जब कल्पना और हक़ीकत एक लगने लगे

इमेज स्रोत, Olivia Howitt

बहुत से लोग मन में कल्पनाएं पाल लेते हैं और उन्हें ख़्वाब ही सच मालूम होने लगते हैं.

उनके ज़ेहन में ये कल्पनाएं ही सच्ची यादों के तौर पर बस जाती हैं. ऐसी सूरत में उन्हें ज़िंदगी में तमाम तरह की दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है.

ऐसे ही एक शख़्स हैं मैथ्यू, जिन्हें हाल ही में ब्रेन सर्जरी करानी पड़ी थी.

मैथ्यू एक कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं. उन्हें इस बात का एहसास था कि ब्रेन सर्जरी के बाद उन्हें अपनी नौकरी में दिक़्क़तों का सामना करना पड़ेगा.

जब वो वापस नौकरी पर पहुंचे, तो साथियों ने उनका हौसला बढ़ाया और कहा कि मैथ्यू को जैसी मदद की ज़रूरत होगी, वो करने को तैयार हैं.

मगर इस मीटिंग के अगले ही दिन मैथ्यू को जो याद रहा, वो ये था कि सारे दोस्त उन्हें नौकरी से निकालने की बात कर रहे थे.

ये याद उनके ज़ेहन पर इस क़दर हावी थी कि यही बात मैथ्यू को सच लगी, जबकि ये सरासर झूठ था.

जल्द ही मैथ्यू को ये एहसास हो गया था कि वो कल्पनाओं को ही, सच्ची यादों के तौर पर ज़ेहन में बसा लेते हैं.

ऐसा करने वालों का इरादा झूठ बोलना या किसी को बरग़लाना बिल्कुल नहीं होता.

उनकी परेशानी ये होती है कि वो सच और मनगढ़ंत बातों का फ़र्क़ नहीं कर पाते हैं.

इस बात का एहसास होते ही मैथ्यू को सदमा लग गया, क्योंकि वो पहले ही दिमाग़ की सर्जरी की वजह से तकलीफ़ में थे और इस नई बात ने उन्हें एक और झटका दे दिया था.

मैथ्यू की इस दिक़्क़त से हम अपने दिमाग़ के काम करने के तरीक़े को समझ सकते हैं. ये भी समझ सकते हैं कि इंसान का दिमाग़ कैसे हमारी यादों को सहेजता है.

आज मैथ्यू, लंदन के हेडवे ईस्ट लंदन नाम की परोपकारी संस्था से जुड़े हुए हैं. ये संस्था दिमाग़ की चोट के शिकार लोगों की मदद करती है.

इमेज स्रोत, Olivia Howitt

मैथ्यू से बात करने पर पता चलता है कि वो बहुत संभलकर बात करते हैं. कई बार वो अपने पुराने साथी ग्राहम से पूछते हैं कि उन्होंने जो कहा वो सही है या नहीं.

अपनी चोट से पहले मैथ्यू ने बहुत मुश्किल भरी ज़िंदगी बिताई थी. बचपन का बड़ा हिस्सा विदेश में गुज़ारकर वो सत्रह बरस की उम्र में अपने रिश्तेदारों के साथ लंदन में रहने पहुंचे थे. मगर एक महीने बाद ही रिश्तेदारों ने उन्हें घर से निकाल दिया.

बहुत दिनों तक बेघर रहने के बाद उन्होंने कॉलेज में दाख़िला ले लिया. वो दिन में पढ़ाई करते थे और रात में काम करते थे ताकि ख़र्च के लिए पैसे जुटा सकें.

अपनी मेहनत से उन्होंने लंदन के मशहूर यूनिवर्सिटी कॉलेज में जगह बना ली थी, जहां उन्होंने गणित और कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की. बाद में उन्हें कंप्यूटर प्रोग्रामर की नौकरी मिल गई.

नौकरी के कुछ दिनों बाद ही उन्हें दिक़्क़त होने लगी थी.

उनकी उंगलियां सुन्न पड़ जाती थीं, कुछ महसूस नहीं होता था, उन्हें भयंकर सिरदर्द होता था और हर चीज़ दो-दो दिखाई देती थीं.

कई बार उन्हें पूरा पूरा दिन एक आंख बंद करके काम करना पड़ता था.

