चरमपंथियों को क्यों लगता है कि वो जीतेंगे?

इमेज स्रोत, Getty
पेरिस हमले के बाद यूरोप में सुरक्षा व्यवस्था चौक-चौबंद तो कर दी गई है, लेकिन साथ में इस बात को लेकर बहस-मुबाहिसों का दौर भी जारी है कि आख़िर वो क्या बात है जो मौजूदा पीढ़ी को कट्टरपन की ओर धकेल रही है?
चरमपंथ के इतिहास ने ख़ुद में कई अध्यायओं को समेट रखा है. विस्तार से बता रहे हैं बेनेडीक्ट विलकींसन.
1840 के दशक में जन्मे जोहान मोस्ट को अपने जवानी के दिनों में चेहरे की एक सर्जरी से गुज़रना पड़ा था जिसके बाद उन्हें जवानी भर उपेक्षा का शिकार होना पड़ा था.
आख़िरकार उन्हें एक बुकबाइंडर के तौर पर काम करना पड़ा था. वे बचे हुए वक़्त में साम्यवाद और उसकी राजनीति पर धाराप्रवाह लिखा करते थे.
1870 के दशक के शुरुआत में उन्होंने मार्क्स के लिखे दास कैपिलट का सारांश लिखा था.
हालांकि बाद के सालों में उनका अतिवाद मार्क्स से भी आगे निकल गया. वो साम्यवादी विचारधारा से दूर हो गए और एक उग्र, भावुक और जोशीले अराजकतावादी बन गए.

इमेज स्रोत,
उन्होंने यह दलील देनी शुरू कर दी कि शब्द और भाषणों की ज़रूर अपनी एक भूमिका हो सकती है लेकिन क्रांतिकारी समाजवाद तो हिंसा से ही आएगा.
क्रांति के लिए मोस्ट ने डायनामाइट और बंदूक़ की ज़रूरत को बताया.
अपनी पूरी लेखनी के दौरान उन्होंने राज्य को बहुत शक्तिशाली बताया और राजनीतिक बदलाव को लेकर जो हिंसा का रास्ता है उसे बीच में आने वाली सबसे मौलिक अड़चन बताया.
मोस्ट के समकालिन अराजकतावादी पीटर क्रोपोटकीन इस समस्या को संक्षेप में इसतरह से रखते हैं, "सदियों से चला आ रहा राजनीतिक ढांचा कुछ किलो डायनामाइट से नहीं उड़ाया जा सकता है."
उनका मानना था कि कुछ सरकारी अधिकारियों और पुलिसवालों की मौत राज्य सत्ता को सिर्फ़ खिजला सकती है, ग़ुस्सा दिला सकती है, परेशान कर सकती है लेकिन पूरे ढांचे को नहीं गिरा सकती.

इमेज स्रोत, Getty
इसलिए वो दलील देते हैं कि हिंसा का इस्तेमाल राज्य सत्ता को सीधे उखाड़ कर फेंकने की बजाए राजनीतिक बदलाव के विचार को प्रसारित करने में किया जाना चाहिए और ऐसा करना एक लोकप्रिय क्रांति को खाद-पानी देने जैसा है.
मोस्ट के लिए हिंसा राजनीतिक बदलाव की बात को लोगों तक पहुंचाने का एक नज़रिया थी. यह उनके लिए उस तस्वीर की तरह थी जो ख़ुद में हज़ारों शब्द के बराबर होते हैं. उनकी सोच में एक डायनामाइट हज़ारों अराजकतावादी भाषणों से ज़्यादा प्रभावकारी था. हिंसा उनकी नज़र में एक विशुद्ध प्रचार माध्यम थी.
अब चलते हैं 125 साल बाद की एक अलग दुनिया में. 1958 में अलेप्पो में जन्मे अबु मुसाब अल-सुरी की शख़्सियत और राजनीतिक महत्वकांक्षाएं बिल्कुल अलग थी.

इमेज स्रोत, EPA
निश्चित तौर पर अल-सुरी के जवानी के बारे में बहुत कुछ तो नहीं पता लेकिन ऐसा लगता है कि वे 1980 के क़रीब सीरियाई मुस्लिम ब्रदरहुड के हथियारबंद गुट में शामिल हुए थे.
उसके बाद उन्हें अफ़ग़ानिस्तान जाने का मौक़ा मिला जहां वे अल-क़ायदा के नेता अयमान अल-ज़वाहिरी और अब्दुल्लाह अज़्ज़ाम के संपर्क में आए.
बाद में अल-सुरी अल-क़ायदा के सबसे प्रभावशाली रणनीतिक विचारक बन गए.
उनके और जोहान मोस्ट के बीच एक जैसी दाढ़ी के अलावा भी बहुत कुछ एक जैसा है.
मोस्ट की तरह ही अल-सुरी ने भी बड़े राजनीतिक उद्देश्य को पाने में चरमपंथी हिंसा के इस्तेमाल में जो समस्या है, उसको पहचाना था.
चरमपंथ को लेकर वो दलील देते हैं कि चरमपंथ बहुत संभव है कि देश और सरकारों को परेशान कर के रख दे लेकिन उनके अस्तित्व को पूरी तरह से ख़त्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

