लख़वी पर कसाब का बयान मंज़ूर नहीं: कोर्ट

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26/11 मुंबई हमलों की साज़िश के अभियुक्त ज़कीउर रहमान लख़वी की ज़मानत मंज़ूर करने के निचली अदालत के फ़ैसले को अभी तक पाकिस्तान सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती नहीं दी है.
आतंकवाद निरोधी अदालत के जज कौसर अब्बास ज़ैदी ने ज़कीउर रहमान लख़वी की ज़मानत पिछले हफ़्ते मंज़ूर की थी.
इसके बाद भारत ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में दिेए बयान में कहा था पाकिस्तान को इस बारे में स्पष्ट संदेश दिया गया है.
अदालत ने ज़मानत देने के फैसले पर कहा था कि लख़वी को मुंबई हमलों में मौत की सज़ा पाने वाले अजमल कसाब के बयान पर गिरफ़्तार किया गया था.
'प्रमाणित प्रतियां नहीं मिलीं'
सरकारी वकील चौधरी अज़हर के मुताबिक़ आतंकवाद निरोधी अदालत के अधिकारी उन्हें इस फ़ैसले की प्रमाणित प्रतियां नहीं दे रहे हैं.
उधर, संबंधित अदालत के अधिकारियों का कहना है कि अभी तक उन्हें इस बारे में कोई अनुरोध नहीं मिला है.
अधिकारियों का कहना है कि अदालत की तरफ़ से प्रमाणित प्रतियां देने पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है.
'सिर्फ़ एक बयान पर..'

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उधर निचली अदालत ने कसाब के बयान पर लख़वी की गिरफ़्तारी पर अहम टिप्पणी की थी.
अदालत के मुताबिक़ यह बयान कसाब ने एक भारतीय अदालत में दिया था, जिसकी पाकिस्तानी क़ानून में कोई गुंजाइश नहीं है.
अदालत का कहना था कि केवल एक व्यक्ति के बयान पर और मुक़दमे में देरी की सज़ा अभियुक्त को नहीं दी जा सकती.
अदालत के मुताबिक़ किसी अभियुक्त की ज़मानत मंज़ूर होने के बाद भी जांच बेहतर ढंग से चलाई जा सकती है.
अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा कि सुनवाई के दौरान एक गवाह ने कहा था कि अजमल कसाब ज़िंदा है और इस समय फ़रीदकोट में है.
यह गवाह बचाव पक्ष द्वारा पेश किया गया था जो स्कूल शिक्षक है और उसके अनुसार वह अजमल कसाब को पढ़ाता रहा है.
'आवाज़ के सुबूत नहीं'

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अदालत के मुताबिक सीआईडी के अधिकारी ने यह बयान दिया था कि मुंबई हमलों की साज़िश के मामले में जो फ़ोन कॉल ट्रेस हुईं उनमें भी लख़वी की आवाज़ संदेह के घेरे में है.
अदालत के अनुसार इस बारे में पक्के सुबूत पेश नहीं किए गए हैं.
पाकिस्तान सरकार ने ज़कीउर रहमान लख़वी की ज़मानत मंज़ूर होने के बाद उन्हें शांतिभंग होने की आशंका में रावलपिंडी की अडियाला जेल में नज़रबंद रखा है.
भारत सरकार ने लख़वी की ज़मानत के बाद पाकिस्तान सरकार पर ज़ोर डाला था कि वह अदालत के फ़ैसले को ऊंची अदालत में चुनौती दे.
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