सीटी स्कैन से पता चला कि मैथ्यू के दिमाग़ में एक जगह एक सिस्ट हो गया था. इस वजह से दिमाग़ के अंदर जो रस बहता था, उसका रास्ता बंद हो गया था.

इससे उनके दिमाग़ में दबाव तेज़ी से बढ़ रहा था, क्योंकि दिमाग़ के रस के बहाव का रास्ता बंद था.

अगर ऐसा होता है तो दिमाग़ में बहने वाला रस आपकी खोपड़ी पर दबाव बनाता है. इसकी वजह से उस नस पर भी दबाव पड़ रहा था, जिसकी मदद से आंखें देख पाती हैं.

इसलिए मैथ्यू को हर चीज़ दो-दो दिखाई दे रही थी.

इमरजेंसी में डॉक्टरों ने मैथ्यू के दिमाग़ की सर्जरी की. वो सिस्ट हटाया, जो दिमाग़ी रस के बहने का रास्ता रोक रहा था और दिमाग़ में भरा ज़्यादा रस भी निकाला.

इमेज स्रोत, Olivia Howitt

अस्पताल में पड़े-पड़े ही मैथ्यू को ये एहसास हो गया था कि इस बीमारी से उनकी याददाश्त को तगड़ा झटका लगा है.

वो कमरे में दाख़िल होने या निकलने वाले लोगों तक को भूल जा रहे थे. उन्हें लगता था कि जैसे लोग अचानक से आकर उनके सामने खड़े हो गए हैं.

मैथ्यू की बीमारी का पता लगाने वाले यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वॉन बेल कहते हैं कि इंसान का दिमाग़, ख़ाली जगह को पसंद नहीं करता. जब मैथ्यू अपनी बीमारी से उबरने की कोशिश कर रहे थे तो दिमाग़ ने ख़ाली हुई जगह पर कुछ-कुछ भरना शुरू कर दिया.

मैथ्यू ने एक बार एक डॉक्टर को बड़े ग़ुस्से में एक मेल कर दिया कि उन्हें क्यों रिहैब सेंटर से जाने को कहा जा रहा है जबकि अभी वो पूरी तरह ठीक नहीं हैं.

बाद में पता चला कि उनके दिमाग़ में ये बात बैठी हुई थी कि उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है. जबकि असल में ऐसा कुछ नहीं था. फिर भी मैथ्यू को यही याद था कि अस्पताल से उन्हें घर भेज दिया गया है.

मैथ्यू को लग रहा था कि उनका दिमाग़ उनका नहीं किसी और का है, वह किसी और का कहा सुनता है.

मैथ्यू कहते हैं कि आप जो देखते सुनते हैं और आपका दिमाग़ उन बातों को जिस तरह सहेजकर रखता है, उसमें फ़र्क़ होता है.

यही वजह है कि अगर आपके दिमाग़ में कोई बात काफ़ी दिनों से चल रही है, तो कई बार दिमाग़ में वो याददाश्त के तौर पर जमा हो जाती है.

जैसे कि मैथ्यू ये समझते थे कि उनकी कंपनी के लोग, कारोबारी दिमाग़ के हैं और उनकी बीमारी और परेशानियों से उन्हें कोई सरोकार नहीं होगा.

इसी समझ के चलते मैथ्यू जब नौकरी पर लौटे, तो उन्हें ये याद रहा कि उन्हें नौकरी से निकाले जाने का फ़रमान सुना दिया गया है. जबकि असल में ऐसा कुछ नहीं था.

होता कुछ यूं है कि जब हम पुरानी बातों को याद करने लगते हैं, तो हमारा दिमाग़ उस वक़्त की घटनाओं को सिलसिलेवार ढंग से पेश करने लगता है.

इस दौरान हमारा दिमाग़ बहुत तेज़ी से काम कर रहा होता है. वो ज़रूरी जानकारी को सलीक़े से पेश करता जाता है और ग़ैर ज़रूरी जानकारी हटाता जाता है.

इमेज स्रोत, Olivia Howitt

किसी भी इंसान का दिमाग़ इस पूरी प्रक्रिया को एकदम सटीक तरीक़े से नहीं करता. इसमें कुछ न कुछ कमियां रह जाती हैं और अच्छे ख़ासे दिमाग़ में भी कई झूठी यादें जमा हो जाती हैं.

