'सर्वसम्मत नहीं है नेपाली संविधान'

नेपाल की संसद

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    • Author, सीके लाल
    • पदनाम, वरिष्ठ नेपाली पत्रकार

नेपाल का यह संविधान एक तरह से उपलब्धि है क्योंकि पहली संविधान सभा के विफल होने के बाद ऐसा लग नहीं रहा था कि संविधान पूरा हो पाएगा.

इसके साथ-साथ मातम का माहौल भी है क्योंकि नेपाल के तराई-मधेस के मैदानी इलाक़े में आंदोलन जारी है.

वहां लोग कह रहे हैं कि संविधान में उनकी उम्मीदें और मांगे पूरी नहीं हुई हैं.

पिछले एक महीने से ज़्यादा समय से तराई-मधेस में हड़ताल है जहां हिंसा में 43 लोग मारे जा चुके हैं.

हितों की अनदेखी

नेपाल की संविधान सभा

संविधान के बनने पर नेपाल में मिलीजुली प्रतक्रिया है. आधी जनसंख्या संविधान के बनने से ख़ुश है और बाक़ी अपने हितों की कथित अनदेखी से निराश हैं.

विरोध करने वालों का कहना है कि यह संविधान विभेद को संस्थागत करता है.

संविधान को लागू करने वाले भी स्वीकार कर रहे हैं कि यह सर्वसम्मत नहीं है.

तराई के राजनीतिक दलों के नेताओं ने संविधान निर्माण प्रक्रिया का बहिष्कार किया है. ऐसे में संविधान की जनता में स्वीकृति पर प्रश्न-चिह्न तो लग ही गया है.

संविधान के विरोध में हुए प्रदर्शनों में 43 लोग मारे गए हैं. ऐसे में लोगों की लाशों पर जारी किए गए संविधान पर प्रश्न तो उठेंगे ही.

संस्थागत हुआ गणतंत्र

नेपाल में मांगों को लेकर प्रदर्शन

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इस संविधान का सकारात्मक पक्ष यह है कि नेपाल का गणतंत्र संस्थागत हुआ है. संघीय ढांचे का जो प्रस्ताव अंतरिम संविधान में किया गया था, उसे भी कुछ मूर्त रूप दिया गया है. हालांकि उस पर विवाद क़ायम है.

कहा तो गया है कि नेपाल धर्मनिरपेक्ष देश होगा लेकिन उसके साथ जोड़ दिया गया है कि सनातन धर्म की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य होगा.

इसी तरह सबके समावेश की बात कही गई है लेकिन समाज में जो वर्चस्व रखने वाले समूह हैं, उन्हें भी समावेशिता की सूची में शामिल कर लिया गया है.

परिभाषाएं ऐसे गढ़ी गई हैं कि शब्दों को देखकर लगता है कि सब सही है लेकिन ध्यान से देखें तो पता चलता है कि विभेदों को संस्थागत करने का प्रयास हुआ है.

क्षेत्र के हिसाब से प्रतिनिधित्व

नेपाल में प्रदर्शन

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उदाहरण के तौर पर, प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर न होकर भौगेलिक इलाक़े के आधार पर होगा.

ऐसे में जिन इलाक़ों की जनसंख्या कम है, उनका प्रतिनिधित्व भी उन इलाक़ों के बराबर होगा जहां जनसंख्या ज़्यादा है.

यही वजह है कि इस संविधान का सभी वर्ग स्वागत नहीं कर रहे हैं. दलित, जनजातियां और मधेसी इस संविधान को नकार रहे हैं.

यही वजह है कि इस नए संविधान को जहां स्वीकार किया जा रहा है वहीं मुखर विरोध भी हो रहा है.

(बीबीसी संवाददाता समीरात्मज मिश्र से बातचीत पर आधारित)

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