खारे और साफ़ पानी को मिलाकर बनेगी बिजली?

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- Author, फ़िलिप बाल
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
क्या आपको मालूम है कि साल्ट वाटर (खारे पानी) और साफ़ पानी को आपस में मिलाकर बिजली बनाई जा सकती है?
'ग्रीन एनर्जी' यानी प्रदूषण रहित ऊर्जा उत्पन्न करने का यह ऐसा ज़रिया है जिसकी संभावनाओं को अब तक पूरी तरह से तलाशा नहीं गया है.
मोटे तौर पर इस विधि से इतनी ऊर्जा पैदा हो सकती है, जो हमारी सारी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होगी.
इस विधि को अपनाने की संभावनाओं को <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> ने तलाशने की कोशिश की है.
पहली बार ऐसी ऊर्जा की परिकल्पना 1954 में ब्रितानी इंजीनियर आरई पैटले ने की थी. इसे ऑस्मोटिक पावर या ब्लू एनर्जी भी कहते हैं.
क्या है ऑस्मोटिक पावर?
ऑस्मोसिस दरअसल वो प्रक्रिया है जिसमें यदि एक ओर साल्ट सौल्यूशन वाला पानी रखा जाए और दूसरी ओर साफ़ पानी रखा जाए और उनके बीच एक मैम्ब्रेन हो, तो मैम्ब्रेन में दबाव पैदा होता है.
पानी का बहाव ज्यादा सांद्रता (कॉन्सनट्रेशन) वाले तरल पदार्थ से कम सांद्रता वाले तरल पदार्थ की ओर होगा, ताकि दोनों तरफ सांद्रता का स्तर बराबर हो.

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इस दौरान मैम्ब्रेन में दबाव पैदा होता है और यदि इसे ठीक से इस्तेमाल किया जा सके तो ये इतना ज्यादा हो सकता कि इससे टरबाइन भी चल सकती है.
इसी की कल्पना 1954 में हुई थी, पर इससे बिजली उत्पादन पर कोई काम 1970 तक नहीं हुआ. 1970 में अर्ध पारगम्य झिल्ली (सेमी परमीयेबल मैम्ब्रेन) के व्यवसायिक तौर पर उत्पादन शुरू होने के बाद इस दिशा में कोशिश हुई.
इसराइली वैज्ञानिक सिडनी लोएब ने इस तरह से बिजली उत्पादन की उम्मीद जताते हुए कहा कि जॉर्डन नदी और डेड सी के जल को मिलाकर ये संभव हो सकता है.

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बहरहाल, ऐसी पहली कोशिश नॉर्वे के टोफ्टे में 2009 में हुई. स्टैटक्राफ्ट नाम की कंपनी ने ओस्मोसिस का इस्तेमाल करने वाला बिजली उत्पादन का प्लांट बनाया, इसकी क्षमता थी 4 किलोवाट. जब छोटे छोटे परमाणु प्लांट 5000 किलोवाट बिजली बनाते हैं, तो ये क्षमता तो नगण्य के बराबर थी.
इस उत्पादन के ज़रिए लागत निकालना भी संभव नहीं था, लिहाज़ा ये प्लांट 2013 में बंद कर दिया गया.
यूरोप में जारी प्रयोग
इससे व्यावसायिक उत्पादन करने के प्रयास में जुटे वैज्ञानिक विचलित नहीं हुए. नीदरलैंड के लीयूवार्डन स्थित डच वाटर इंस्टीट्यूट वेट्सस से जुड़ी एक कंपनी रेड स्टैक ने अलग तरह से ऑस्मोटिक पावर के ज़रिए बिजली उत्पादन पर ध्यान दिया और रिवर्स इलेक्ट्रो-डायलिसिस का सहारा लिया.
इस तकनीक में ऐसे मैम्ब्रेन का इस्तेमाल किया जाता है, जिसके जरिए पानी के साथ नमक के कण को भी एक तरफ से दूसरी ओर भेजा जा सकता है.
दो तरह के मैम्ब्रैन होते है, एक जिससे नमक में से सोडियम आयन एक तरफ से दूसरी तरफ़ जा सकते हैं और दूसरी जिससे ऋणावेशित क्लोराइड आयन एक तरफ से दूसरी तरफ पास होते हैं.

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अगर इन दोनों मैम्ब्रेन का इस्तेमाल किया जाए तो एक पेचीदा प्रक्रिया से बिजली का उत्पादन किया जा सकता है.
डच वाटर इंस्टीच्यूट के वैज्ञानिक एक तीसरी विधि, कैपेटिव मिक्सिंग के ज़रिए भी बिजली उत्पादन के तरीकों को तलाश रहे हैं. इसमें सी-वाटर और फ्रेश-वाटर को एक ऐसे में चेंबर में डाला जाता है, जिसमें दो इलेक्ट्रोड्स रखे हों, जो आवेश को संग्रहित करने का काम करेंगे.
24 लाख यूरो की प्रोजेक्ट
नीदरलैंड्स, इटली, पोलैंड और स्पेन के इंस्टीच्यूट आपस में मिलकर करीब 24 लाख यूरो के बजट के साथ इस तकनीक पर 2010 से काम कर रहे हैं. इस अनुसंधान में नई नई जानकारियां सामने आ रही हैं.

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यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी के भौतिक विज्ञानी रेने वान रोइज ने हाल में पाया है कि अगर सी-वाटर में मिलाए जाने वाले फ्रेश वाटर को 50 डिग्री सेल्सियस तक गर्म कर दिया जाए तो दोगुनी ऊर्जा प्राप्त होती है.
इसके लिए पानी को अलग से गर्म करने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि इंडस्ट्रियल प्रोसेसिंग में काम आ चुके गर्म पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है.
डच टीम इस सिद्धांत पर काम कर रही है जबकि स्पेन की ग्रेनाडा यूनिवर्सिटी में भी इसके प्रभाव पर काम हो रहा है.
कार्बन डायोक्साइड से बिजली
वैसे ऑस्मोसिस किसी भी सांद्रता में अंतर वाले तरल पदार्थ को मिलाने से हो सकता है. वो चीनी का घोल भी संभव है. इसके अलावा वैकल्पिक ऊर्जा की एक और संभावना दिखाई दे रही है.
2013 में वेट्सस इंस्टीच्यूट में वैज्ञानिकों के एक दल ने कार्बन डायोक्साइड गैस को डिजाल्व करके बिजली पैदा करने की कोशिश की है.

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वैज्ञानिकों के मुताबिक दुनिया भर में जीवाश्म ईंधन के प्लांट में इतनी कार्बन डायोक्साइड गैस मौजूद है कि उसके ज़रिए हर साल करीब 850 टेरावाट घंटे बिजली का उत्पादन संभव है, जो ब्रिटेन की कुल बिजली खपत से सौ गुना ज़्यादा है.
दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग के लिए मुश्किल का सबब बन चुकी कार्बन डायोक्साइड के ऐसे इस्तेमाल से ऊर्जा की समस्या का हल मिल सकता है.
<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20150610-blue-energy-how-mixing-water-can-create-electricity" platform="highweb"/></link> यहां पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ़्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>
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