तालिबान: उमर के बाद नेता कौन?

तालिबान के लड़ाके

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    • Author, रहीमुल्लाह यूसुफ़ज़ई
    • पदनाम, पेशावर से वरिष्ठ पत्रकार

तालिबान के सबसे बड़े नेता मुल्ला मोहम्मद उमर की मौत के बाद आशंका के मुताबिक उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हो गया है.

अब तक तालिबान के उपनेता रहे मुल्ला अख़्तर मोहम्मद मंसूर ने 29 जुलाई को 'रहबरी शूरा' (नेतृत्व परिषद) से उमर की जगह नए प्रमुख के तौर पर ख़ुद का तुरंत चयन करवा लिया.

तालिबान के कुछ सीनियर नेताओं ने चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए उन्हें तत्काल चुनौती दे डाली. उन्होंने तालिबान प्रमुख बनाए जाने के लिए उमर के बड़े बेटे मुल्ला मोहम्मद याक़ूब को समर्थन का एलान कर दिया.

विरोध

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मंसूर विरोधी धड़ा उन्हें तालिबान मूवमेंट के नए अमीर (प्रमुख) के तौर पर स्वीकार करने को तैयार नहीं है. वह नेतृत्व को लेकर बने संकट के निपटारे के लिए 'रहबरी शूरा' की एक और मीटिंग बुलाने की मांग कर रहा है.

वे लोग दावा कर रहे हैं कि मंसूर की बुलाई मीटिंग से शूरा सदस्यों का बहुमत दूर रहा या फिर उन्होंने विरोध में वॉकआउट कर दिया.

शूरा सदस्य और तालिबान के पूर्व गवर्नर मुल्ला मोहम्मद रसूल ने तो मंसूर की नियुक्ति को अवैध और ग़ैरइस्लामिक तक बता दिया और तालिबान के ओहदेदारों की मदद से इसे निरस्त करने की शपथ ली.

समर्थन

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दूसरी तरफ मंसूर के सहयोगियों का दावा है कि शूरा सदस्यों के ज़्यादातर सदस्यों ने मीटिंग में हिस्सा लिया. उन्हें एक राय से नया नेता चुना और साथ में उनके दो सहयोगियों का चयन भी हुआ.

अमरीका और कई अन्य देशों की ओर से चरमपंथी घोषित हक्कानी नेटवर्क के प्रमुख सिराज़ुद्दीन हक्कानी और तालिबान समर्थक धार्मिक स्कॉलर मुल्ला हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा उप प्रमुख चुने गए.

उनका यह भी कहना है कि कुछ शूरा सदस्य मीटिंग की जगह पर मौजूद नहीं थे और ज्यादातर से फ़ोन पर सहमति ली गई.

बढ़ते विरोध के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मंसूर ने 30 जुलाई को तालिबान के बुजुर्गों और मिलट्री कमांडरों को वफादारी की शपथ दिलाने के लिए समारोह आयोजित किया.

ये प्रक्रिया एक-दो दिन जारी रहेगी.

पेशकश

तालिबान लड़ाके

ख़बरें हैं कि उसने उमर के 26 साल के बेटे याक़ूब को तालिबान मिलट्री कमीशन का प्रमुख बनाने की पेशकश भी की.

याक़ूब ने प्रतिक्रिया नहीं दी है और बहुत उम्मीद है कि दोनों धड़े सुलह के लिए तैयार नहीं होते हैं तो वो इस पेशकश को ठुकरा देंगे.

हालांकि तालिबान के कुछ वरिष्ठ नेता दोनों धड़ों के बीच सुलह की कोशिश में जुटे हैं.

ख़ुद को नेता के तौर पर चयनित कराने के लिए दिखाई गई मंसूर की जल्दबाजी और उनके नेतृत्व का अधिनायकवादी अंदाज इन कोशिशों को पटरी से उतार सकता है.

कैसे हुई मौत?

मुल्ला उमर

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विवाद का एक अन्य मुद्दा अप्रैल 2013 में हुई उमर की मौत की परिस्थितियां और ये तथ्य है कि मंसूर ने ये ख़बर तालिबान के अहम अधिकारियों तक से छुपा कर रखी.

तमाम बार नकारने के बाद जब 30 जुलाई को तालिबान मूवमेंट ने आख़िरकार औपचारिक तौर पर यह मान लिया कि उमर की मौत हो गई है. लेकिन उस बयान में मौत की वजह कुदरती बताई गई.

हालांकि यह बयान तालिबान के कई सदस्यों को संतुष्ट न कर सका.

तालिबान से अलग हुए एक छोटे धड़े 'फिदायी महाज़' ने आरोप लगाया था कि मंसूर और उसके क़रीबी सहयोगी ग़ुल आगा के आदेश पर उमर की हत्या कर दी गई.

यह मुद्दा विवाद की वज़ह बन गया है और मंसूर को खुद को पाक साफ़ साबित करना होगा.

उन्हें तालिबान के ओहदेदारों, ख़ासकर उमर के परिवार को संतुष्ट करना होगा कि उन्होंने अपने नेता की हत्या नहीं की. उमर बीमार थे और उनकी मौत शांति से हुई.

आशंका

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सच यह है कि उमर अपने समर्थकों के ख़ासे चहेते थे. अगर ऐसा कोई भी संकेत मिला कि उनकी हत्या की गई थी तो तालिबान मूवमेंट के अंदर ख़ूनी लड़ाई छिड़ सकती है.

सामान्य पृष्ठभूमि वाले उमर एक गांव में मौलवी थे. उन्होंने 1980 के दशक में सोवियत संघ की सेना से संघर्ष किया और अक्टूबर 2001 में अफगानिस्तान पर अमरीकी हमले के बाद नैटो की सेना को चुनौती दी.

उमर ने तालिबान मूवमेंट को एकजुट रखा और उसे ताक़तवर सेना में तब्दील कर दिया. तालिबान के 'अमीरुल मोमिनीन' (वफ़ादारों के कमांडर) के तौर पर समर्थकों ने उनके हर आदेश का पालन किया और उनके नाम पर लड़े.

उनकी मौत के बाद उनके कद का ऐसा कोई अन्य तालिबान नेता नहीं है जो मूवमेंट को एकजुट और ताक़तवर रख सके.

चुनौती

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जैसी कि आशंका थी, उमर की मौत को लेकर तालिबान के ओहदेदारों के बीच मतभेद हो गए हैं और उत्तराधिकार तय करने की प्रक्रिया उलझ सी गई है.

इसकी वजह से तालिबान और अफगान सरकार के बीच 31 जुलाई को होने वाली शांति वार्ता के दूसरे दौर को भी स्थगित करना पड़ा.

इसे समझा भी जा सकता है क्योंकि राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार के साथ बातचीत को आगे बढ़ाने के पहले तालिबान को उमर की मौत से लगे झटके से उबरने और अपने संगठन को दुरुस्त करने की ज़रुरत है.

हालांकि ये लगता है कि शांतिवार्ता कुछ वक़्त के बाद शुरू हो जाएगी क्योंकि पाकिस्तान तालिबान नेतृत्व पर दबाव बना रहा है और मंसूर ने इस प्रक्रिया के प्रति प्रतिबद्धता जताई है.

कोई हल निकालना और शांतिवार्ता को किसी अंजाम तक पहुंचाना बड़ी चुनौती बना हुआ है.

मंसूर विरोधी धड़े के कट्टरपंथी अमरीका की अगुवाई वाली सेना के 14 हज़ार बचे सैनिकों की विदाई तक काबुल से बातचीत का विरोध कर रहे हैं.

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