश्लेषक ये भी मानते हैं कि सऊदी अरब के अधिकारियों के लिए बिना सरकार की मंजू़री के इसराइल के साथ बात करना बहुत मुश्किल है.
अरब जगत और इसराइल की मीडिया में दोनों मुल्कों के अधिकारियों के बीच होने वाली मुलाकातों से जुड़ी खबरें लगातार छपती रही हैं.
इसराइल के पूर्व डिप्लोमैट माउर कोहेन खुद कई बार अपने देश के नेताओं के साथ सऊदी देशों का दौरा कर चुके हैं. उनका कहना है कि इसमें कोई शक नहीं कि सऊदी अरब और इसराइल के रिश्तों ने हाल के दिनों में बड़े बदलाव देखे हैं.
उन्होंने कहा, "इसराइल या सऊदी अरब में कोई भी अधिकारी इस मुद्दे की पुष्टि नहीं करेगा क्योंकि सऊदी अरब इस रिश्ते को सार्वजनिक नहीं करना चाहता है."
दोनों देशों के बीच पनपते रिश्तों में एक एंगल ईरान का भी है. अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने मई में अपने खाड़ी दौरे के समय ईरान को अरब देशों और इसराइल का साझा दुश्मन करार दिया था.

इसराइल की तलाश
हालांकि अनवर सईद ईशागी ईरान को कोई ऐसा गंभीर खतरा नहीं मानते हैं जिसकी वजह से अरब देश इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे.
लेकिन काहिरा में सेंटर फ़ॉर रीजनल स्टडीज़ के प्रमुख अब्दुल मोनीम सईद का कहना है, "ईरान की फौज़ इराक़ और सीरिया में मौजूद है, लेबनान में हिजबुल्ला उनकी नुमाइंदगी करता है, यमन में हूती विद्रोहियों को उनका समर्थन हासिल है. इराक़ के ज्यादातर शिया चरमपंथियों को ईरान में ट्रेनिंग मिलती है. और इस वजह से ईरान के खतरे को खारिज नहीं किया जा सकता है."
इसराइल इस बात से वाकिफ है कि अरब जगत को ईरान से दिक्कत है और तेल अवीव यूनिवर्सिटी में मध्य पूर्व मामलों के प्रोफेसर डेविड मानाशेरी का कहना है कि इन हालात में इसराइल के पास अरब देशों से दोस्ती का मौका है.
वे कहते हैं कि इसराइल अलग-थलग नहीं रह सकता है और वो ऐसे दोस्तों की तलाश कर रहा है जिससे उसके हित जुड़े हुए हों.
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