कैसे बदल रहे हैं सऊदी औरतों के हालात?

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- Author, लुइस रेडर्वेस
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
सऊदी अरब में महिलाओं के लिए हालात बदल रहे हैं. धीरे धीरे ही सही, लेकिन बदलाव हो रहा है.
सालों से कड़े कानून और रूढ़िवादी परंपराओं के कारण सऊदी अरब की महिलाएं कामकाजी दुनिया से बाहर रही हैं.
सऊदी विश्वविद्यालयों से पास होने वाले स्नातकों में 60 फ़ीसदी लड़कियां हैं लेकिन लेबर फोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी महज़ 15 फ़ीसदी है.
किस तरह की हैं पाबंदियाँ?
- सऊदी महिलाओं को ड्राइविंग की इजाज़त नहीं है.
- क़ानून के तहत हर महिला का एक पुरुष गार्डियन होना ज़रूरी है.
- महिलाएँ कई काम केवल पुरुष गार्डियन- पिता, भाई, पति या बेटे की इजाज़त से ही कर सकती हैं.
- पुरुष गार्डियन की इजाज़त - ट्रैवल, काम, शादी, तलाक़, बैंक खाता खोलने, मेडिकल ऑपरेशन के लिए चाहिए.
- अलग-अलग परिवार गार्डियनशिप की पाबंदियों को अलग-अलग हद तक लागू करते हैं.
बदलाव का दावों का आधार
सउदी सरकार के श्रम मंत्रालय के मुताबिक 2010 में देश के प्राइवेट सेक्टर में केवल 55 हज़ार महिलाएं काम कर रही थीं लेकन 2013 के अंत तक इनकी संख्या 4,54,000 तक पहुंच गई.
ये बदलाव दो वजहों से हुआ है- एक तो महिलाओं के अभियान से और दूसरे पूर्व राजा अब्दुल्ला बिन अब्दुल्लअज़ीज़ ने अपने शासन के अंतिम सालों में महिलाओं के लिए नियम कानूनों में कुछ बदलाव किया, महिलाओं के काम करने के लिए इन्हें मददगार बनाया. उन्होंने शूरा काउंसिल में महिला को जगह दी थी. पहली बार किसी महिला को उप मंत्री बनाया और आम तौर पर महिलाओं के कुछ नौकरियों करने के बारे में क़ानूनों में ढील दी.

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सऊदी अरब की महिलाओं को अब रिटेल और हॉस्पीटलिटी में काम करने की इज़ाजत मिल गई है. 2013 में देश में महिला वकीलों को पहली बार वकालत करने का सर्टिफिकेट दिया गया. देश की कूटनीतिक सेवा में महिलाओं को नौकरी दी गई. अब महिलाएँ अख़बारों की संपादक और टीवी शो की होस्ट बन सकती हैं.
दस साल में बदलाव
सऊदी अखबार अल-शर्क़ अल-अवसत की लंदन स्थित फ़ीचर एडिटर अबीर मिश्ख़ास कहती हैं, "चीज़ें बहुत तेजी से नहीं बदल रही हैं लेकिन बदलाव हो रहा है. पिछले 10 साल में काफी बदलाव हुए हैं. कई सेक्टरों में नई नौकरियां महिलाओं के लिए उपलब्ध हुई हैं, जिनके बारे में महिलाएं पहले सपना तक नहीं देखा सकती थीं."
सऊदी अरब की महिलाओं के लिए पहली नियोक्ता एजेंसी ग्लोवर्क की संस्थापक और सीईओ खालिद अल्खुदायर के मुताबिक स्नातक की डिग्री लेने वाली लड़िकयां कुशल भी हैं और काम भी करना चाहती हैं लेकिन उन्हें घर के बाहर पुरुषों के साथ बैठने और काम करने का कोई अनुभव नहीं है.
शिक्षा और रोज़गार के अंतर को भरने के लिए ग्लोवर्क ने 2013 से स्टेप-अहेड की शुरुआत की थी. ये एक सालाना आयोजन है जिसमें महिलाओं को कार्यशाला के जरिए नौकरी के अवसरों से कनेक्ट किया जाता है.
2013 में रियाद में आयोजित कार्यशाला में 45 नियोक्ता शामिल हुए थे. इस साल रियाद, जेद्दाह और दामान में 300 नियोक्ताओं के शामिल होने की उम्मीद है.
आत्मनिर्भरता की ओर क़दम
23 साल की हाफ़सा अलगेद ने रियाद की किंग साउद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी अनुवाद में डिग्री हासिल की थी. उन्होंने हाल ही में रियाद स्थित डच दूतावास में अंग्रेजी और अरबी अनुवादक के तौर पर काम करना शुरू किया है.
अलगेद रियाद में किसी यूरोपीय दूतावास में काम करने वाली पहली सऊदी महिला हैं. उनका कहना है कि माता-पिता के उत्साह के बिना वे यहां तक नहीं पहुंच पातीं.
उन्होंने कहा, "मैं हमेशा काम करना चाहती थी. ग्रेजुएट होने के बाद मेरी प्राथमिकता नौकरी हासिल करने की थी. मैं खुद को आत्मनिर्भर बनाना चाहती थी."

