ब्रितानी संसद में ब्रिटिश एशियाई महिलाएं कम

- Author, स्वाति बक्शी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लंदन
ब्रिटेन में चुनावों के बाद जो एक दिलचस्प पहलू नज़र रखने की होगी वो है इस बार कितनी एशियाई महिलाएं संसद पहुंच पाती हैं.
2010 में हुआ आम चुनाव यहाँ की एशियाई महिलाओं के लिए क्रांतिकारी था. ब्रिटेन के सदियों पुराने लोकतंत्र में पहली बार एशियाई महिलाओं ने चुनाव जीतकर संसद में क़दम रखा. एक साथ छह एशियाई महिलाएँ सांसद बनीं.
इस बेहद कम भागीदारी की वजह पर बात करते हुए ज़्यादातर महिलाएं भेदभाव की बात तो स्वीकार करती हैं लेकिन इस उदासीनता को एशियाई सांस्कृतिक ढांचे की समस्या मानती हैं.
आम तौर पर एशियाई परिवारों में राजनीति एक स्वाभाविक करियर पसंद के तौर पर नहीं लिया जाता है और बात महिलाओं की हो तो इसकी संभावना और कम हो जाती है.
एशियाई है उलझन

इस बार चुनाव में उतरे कुछ युवा एशियाई उम्मीदवारों में से एक उमा कुमारन मूल रूप से श्रीलंका की हैं.
वो कहती हैं कि ‘‘जब मैं किसी मीटिंग में जाती हूं और देखती हूं कि मैं अकेली महिला हूं और एशियाई भी तो लगता है कि ऐसा क्यों है. यहां तक पहुंचना मेरे लिए मुश्किल रहा है. जब आप एक ऐसी सीट से चुनाव लड़ते हैं जहां अलग-अलग राष्ट्रीयता के लोग हों तो बात और भी मुश्किल हो जाती है. लड़कियों को लगता ही नहीं है कि वो राजनीति में उतर सकती हैं. इसे अधेड़ उम्र के मर्दों का काम माना जाता है.’’
7 मई को होने वाले ब्रिटिश चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या कुल प्रत्याशियों का 26.1 फ़ीसदी है. साल 2010 में ये आंकड़ा 21.1 फ़ीसदी था.

इमेज स्रोत, AFP
देखकर लगता है कि संख्या बढ़ रही है. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि इस अत्याधुनिक समाज और दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र की संसद में महिलाओं की भागीदारी एक तिहाई भी नहीं है.
लंदन के ही एक इलाक़े से लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी से मैदान में उतरी हैं भारतीय मूल की काव्या कौशिक.
काव्या कहती हैं कि ‘‘ये मर्दों की दुनिया है. हमारे घरों में बताया जाता है कि लड़कियों के लिए क़ानून की पढ़ाई करना सबसे बेहतर विकल्प है. महिलाओं को कभी ये नहीं कहा जाता कि उनके लिए राजनीति भी एक करियर हो सकती है.’’
बढ़ती दिलचस्पी

ब्रिटेन के सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे में एशियाई लोगों की भूमिका अहम रही है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका की इच्छा रखने वाली महिलाएं कहती हैं कि अब वक्त है कि क़ानूनों और नीतियों के निर्माण में उनकी आवाज़ भी सुनी जाए.
कंज़र्वेटिव पार्टी से चुनाव लड़ रही बांग्लादेशी मूल की मीना रहमान कहती हैं कि ‘‘एशियाई समुदाय ने ब्रिटेन को बहुत कुछ दिया है, हम अपने साथ सांस्कृतिक विविधता लाए हैं, अब ये हमारा घर है और अगर हम लोकतंत्र में कोई बदलाव चाहते हैं तो ज़रूरी है कि हमारे ज़्यादा से ज़्यादा प्रतनिधि हों. जब हम संसद पहुंचेंगे तो सिर्फ़ एशियाई लोगों के नहीं इस पूरे इलाक़े के प्रतिनिधि होंगे.’’
पांच साल पहले एशियाई महिलाओं ने पहली बार संसद की दहलीज़ पार की और उनकी संख्या बढ़ भी रही है लेकिन ज़्यादातर महिला उम्मीदवारों का मानना है कि कोई और उन पर भरोसा करे इससे पहले उन्हें ख़ुद पर भरोसा करने की लड़ाई जीतनी होगी जो संसद से नहीं घर से शुरू होती है.
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