इमेज स्रोत, GOOGLE
इसके लिए अल-सुरी ने एक अलग योजना बनाई. उन्होंने दुनिया भर में एक आंदोलन की परिकल्पना की जिसमें सभी हिंसक विचारधारा वाले आंदोलनों को शामिल किया.
हिंसा के दो उद्देश्य होते हैं. इसके लिए पहली दलील वो देते हैं कि चरमपंथ समर्थन पाने और चरमपंथ की वकालत करने में एक प्रचार तंत्र के रूप में काम करता है.
फिर वो दूसरी दलील देते हैं कि लगातार होने वाली चरमपंथी घटनाएं बड़े पैमाने पर लोगों में दहशत क़ायम करेंगी और ये सरकार को चरमपंथियों की मांग पूरा करने के लिए मजूबर कर देंगी.
ये दोनों ही कहानियां चरमपंथ की एक बड़ी समस्या को बतलाती हैं जिसे मैं चरमपंथ की दुविधा कहता हूँ.
चरमपंथ के साथ बुनियादी समस्या है कि वे बड़ा राजनीतिक बदलाव चाहते हैं लेकिन उनके पास इस बदलाव के लिए संसाधन की कमी है.
उनके पास क्या है और वो क्या चाहते हैं इसके बीच एक चौड़ी खाई है.

इमेज स्रोत, AP
इस मौलिक दुविधा ने चरमपंथ के इतिहास में कई युद्ध रणनीतियां तैयार की.
मध्य पूर्व और दक्षिण अमरीका में चरमपंथी समूहों ने नेताओं को इस विश्वास के साथ मारने की कोशिश की कि इससे राज्य में अव्यवस्था छा जाएगी.
कइयों ने राज्य सत्ताओं को संगठित अपराधियों और असफल समूहों के साथ मिलकर उकसाने की कोशिश की.
इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी समहू ने थोड़ी बहुत सफलताओं के साथ सैन्य रूप से भूभागों पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश भी की है.
हाल ही में पेरिस में हुआ हमला और यूरोप में हिंसा की धमकी उनकी दुनिया के पैमाने पर फैलने की महत्वकांक्षा की नई रणनीति को दर्शाता है.
अल-सुरी और मोस्ट चरमपंथियों की दुविधा तक अलग-अलग रास्तों से पहुंचते हैं. पहला युद्ध के रास्ते तो और दूसरा जनता को लामबंद करके.

इमेज स्रोत, AFP
रणनीतिक चरमपंथ के इन सभी धाराओं को एक नया वैचारिक आधार देना इस मौलिक समस्या से निपटने की चरमपंथियों की एक कोशिश है कि चरमपंथ मूलतः ताक़तवर के ख़िलाफ़ कमज़ोरों की रणनीति है.
चरमपंथ एक कुटिल राजनीतिक रणनीति है.
अगर हम चरमपंथ से निपटना चाहते हैं तो भविष्य में हमारे लड़ाई के मैदान आसमान में या मध्य पूर्व के अशांत क्षेत्र में या कहीं और उड़ते हुए ड्रोन नहीं है बल्कि शब्दों और दलीलों की जंग है.

इमेज स्रोत, AP
और अगर हमें इस लड़ाई को जीतना है तो हमें यक़ीन दिलाना होगा, संदेहों को दूर करना होगा और समझाना होगा, हिंसा की प्रवृत्ति के बारे में, राजनीतिक व्यवस्था के फ़ायदे के बारे में और इसके ख़त्म हो जाने के असर के बारे में.
हमें उन्हें बिना बंदूक़ और डायनामाइट के सहारे शांतिपूर्ण तरीक़े से चुनाव की ताक़त और संभावनों को दिखाना होगा.
अगर हमारी ये सारी क़वायदें चरमपंथियों को शांतिपूर्ण राजनीतिक समाधान की ओर ले जाती है तो चरमपंथ के जितने तर्क है, उनकी हवा निकल जाएगी.
लेकिन इसे करने के दौरान उन्हें यह ज़रूर बताना होगा कि चरमपंथ एक ख़राब रणनीति है. उन्हें यह ज़रूर बताना होगा कि हिंसा प्रौपगैंडा खड़ा करने का सबसे ख़राब तरीक़ा है.
(बेनेडिक्ट विलकिंसन किंग्स कॉलेज, लंदन के पॉलिसी इंस्टीट्यूट में सीनियर रिसर्च फेलो हैं. वे अलग-अलग चरमपंथी समूहों की रणनीति के ऊपर शोध कर रहे हैं.)
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