न्यूज़ीलैंड और कनाडा में कुछ लोगों को ऐसी बनावटी तस्वीरें दिखाई गईं, जिनमें वो ग़ुब्बारे की मदद से हवा में उड़ते दिखाए गए थे. जबकि असल में ऐसा कुछ नहीं हुआ था.

मगर कुछ दिनों बाद जब उनसे बात की गई तो उनमें से आधे लोगों ने हवा में उड़ने के तजुर्बे का फ़र्ज़ी क़िस्सा गढ़कर सुना दिया.

असल में यह सब कुछ जान-बूझकर नहीं हुआ, उन्होंने जानबूझकर झूठी कहानी नहीं सुनाई. उनके दिमाग़ ने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया.

ज़्यादातर अहम जानकारियों को लेकर हमारा दिमाग़ एकदम सटीक जानकारी देता है. मगर मैथ्यू को जो दिक़्क़त हुई, वो उनकी दिमाग़ी बीमारी और उसके बाद हुई ब्रेन सर्जरी की वजह से हुई.

वैसे मैथ्यू ऐसे इकलौते इंसान नहीं. कई लोग तो कल्पना के घोड़े कुछ ज़्यादा ही दौड़ा देते हैं.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वॉन बेल कहते हैं कि कुछ लोगों ने तो ये सोच डाला कि उन्होंने अंतरिक्ष यान बनाकर चांद तक का चक्कर लगा लिया है. एक शख़्स तो जब कोमा से बाहर आया तो उसने एलान किया कि उसकी गर्लफ्रेंड को जुड़वां बच्चे होने वाले हैं.

अपनी परेशानी से निपटने के लिए मैथ्यू आजकल अपने साथ एक डायरी रखते हैं, जिसमें वो हर बात को नोट कर लेते हैं. जैसे वो कहां-कहां गए, किन लोगों से मिले, क्या बात की और क्या खाया. ताकि, जब उन्हें उनका दिमाग़ बरग़लाने की कोशिश कर सकें तो वो डायरी की मदद से सच और मनगढ़ंत क़िस्से के बीच फ़र्क़ कर सकें.

इमेज स्रोत, Olivia Howitt

फिर भी कई बार उन्हें उनका दिमाग़ ग़च्चा देने में कामयाब हो जाता है. इसलिए मैथ्यू अपने पुराने साथी बेन ग्राहम की मदद लेते हैं. ग्राहम को भी काफ़ी एहतियात बरतनी होती है. वरना, उनकी कुछ बातों को मैथ्यू का दिमाग़ अपनी कहानी से जोड़कर मनगढ़ंत यादों का एक पन्ना जोड़ सकता है.

इन परेशानियों के बावजूद मैथ्यू को याददाश्त से उतनी दिक़्क़त नहीं हो रही. उन्हें इतना सोचने विचारने और हर वक़्त एलर्ट रहने की वजह से बहुत थकान महसूस होती है. अगर इस थकान से निजात मिल जाए तो मैथ्यू बहुत राहत महसूस करेंगे. वो कहते हैं कि तब वो याददाश्त जाने की परेशानी से आसानी से निपट सकते हैं.

मैथ्यू की ज़िंदगी की इस मुश्किल घड़ी में छोटी-छोटी ख़ुशिया भी बहुत मायने रखने लगी हैं. जैसे कि वो तरो-ताज़ा महसूस करते हैं तो बाइक की सवारी कर लेते हैं, साइकिल चलाते हैं.

हालांकि उन्होंने कंप्यूटर प्रोग्रामर की अपनी नौकरी पर वापस जाने की उम्मीद नहीं छोड़ी है. मगर वो ये बात बख़ूबी समझ गए हैं कि ज़िंदगी में जो भी है, अभी इसी पल में है. कल का कोई भरोसा नहीं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां </caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160428-this-is-how-it-feels-to-learn-your-memories-are-fiction" platform="highweb"/></link>क्लिक करें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ़्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां </caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi " platform="highweb"/></link>क्लिक कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक </caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link>और <link type="page"><caption> ट्विटर </caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link>पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)