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अलगेद बताती हैं, "कुछ महिलाएं उन पुरुषों से बात नहीं करतीं, जो उनके परिवार के नहीं हैं. लेकिन मैं इसको बुरा नहीं मानती. क्योंकि मैं उन्हें काम से ही जोड़कर देखती हूं."
अल्खुदायर के मुताबिक निजी सेक्टर की नौकरियों को महिलाओं के लिए खोलने की वजह से ये बदलाव हुआ है. वो कहते हैं, "कई नए कानून आए और पहल हुई है. इंटरनेशनल कॉरपोरेट्स के अलावा लोकल बिज़नेस घरानों में कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ी है."
धमकियां भी मिलती हैं
टीचिंग और हेल्थ केयर जैसे परंपरागत सेक्टर को छोड़कर सऊदी महिलाओं को नौकरी तलाशने में अभी भी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
अल्खुदायर ने बताया कि उन्हें और उनकी कंपनी को उन लोगों ने धमकी भी दी है, जिन्हें महिलाओं का काम करना पसंद नहीं है.
उन्होंने बताया, "जब हमने महिलाओं को सुपरमार्केट में काम पर लगाया तो कई लोगों को ये पसंद नहीं आया. लेकिन मैं अवसर देखना पसंद करता हूं. अगर नौकरी नहीं करेंगी तो महिलाओं के लिए शिक्षा का क्या मतलब रहेगा?"

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सऊदी श्रम सुधार के विशेषज्ञ और लंदन स्कूल ऑफ इक्नामिक्स में कम्पैरेटिव पॉलिटिक्स के एसोसिएट प्रोफेसर स्टीफेन हरटोग बताते हैं, "महिलाओं के लिए परिवहन बड़ा मसला है. जिनका परिवार खर्च उठा सकता है, वो तो ड्राइवर रख लेती हैं. कुछ नियोक्ता कैब की सुविधा मुहैया कराते हैं, लेकिन ये सब जगह नहीं होता. महिलाओं के लिए ड्राइविंग नहीं करना, उनके काम करने के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है."
टाटा कंसल्टेंसी भी मैदान में
कुछ नियोक्ता महिलाओं को काम पर रखने के साथ साथ परंपरागत मूल्यों को भी कायम रखने की कोशिश करे रहे हैं. इसके लिए वे केवल महिला कर्मियों के लिए वर्क प्लेस बना रहे हैं. रियाद के अकारिया ज़िले के एक बीपीओ ने 500 महिलाओं को नौकरी दी.
ये सेंटर जेनरल इलेक्ट्रिक, सऊदी अराम्को और सऊदी टेलीकॉम कॉरपोरेशन को सेवा मुहैया कराती है. इसकी शुरुआत टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज ने सितंबर, 2014 में की है और ये कंपनी अपने यहां 3000 महिलाओं को काम देना चाहती है.
प्रोफ़ेसर स्टीफेन बरटोग कई सर्वे का हवाला देते हुए कहते हैं कि सऊदी अरब की महिलाओं में केवल महिलाओं के काम करने वाली फर्म काफी लोकप्रिय हैं क्योंकि इससे ना तो उन्हें यौन उत्पीड़न का डर सताता है और ना ही घर वाले सवाल उठाते हैं.
हरटोग कहते हैं, "हालांकि ये फर्म को काफी महंगा पड़ता होगा. क्योंकि इसके लिए महिलाओं के लिए अलग से प्रवेश, बाथरूम और अन्य सुविधाओं का इंतजाम करना होता है, ये लंबे समय तक चल पाए, इसमें मुझे संदेह लगता है."
हालांकि इस व्यवस्था की इसलिए भी आलोचना हो रही है क्योंकि इससे सामाजिक बदलाव नहीं आता बल्कि पुरुषों और महिलाओं में अलगाव बढ़ता है.

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जेनरल इलेक्ट्रिक के सऊदी अरब स्थित सीईओ और प्रेसीडेंट हिशाम अल बाहकाली कहते हैं, "इसे अलगाव के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. हमारी कोशिश महिलाओं को नौकरी के लिए अच्छा वातावरण देने की है."
हरटोग के मुताबिक सऊदी अरब के प्राइवेट सेक्टर में ज्यादा महिलाओं को कामकाजी संसाधन में शामिल करने के लिए अभी भी कुछ बदलाव करने होंगे.
वो कहते हैं, "बेहतर वेतन, सुरक्षा और काम के कम घंटे के चलते सऊदी के लोग सरकारी नौकरियां करना चाहते हैं. प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां बढ़ें, इसके लिए सरकारी नौकरियों की स्थिति में भी बदलाव करना होगा."
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या महिलाओं को नौकरियां मिल भी रही हैं? हरटोग नौकरियों की संख्या पर भी सवालिया निशान उठाते हैं.
हरटोग कहते हैं, "जितनी संख्या बताई जा रही है अगर उसकी आधी संख्या में भी महिलाओं को वास्तविक नौकरियां मिली हैं तो यह बेहद अहम बदलाव है."
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