भारतीयों के 'ऑस्ट्रेलियन ड्रीम' के मायने?

इमेज स्रोत, BBC World Service
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पर्थ से
पिछले दो दशकों में भारतीय मूल के लोगों ने लाखों की तादाद में ऑस्ट्रेलिया का रुख़ किया है.
किसी ज़माने में अमरीकी नागरिकता यानी ग्रीन कार्ड की होड़ रहती थी और अब वैसा ही आलम ऑस्ट्रेलिया में बसने को लेकर है.
इस विशालकाय लेकिन कम आबादी वाले देश में भारतीय मूल के लोगों की संख्या पांच लाख के आस-पास पहुँच रही है.
आख़िर क्या है इस विशालकाय देश में जो लोगों के मन को मोह लेता है?
विशेष शृंखला के पार्ट-1 में पढ़ें क्यों प्रवासी भारतीय कभी अपने देश लौटने की नहीं सोचते.
कहानी में विस्तार से पढ़िए

41 वर्षीय सुरिंदर सरेन के घर जाकर लगा ही नहीं कि विदेश में हैं क्योंकि माहौल हरियाणा का मिला.
पंद्रह वर्ष पहले कुरुक्षेत्र से मेलबर्न पहुंचे सुरिंदर और पत्नी उमा ने पढ़ाई के साथ नौकरियां कीं और घर-घर जाकर सामान बेचा.
पत्नी आईटी सेक्टर में थीं और सुरिंदर ने बतौर सेल्समैन काम शुरू किया. उसके बाद वो सेल्स मैनेजर बने.
अब सुरिंदर के माता-पिता, भाई-भाभी वगैरह सब मेलबर्न के एक महंगे इलाके में साथ रहते हैं.
आज सुरिंदर का अपना प्रॉपर्टी बिज़नेस है और परिवार वीकेंड मनाने उनके फ़ार्म हाउस पर जाता है.
उन्होंने बताया, "ऑस्ट्रेलिया में सफल होने के बहुत मौक़े हैं, क्योंकि यहाँ करप्शन नहीं है. बस मेहनत और लगन के साथ काम करते जाइए और अपने रास्ते से भटकिए मत".
'देश के लिए कुछ करूं'

ऑस्ट्रेलिया में सौ से भी ज़्यादा देशों के लोग रहते हैं, जिनकी संख्या पिछले दिनों बढ़ी है.
इनमें से भारतीयों ने अब ब्रितानी और चीनी मूल के उन लोगों को भी संख्या में पीछे छोड़ दिया है जिन्हें पिछले कुछ वर्षों में ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता मिली.
1992 के क्रिकेट विश्व कप को टीवी पर देखने के बाद दिल्ली के कॉमर्स ग्रेजुएट कँवर सिंह ने ऑस्ट्रेलिया का रुख़ किया था.
शुरुआती दिन मुश्किल थे, लेकिन फिर सफलता से मुलाक़ात हुई और बतौर एक चार्टर्ड अकाउंटेंट मेलबर्न में उनकी पहचान बन गई.
अब कँवर सिंह के गैराज में तीन बेशकीमती गाड़ियां हैं और वे कई कंपनियों के बोर्ड में हैं.
कँवर सिंह ने कहा, "मेरा इरादा है कि जब दोनों बेटे बड़े हो जाएं तो मैं कुछ दिनों के लिए भारत जाकर अपने देश के लिए कुछ कर सकूँ. अब अपनी प्रोफेशनल लाइन से जुड़े किसी भी काम में योगदान देना चाहता हूँ."
'भारत बेहतर है'

हालांकि तस्वीर का एक दूसरा पहलू ये भी है कि कई ऐसे भारतीय मूल के लोग भी हैं जो वर्षों से यहाँ रह कर ऑस्ट्रेलियाई नागरिक तो बन चुके हैं, लेकिन एक टीस के साथ.
हैदराबाद के रहने वाले बिस्मिल्लाह ख़ान नौ वर्ष पहले मेलबर्न पहुंचे थे. आने के बाद टैक्सी चलाना शुरू किया था और आज भी चला रहे हैं.
उन्होंने बताया, "भारत में कंसल्टेंट और एजेंट कहते थे कि आप जाओ लाखों कमाओगे. यहाँ आने के बाद की सच्चाई यही है कि कुछ भी आसान नहीं है. हर चीज़ आपको शुरुआत से करनी पड़ती है इसलिए बहुतों के लिए भारत ही बेहतर है."
आखिर सच्चाई क्या है? इस बात की तह तक पहुँचने के लिए हमनें मेलबर्न विश्विद्यालय का रुख किया.
'लकी देश'

प्रोफ़ेसर प्रदीप तनेजा तीस वर्षों से मेलबर्न विश्विद्यालय में रिसर्च कर रहे हैं.
उन्होंने बताया, "ऑस्ट्रेलिया को लकी देश माना जाता था जहाँ पहले लोग इंग्लैंड और फ्रांस से आते थे, लेकिन पिछले बीस वर्षों से ये भारतीयों के लिए लकी हो गया है. भारत से युवा आने लगे जो खाना बनाने से लेकर हेयर डिज़ाइनिंग तक का कोर्स करके यहाँ के नागरिक हो गए."
"सच ये है कि जो पढ़े-लिखे लोग आते हैं वही बेहतर ज़िन्दगी जीते हैं, जबकि दूसरे या तो गार्ड या फिर टैक्सी चालक या फिर क्लीनर का काम करके अपना काम चलाते हैं."
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