मुंबई और पेरिस हमलों के सबक़ क्या?

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- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मुंबई में सात साल पहले हुए चरमपंथी हमलों की यादें अब भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं और हाल ही में पेरिस में हुए हमलों ने इस दर्द को और बढ़ा दिया है.
लेकिन दोनों जगहों पर हुए हमलों में किसी तरह की समानता ढूँढना मुश्किल है. पेरिस में हुए चरमपंथी हमलों में 129 लोग मारे गए, जबकि मुंबई में कई घंटों तक हुए चरमपंथी हमलों में 166 लोगों ने जान गंवाई थी.
दोनों हमलों के बारे में कहा जा सकता है कि इनकी साजिश पुख़्ता तरीक़े से रची गई और मक़सद था कम से कम जोखिम पर अधिक से अधिक नुक़सान. यही वजह थी कि चरमपंथी अत्याधुनिक हथियारों और विस्फोटकों से लैस थे.

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सात साल पहले 2008 में मुंबई में हुए अपने तरह के इस पहले हमले ने दुनिया के लिए ख़तरे की घंटी बजाई थी. साफ़ हो गया था कि ऐसा हमला दुनिया के किसी भी कोने में हो सकता है.
भारत में सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ पश्चिमी देशों ने काफ़ी समय पहले पेरिस जैसे हमलों से निपटने के लिए रणनीति बनानी शुरू कर दी थी.
लेखक और पत्रकार प्रवीण स्वामी कहते हैं, “इसमें कोई शक नहीं कि पेरिस में चरमपंथी हमला खुफ़िया एजेंसियों की नाकामी थी. लेकिन फ्रांसीसी सुरक्षाबलों ने बाटाक्लां थिएटर में दो घंटे में ही हालात क़ाबू में करने शुरू कर दिए थे. निश्चित तौर पर उन्होंने मुंबई हमलों से सबक़ लिया होगा. यही वजह थी कि पुलिस ने मोर्चा संभाला और मरने वालों की तादाद कम रही.”
पिछले दशक में अमरीका, ब्रिटेन और भारत जैसे देशों ने सुरक्षा बलों के भीतर तुरंत कार्रवाई करने वाली इकाइयों का गठन किया. इन्हें चरमपंथी हमले होेने पर तुरंत भेजा जा सकता है.

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स्वामी कहते हैं, “जिस तरह फ्रांसीसी पुलिस ने बैलिस्टिक शील्ड (सुरक्षा कवच) का इस्तेमाल किया, वह शानदार था. मैं इस पर इसलिए ज़ोर दे रहा हूँ क्योंकि सात साल पहले मुंबई हमले झेलने वाले भारत जैसे देश में अब भी ऐसी चरमपंथविरोधी तकनीक का इस्तेमाल नहीं हो रहा है.”
हालाँकि, कई लोगों मानते हैं कि भले ही चरमपंथी हमलों से निपटने की फ्रांस की तैयारियां दिखी, उन देशों को सबक़ सीखना बाकी है जो कई दशकों से नुक़सान उठा रहे हैं.
सुरक्षा मामलों के जानकार अजय साहनी कहते हैं, “मुंबई और पेरिस हमलों में एकमात्र समानता यह है कि दोनों हमले शहर पर हुए और कमांडो स्टाइल में किए गए. मगर दोनों के कारण बिल्कुल अलग थे. मुंबई हमलों की रणनीति किलेबंदी करने और कुछ समय तक वहां टिककर अधिकतम नुक़सान पहुँचाने की थी."
साहनी के मुताबिक़, "पेरिस हमले गुरिल्ला अभियान की तर्ज पर किए गए, जिसमें हमले को अंजाम देकर घटनास्थल से तुरंत भाग जाना शामिल था. जहाँ तक जवाबी कार्रवाई की बात है तो ये प्रशिक्षण, संसाधन और सुरक्षा बलों की प्रभावी तैनाती पर निर्भर करता है न कि मुंबई जैसे हमलों से सबक़ पर.”
सवाल यह है कि ये देश ऐसे हमलों के लिए कितने तैयार हैं?.

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प्रवीण स्वामी कहते हैं, “मुझे याद है कि मुंबई हमलों के बाद अमरीका, ब्रिटेन जैसे देशों की सुरक्षा एजेंसियां इसका अध्ययन करने के लिए भारत आई थीं कि हमला कैसे अंजाम दिया गया और सुरक्षा को लेकर किस तरह की खामियां थी. यहाँ तक कि सिंगापुर जैसे देशों ने ऐसे हमलों से निपटने के लिए नियमित तौर पर ड्रिल करना शुरू कर दिया है."
स्वामी आगे कहते हैं, "दुख की बात ये है कि जो देश बार-बार चरमपंथी हमले झेल रहे हैं उनकी इस दिशा में बहुत कम तैयारी है. मसलन, अगर भारत में मुंबई जैसा एक और हमला होता है तो मैं नहीं समझता कि भारत इससे ख़ास तरह से निपटने के लिए तैयार है.”
ये अपुष्ट ख़बरें हैं कि पेरिस हमलों के बाद फ्रांस के अधिकारियों ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों से संपर्क साधा था.
भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय खुफ़िया और आंतरिक सुरक्षा तंत्र की छवि में ख़ास बदलाव नहीं आया है जो उन्होंने पिछले कई वर्षों में बनाई है.

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रक्षा विशेषज्ञ नितिन गोखले कहते हैं, “सवाल अक्सर पूछा जाता है: क्या भारत ने 26/11 हमलों से सबक़ लिया है? क्या इन हमलों ने भारत में पुलिस की कार्यप्रणाली बदली? जवाब है- नहीं.”
हालाँकि प्रवीण स्वामी का कहना है कि पेरिस हमलों के बाद इसकी जाँच में भारत की कोई भूमिका नहीं है.
स्वामी कहते हैं, “पेरिस हमलों की जड़ें फ्रांस या बेल्जियम से जुड़ी हैं. इसलिए इनकी जांच में भारत की कोई भूमिका नहीं है. हमले में शामिल चरमपंथियों के जिहादी प्रशिक्षण की संभावित जगह भी भारत से दूर है. ऐसे में पेरिस और मुंबई हमलों के बीच सीधी-सीधी कोई समानता नहीं है.”
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