दुआ वाले हाथों पर ख़ून के धब्बे तो नहीं...

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- Author, मोहम्मद हनीफ
- पदनाम, कराची से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
जब तक आप ये तहरीर पढ़ेंगे पेशावर में जनाज़े उठ चुके होंगे. प्राइमरी सेक्शन के बच्चों के लिए छोटे कफ़न, हाई स्कूल के लिए नॉर्मल साइज़ के.
क़ब्रों पर पानी छिड़कने के बाद फूल चढ़ाए जा चुके होंगे.
माएं उन बच्चों की तस्वीरों को चूम कर बेहाल होंगी जिन्हें उन्होंने सुबह हरे कोट में या हरी जर्सी में या लड़कियों को हरी चादर पहना कर स्कूल भेजा था.
और अब जिन्हें दफ़नाने के बाद मर्द लोग क़ब्रिस्तान से वापस आ रहे हैं.
तालिबान का नाम

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सर्द मौसम में मांओं को वैसे भी बच्चों की पढ़ाई से ज़्यादा ये फ़िक्र होती है कि उन्हें ठंड न लगे. अब इन बच्चों को शहीद कहा जा रहा होगा.
शहीद सीधे जन्नत जाते हैं... तो ये कहकर दिलों को तसल्ली दे लेते हैं कि पेशावर की सर्दी इन बच्चों की क़ब्रों के अंदर नहीं पहुंचेगी.
पेशावर में एक इंतहाई अहम और हंगामेदार मीटिंग हो चुकी होगी जिसमें इंतहाई सख़्त अल्फाज़ में इस क़त्ले आम की भर्त्सना की गई होगी.
शायद तालिबान का नाम लिया गया होगा या फिर उनका नाम लिए बग़ैर उन्हें कौम और मुल्क के दुश्मन क़रार देते हुए उन्हें जड़ से ख़त्म करने का इरादा दुहराया गया होगा.

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ज़ाहिर है इस इंतहाई अहम बैठक में इंतहाई अहम फ़ैसले किए जाएंगे. लेकिन बैठक शुरु करते हुए सबसे पहले स्कूल में मरने वालों के लिए दुआए मग़फ़िरत (अल्लहाह से उनके गुनाह माफ़ करने की दुआ) की जाएगी.
पहला सिगरेट
मेरा ख़्याल ये है कि दुआ ग़ैर ज़रुरी है. मैट्रिक करने वाले या मिडिल स्कूल में पढ़ने वाले या प्राइमरी जमात के इन बच्चों ने आख़िर ऐसा क्या गुनाह किया होगा कि उनके गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ मांगी जाए.
हो सकता है किसी को कैंटीन वाले का बीस रुपया उधार देना हो...हो सकता है कि किसी ने अपने साथी को इम्तिहान में चुपके से नक़ल कराई हो...

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किसी ने हो सकता है कि क्रिकेट मैच में अंपायर बन कर अपने दोस्त को आउट न दिया हो. हो सकता है किसी ने क्लास में ख़ड़े होकर उस्ताद की नक़ल उतारी हो.
हो सकता है कि किसी शरारती बच्चे ने स्कूल के बाथरुम में घुसकर अपना पहला सिगरेट पिया हो.
ख़बरों में आया है कि जब हरे रंग के कोटों और हरी जर्सियों और हरी चादरों पर ख़ून के छींटे पड़े तो स्कूल में मैट्रिक के बच्चों का फ़ेयरवल चल रहा था. हो सकता है कि इसमें किसी ने ग़ैर मुनासिब गाना गा दिया हो.
ख़ून के छींटे

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अगले हफ़्ते से सर्दियों की छुट्टियां आने वाली हैं. कई बच्चों ने अपने रिश्तेदारों के पास छुट्टियां मनाने का प्रोग्राम बनाया होगा जहां सारी रात फ़िल्में देखने या इंटरनेट पर चैट करने के मंसूबे बने होंगे.
आख़िर 16 साल तक की उमर के बच्चे या बच्चियां क्या गुनाह कर सकते हैं कि जिसके लिए इस मुल्क की सियासी और फ़ौजी हुकूमत हाथ उठाकर उनके गुनाहों की माफ़ी की दुआ करे.
हो सकता है कि एक दोस्त ने दूसरे दोस्त से वादा किया हो कि छुट्टियों के बाद मिलेंगे.

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अब इनमें से एक वापस नहीं आएगा...वो पेशावर की मिट्टी में एक ऐसी सर्द क़ब्र में दफ़न है जो एक ऐसा क्लासरुम है जहां कोई क्लास-फ़ेलो नहीं और जहां कभी छुट्टी की घंटी नहीं बजती.
तो पाकिस्तान की राजनीतिक और फ़ौजी हुकूमत से दर्ख़ास्त है कि वो इन बच्चों के आख़िरत (मरने के बाद) के बारे में परेशान न हों, और जब कल दुआ के लिए हाथ उठाएं तो अपनी मग़फ़रित (गुनाहों की माफ़ी) की दुआ मांगे और दुआ के लिए उठे उन हाथों को ग़ौर से देखें कि उन पर ख़ून के धब्बे तो नहीं.
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